उत्तर-आधुनिक यथार्थ से विद्ध और बद्ध कविताएँ - प्रो. दयाशंकर त्रिपाठी
पिता का शोकगीत की समीक्षा
चन्द्रदेव यादव प्रकृत्या हृदय से कवि हैं l ‘देस-राग’ और ‘गाँवनामा’ के बाद ‘पिता का शोकगीत’ उनका तीसरा कविता संग्रह है l चन्द्रदेव यादव के नये कविता संग्रह में एक दुखती रग है l वह यह कि न चाहते हुए भी अपने गाँव और घर-परिवार से विस्थापित होकर शहरी बम्बे में फँस जाना और उससे कभी न निकल पाना l यह टीस उनकी कई कविताओं में आदि से लेकर अन्त तक बनी रहती है l यदि वे अपने संग्रह का नाम ‘पिता का शोकगीत’ न रख कर गाँव या धरती या माँ या किसान का शोक गीत रखते तो उनकी कविताओं की मूल संवेदना में कोई बुनियादी फर्क नहीं पड़ता l शहर में आकर बस जाने के बावजूद गाँव हमेशा उन्हें अपनी ओर खींचता रहता है l इसलिए उन्होंने अपनी गँवईं मिट्टी को ही इन कविताओं को समर्पित किया है l उन्होंने इस कविता संग्रह की एक सुचिंतित भूमिका लिखी है, जिसमें गाँव से विस्थापन की सुखद-दुखद स्मृतियाँ हैं l भावुक कवि को तो वे अक्सर नॉस्टेल्जिक बना देती हैं, लेकिन चन्द्रदेव भाई उससे मुक्त हैं l
‘पिता का शोकगीत’ में कुल 41 कविताएँ हैं l इसमें कई कविताएँ श्रृंखलाबद्ध होने के कारण लम्बी हैं l सन् 1985 के बाद के युवा कवियों—उदय प्रकाश, देवीप्रसाद मिश्र, बद्रीनारायण, कुमार अम्बुज, अष्टभुजा शुक्ल, निलय उपाध्याय, बोधिसत्व, रंजना जायसवाल आदि ने पारिवारिक संबंधों पर बड़ी संजीदा कविताएँ लिखी हैं l शायद इसके पीछे गाँव से विस्थापन की बेचैन करने वाली स्मृतियाँ हों l प्रस्तुत कविता संग्रह का नामकरण जिस लम्बी कविता पर है, वह पिता पर केन्द्रित है, हालांकि वहाँ पिता कोई व्यक्ति नहीं, गाँव है l चन्द्रदेव जी अपने पिता को पुराने भारतीय तर्ज पर नहीं, बल्कि एक किसान-पुत्र की तरह याद करते हैं कि जिसने उनके भीतर सपने और कविता का बीज बोया है l पुत्र की ओर से अपने पिता के साधारण, लेकिन असाधारण व्यक्तित्व की यही सबसे पावन और सुखद स्मृति हो सकती है l हमारे समकालीन कवियों की क़तार में खड़े होकर चन्द्रदेव जी ने अपने माता-पिता और भाई पर बहुत मार्मिक, कल्पना-उर्वर कविताएँ लिखी हैं l ‘पिता का शोकगीत’ में अनुभव तो काफी समृद्ध है l वैसे भी लम्बी कविताओं के सामने रचनात्मक एकसूत्रता और सधाव सबसे बड़ी चुनौती होती है l इस दृष्टि से ‘सपना’ शीर्षक कविता अपेक्षाकृत अधिक सधी श्रृंखलाबद्ध कविता है l रचनात्मक सधाव की दृष्टि से ‘तख्ती’ कविता बहुत अच्छी है l कविता रचने की प्रक्रिया में अंतत: चन्द्रदेव भाई बड़ी सुन्दर कल्पना करते हैं—“मैं देखता हूँ—भाषा और ज्ञान के निस्सीम मैदान में / खड़िया की एक नदी है / नदी में छोटी-सी एक नाव है—/ नाव में एक बच्चा है / और बच्चे के हाथ में / सरकंडे का चप्पू है / नाव चल रही है / चल रही है नाव धीरे-धीरे / और पिता कहीं नहीं हैं / बच्चा महसूस कर रहा है / कि नाव अब भी टिकी है / पिता की हथेली पर l”
एक कविता माँ पर भी है l यद्यपि एकांत श्रीवास्तव की कई मार्मिक कविताएँ माँ पर हैं, लेकिन चन्द्रदेव यादव की माँ पर लिखी कविता में सादगी की सुन्दरता तो है ही, उनका अन्दाज़ भी अपना है l यह कविता सृजनात्मकता और अर्थ-गौरव दोनों दृष्टियों से उम्दा है l इसे पढ़ते हुए मेरे मन में अज्ञेय की कविता ‘नदी के द्वीप’ झंकृत होती रही l चूँकि सृष्टि को अर्थ माँ देती है, सृष्टि सार्थक भी उसी से होती है; इसलिए चन्द्रदेव जी की पावन श्रद्धा सहज ही माँ में महसूस होती है l
पिता का शोकगीत
उनकी कविताएँ पूरी तरह अपने ज़माने के उत्तर-आधुनिक यथार्थ से विद्ध और बद्ध हैं l लेकिन वह आधुनिक हिन्दी कविता की परंपरा का विरोध या निषेध करने के बदले उसे अपने समय के सन्दर्भ में विकसित करती हुई आगे बढ़ती है l यही कारण है कि इस संग्रह की कविताओं में अनुभव और अभिव्यक्ति दोनों में कहीं नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन जैसे जन कवियों के अक्स हैं तो कहीं धूमिल की कविताई का रंग, बावजूद इसके इन कविताओं में कवि की निजी सर्जनात्मकता ही प्रधान है l
ये कविताएँ इक्कीसवीं शताब्दी के दो दशकों की यात्रा करती हैं l इन वर्षों में किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी आदि की आर्थिक स्थिति पहले से ज़्यादा बिगड़ गई है l गाँव में रह कर खेती-मज़दूरी करने वाले पहले से अधिक परेशान, पायमाल और हताश हैं l मौजूदा समय में पलायन, विस्थापन और आत्महत्या उनके लिए बड़ी बात नहीं है l राजनेता, माफिया, भ्रष्ट प्रशासन और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मिलीभगत ने उनके सपने को दु:स्वप्न में बदल दिया है l आजकल किसानों की हालत बहुत दयनीय हो गई है l सरकार की नई नीतियों ने यूपी के गाँवों में नये मुहावरे को जन्म दिया है—छुट्टा गोरू खेत उजाड़ l सरकार की इस नीति के कारण किसानों को चौपाये खाते जा रहे हैं l इसलिए ‘खेत रोते हैं तो किसान रोता है / हर बार वह ख़ुशी बोता है / और दुःख काटता है’ l चन्द्रदेव जी यहाँ सामान्यीकरण करते हैं, लेकिन उनका निष्कर्ष सही है कि ‘विकास की सीढ़ियाँ चढ़ते / लौट रहे हैं हम आदिम स्वभाव की ओर’ l ‘सजा’ कविता खास है, जिसमें वे ऑक्सीजन के अभाव में 36 बच्चों की अस्वाभाविक मृत्यु के पीछे क्रूर व्यावसायिक गणित की सही परख करते हैं l वे यह भी देख पाते हैं कि नदियाँ और पहाड़ विकास की गणित के कारण मरणासन्न हैं l “कितना विचित्र है / आदमी देखता है सपने सुन्दर भविष्य का / और अपने ही हाथों आग देता है / अपने अनागत को” l
चन्द्रदेव यादव ने अपनी कविताओं में मौजूदा स्थितियों के प्रति असंतोष, आशंका, नफ़रत, क्षोभ, गुस्सा, उदासी के बावजूद आशा, चाह, आकांक्षा, और संकल्प को अपने भीतर बचाए रखा है l उनकी चाह मध्यवर्गीय है, लेकिन उसकी निस्बत सामाजिक है l वे उसे समाज और राष्ट्र के स्तर पर फलित होता देखना चाहते हैं l उन्हें अपनी सीमा का एहसास है, इसीलिए वे कहते हैं कि “हमने संकल्प लिया—बचा लेंगे नदियों को / सूखने नहीं देंगे मीठे जल के सोतों को,/ मगर वे सूखते-सिकुड़ते रहे लगातार l” इसका कारण यही है कि मध्यवर्गीय शक्तियों से अधिक ताकतवर राजनेता और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शक्तियाँ हैं l
प्रकृति, नदी, बादल, पहाड़, पेड़-पौधे, हरियाली आदि के सुन्दर रूपों का साक्षात्कार और उनका संसर्ग मनुष्य मात्र के लिए स्वाभाविक है l चन्द्रदेव जी ने ‘तन का ताप’ कविता में शिशिर की मनमोहक गंवई प्रकृति का चित्रण किया है जो त्रिलोचन की कविता ‘धूप सुन्दर / धूप में जग रूप सुन्दर’ की अनायास याद दिलाती है l
चन्द्रदेव यादव की अभिव्यक्ति में अनुभव की जटिलता नहीं है l अत: उनकी भाषा में सामान्यत: कोई उलझाव नहीं है, दुराव छिपाव भी नहीं है l उनकी कविता में जहाँ-तहाँ ‘उजाड़ बस्तियों में / चिराग़ नहीं जला करते’, ‘शोक मनाने से / लौट नहीं आते बीते हुए दिन’ जैसे साफ़-सुथरे सूक्ति वाक्यों के प्रयोग हैं, लेकिन उनके प्रति उनको विशेष मोह नहीं है l उन्होंने हिन्दी के प्रचलित मुहावरों और कहावतों को अपनी कविता की ज़रूरत के अनुरूप सर्जनात्मकता की चासनी में डुबोकर लिया है l नये तरह के अनुभव के दबाव से उपजी चन्द्रदेव जी की नये ढंग की लाक्षणिक-व्यतिरेकी पदावली उनके समकालीन देवीप्रसाद मिश्र, कुमार अम्बुज, अष्टभुजा शुक्ल, बोधिसत्व आदि की सहज याद दिलाती है l काव्योपमानों को लेकर उनकी सूझ अच्छी, व्यापक और समृद्ध है l वे अपनी कविता में एक ओर पौराणिक-ऐतिहासिक उपमानों का सहज प्रयोग करते हैं तो दूसरी ओर उतनी ही सहजता से ठेठ देशज उपमानों का भी l इनमें एक खास तरह का टटकापन है l उपमान विधान में नये-पुराने का अद्भुत सर्जनात्मक मेल है l गाँव के परिवेश से संबंधित कविताएँ ऐसे उपमानों के सृजन को संभव करती हैं l कविता का सन्दर्भ भले गाँव का हो, लेकिन चन्द्रदेव यादव का उत्तर-आधुनिक अनुभव उसके अनुरूप है l
लेकिन इस संग्रह में प्रयुक्त भोजपुरी के वे शब्द कविता के आस्वाद में बाधा डाल सकते हैं, जो खड़ी बोली हिन्दी में प्रचलित नहीं हैं l चन्द्रदेव यादव का संबंध गँवईं और शहरी—दोनों समाजों से है और इन्हीं से संबद्ध विषयों पर उन्होंने कविताएँ भी लिखी हैं, लेकिन वे जिस परिवेश में रहते हैं वहाँ सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता, लिंगभेद कमोबेश अभी भी मौजूद हैं, किन्तु यह सब उनके अनुभव का सच नहीं लगता है l वास्तव में उन्होंने वही लिखा है जो उनके हिस्से का सच है l यदि इस प्रकार की समस्याएं भी उनकी कविता और संवेदना का विषय बनतीं तो उसका दायरा अवश्य कुछ और व्यापक हो जाता l ‘पिता का शोकगीत’ कविता संग्रह चन्द्रदेव जी की मंजिल नहीं, बल्कि उनकी कविता-यात्रा का एक पड़ाव भर है l
[वरिष्ठ आलोचक प्रो. दयाशंकर त्रिपाठी सरदार पटेल विश्वविद्यालय ,गुजरात के हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ प्रोफ़ेसर हैं l ]


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