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भुईरा दादा

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भुईरा दादा सांझ होते ही गलारियों के हांकने की आवाज़ थम जाती  अधबुढ़ स्त्रियाँ नित्यक्रिया के लिए घरों से बाहर निकलतीं अकेले नहीं, दो चार के समूह में वे किसी सरकारी चापे की तरह  धीरे धीरे भुईरा दादा के खेत की ओर दाखिल होतीं यह वही समय होता जब अनावृत मौन स्त्रियाँ सबसे ज्यादा मुखरित होतीं ठीक उसी वक्त भुईरा दादा कंधे पर वह मटमैली धोती डालते जो अब फटकर गमछा हो चुकी थी लाठी उठाते धीरे धीरे घोड़े की टाप की तरह लाठी पटकते, खांसते चौपाल की तरफ चले आते यह कोई मान्य चौपाल नहीं थी। अर्द्धगीली लकड़ियों और कण्डें की अलाव होती टुनटुन बढ़ई होते ,डॉक्टर लाला,रनवा ठाकुर और घनश्यमवा पंडित और उनके छगनमगन।  भुईरा दादा उन्हीं के बीच बैठते सुर्ती मलते ,कहानियाँ सुनाते, उनके कहानियों में शामिल होते- फसलों को चरने वाले जानवर, डाई-पोटास की मंहगाई,परती खेत और भूख-प्यास...  कहते हैं भुईरा दादा को किसी ने हंसते हुए नहीं देखा था, किन्तु उस रोज अपनी शादी की घटना  पर वह खूब हंसे थे। कहते हैं कि उस दिन रेडियो पर मुहम्मद रफी का  गीत" चांद मेरा दिल,चाँदनी हो तुम" देर...