कविता इसलिए तथा अन्य कविताएँ

  कविताएँ  

    

डॉ. राम प्रवेश रजक

        

  जंगल

 

गूंगे, बहरे, अंधे

फैशन के आगे धधाये

लकड़ी से बनाते हैं

फर्नीचर, सुन्दर-सुन्दर

टिकाऊ दरवाजे, फ्रेम

घर सजाने के सामान

गुशलखाने

फैशन के लग गये पर

कट गया जंगल

आग जलाती है

मिट्टी के शरीर को भी

याद रखना लकड़ी

जलावन के काम

भी आती है।

विघ्नहर्ता भगवान गणेश

पर चढाने

करता है केतु का उपाय

कोई उसे चढ़ाता है

भगवान शिव पर

वंश वृद्धि करने के लिए

मवेशियों का प्रिय

चारा है घास

हजारों औषधिय गुणों से

भरा है घास

सूचक है वर्षा ऋतु का

पर रौंद दिया जाता है

घास के फूल आने

से पहले है

दिहाड़ी मजदूरों की तरह l

 

 

सरौता

 

हमारे सपनों के

लिए चिंतित माँ

रख देती थी

तकिये के नीचे

सरौता

 

 

कविता इसलिए

 

कविता इसलिए

क्योंकि नहीं बैठना

पड़ता सपर कर

पढ़ने के लिए

फुर्सत में आप

जब भी पन्ना पलटिये

पायेंगे कुछ नया

नई चिंता, नये विचार

छोटी-छोटी पंक्तियों में

बड़ी से बड़ी

क्रांति का आगाज़

 

 

डॉ. राम प्रवेश रजक

सहायक प्राध्यापक

हिन्दी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय

कोलकाता- 73

E-mail-rajak.ram2010@gmail.com

Mob- 9800936139

 

 

 

 

 

 

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