चंदना तथा अन्य कविताएँ
चन्दना •••••••• ( बुद्ध से विकर्षण चन्दना को जैन-भिक्षुणी बना देता है) ( दृश्य -एक) किलन्हाई के दक्षिणी घाट पर बारिश से भीगी चन्दना अपनी सफेद धोती के उर्ध्व भाग को हवा में झटकते हुए दूसरे घाट पर सद्यस्नात बुद्ध को देखती है जैसे सीय ने राम को जैसे चाँदनी ने चकोर को जैसे मैंने तुम्हें पहली बार देखा है ( दृश्य-दो) वृद्ध चाँदनी में लिपटे रवि शिशु की तरह किलन्हाई की जलधारा में सद्यस्नात बुद्ध दीपदान करते हुए अजपा जप रहे हैं जैसे अपने अन्तर्मन में किसी को आमंत्रण दिया हो ( दृश्य-तीन) कौशाम्बी के अंतिम छोर तक फैले , फूले कास , कुश , सरपत , गारण तुलसी , धान-मंजरी भंवरों और तितलियों का केलि-रव किलन्हाई से शशि- डाह करने के लिए पर्याप्त है ( दृश्य- चार) चंदना धान के बीचोबीच मेड़ पर गिरती , सम्भलती सरपट नंगे पाँव भागती है जैसे सद्यस्नात बुद्ध ने उसे छूना चाहा हो ( दृश्य-पांच) किलन्हाई के दक्षिणी तट पर धान- मंजरियों से भीगी , भागती चंदना बुद्ध के ऊपर कभी कास , कभी सरपत के फूल फेंक रही है ...