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पल्लवी मुखर्जी की कविताएँ

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1.तुम' पल्लवी मुखर्जी  जिनके घर फूंक दिये जाते हैं या रौंद दिये जाते हैं किसी देह की तरह उन घरों के दुःखों का लेखा-जोखा हिसाब-किताब क्या तुम्हारे बही खातों में दर्ज है या उन्हीं की तरह भूल चुके हो तुम जो सिर्फ़ पन्नें पलटते हैं देखते हैं सरसरी तौर पे और याद रखते है बस अपनी भूख अंतहीन भूख से मरती आत्मा दिखती नहीं है 2." दुखों का हिसाब " वह औरत तमाम पीड़ाओं औरदुःखों को पकड़ती नहीं है मेरी तरह उड़ा देती है सारी पीड़ाएं जैसे कोई चिड़िया हो आँगन की आँसुओं से गिरती बूंदों में टिमटिमाते हैं तारें जुगनुओं की तरह जो चूल्हे की आँच पर और चमक उठते हैं उसकी हांडी से खदबदाते भात की सोंधी गंध में.. टकराती है मेरी खिड़की से और फैल जाती है पूरे कमरे और देश में उसका मरद महुए से सराबोर देखता है उसे जैसे कोई गिद्ध हो वह औरत उसकी आँखों में बैठे गिद्ध को झपटने नहीं देती देह की कसावट को ढाक कर मगन हो जाती है भात की सोंधी गंध में 3. " हम -तुम" तुम जानते हो मेरी ज़रूरत भर का नमक बित्ते भर के आकाश का विस्तार जिसमें बोरी भ...

सुघोष मिश्र की कवितायेँ

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[सुघोष मिश्र हिन्दी के चर्चित युवा कवि हैं ] 1.  होना ____ [सुघोष मिश्र ] होने को कुछ भी हो सकती थी वह बारिश भी कहीं भी बरस पड़ती बेपरवाह, पर उसने नदी होना चुना और मुझे पुकारती समुद्र तक गई। ••• 2. प्रेम कविता _________ प्रेम था आख़िरी सादा पन्ना स्याही थीं आँसू की कुछ बूँदें स्मृतियाँ शब्द होने का संघर्ष करते धुँधले अक्षरों की मृत्यु थीं कविता थीं वे पंक्तियाँ जो लिखी नहीं गईं। ••• 3. जाऊँगा _______ हर वसंत फूल आएँगे इन लताओं में मैं दुबारा नहीं आऊँगा तुम्हारी अनुपस्थिति के अंधकार में खो जाऊँगा स्मृतियों में प्रथम स्पर्श-सा चुभूँगा हर वसंत जब फूल आएँगे इन लताओं में मैं सीढ़ियों से अपना उतरना याद करूँगा तुम्हें भूल जाऊँगा कहीं फूल बन खिल उठूँगा धूल में मिल जाऊँगा ••• 4.प्रतीक्षा _____ प्रेम जो होता है असीम उसे सीमित करता है साथ— हो सकता है वह किसी प्रेमी के दिल जितना छोटा या किसी अँगूठी के वलय जितना संकीर्ण, सौंदर्य जो होता है निराकार क़द्रदान उसे सज...

शाहीन बाग की बागी औरतें

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[ युवा कवयित्री 'गुड़िया तबस्सुम' की कविता ]    रोए! चिल्लाए! [गुड़िया तबस्सुम]   और चुप हो गये लाठियों के डर से...? चुपचाप! अपने घरों के किसी कोने में रजाई के भीतर दुबक कर बैठ गये और वो....  सड़कों पर उतर आयीं हैं उन्होनें सुना - संविधान खतरे में है! उन्होंने फ़ौरन खिड़कियाँ खोल दी सारे दरवाजे खोल दिए वे चौखटें लाँघ आयीं हैं (शाहीन बाग की आन्दोलनरत औरतें) दूधमुँहे बच्चों को भी साथ ले लिया है और अपनी छातियों से चिपकाए फिरती हैं हाड़ कँपाने वाली ठंड भी उनके इरादों को कमजोर नहीं कर पायी है आधी रात को भी वो सड़कों से नहीं उठ रही हैं वो शाहीन बाग की बाग़ी औरतें हैं जो चौखटे लाँघ आयी हैं जिन्होनें बाबरी खोने के बाद उफ्फ़ भी नहीं की थी वो सविंधान की मर्यादा टूटते न देख सकीं नहीं बनने देंगी वो संविधान के पन्नों को चाइना बल्ब की झालरें वो नारें लगाएंगी ! वो कागज नहीं दिखाएंगी ! वो आजादी लेकर रहेेंगी ! वो इंकलाब चिल्लाएंगी ! वो शाहीन बाग की बागी औरतें हैं ! वो बगावत पर उतर आयी हैं ! वो संविधान को बचाएंगी ! © गुड़िया तबस्सुम