संदेश

मार्च, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जब भी सोचता हूं

जब भी सोचता हूं अम्मा! मुझे तुम्हारा चेहरा याद आता है। याद आता है मुझे पुरानी कोठरी जहाँ तुम खांसते खांसते ढेबरी को बुझा देती और किसी एकांत की तलाश करती ताकि जी भर कर खांस सको। अम्मा! तुम्हारी यह खांसी तुम्हारी अपनी हो गयी है। जब भी सोचता हूं अम्मा ! तुम्हारा मिट्टी का बना चूल्हा याद आता है गीली लकड़ियों और गीले कंडों से , खाना पकाने के लिए घण्टों- घण्टों जूझती रहती थी.. जब भी सोचता हूं अम्मा! वह भादों का महीना याद आता है घर के चारों ओर कीचड़ से बजबजाती गलियाँ जो हर शाम झींगुरों,टिड्डों,पाखियों से भर जाती थी.. मुझे याद आता है अम्मा ! तुम्हारा गाय ,भैंसों का दुहना। मुझे याद आता है अम्मा! तुम्हारी फटी हुई बिवाईयां जिससे रिसता रहता था खून.. अम्मा ! मुझे याद आता है तुम्हारे टोटके जो तुम अक्सर ग्रहण में करती थी ताकि उसका प्रभाव हम पर न पड़े अम्मा! मुझे याद आता है तुम्हारा वह विद्रोही स्वर जब बाबू किसी पंडा या फकीर को घर बुलाते और तुम कहती.. " किस्मत हमारी नहीं तुम्हारी खराब है.." और फेंक देती उन ताबीजों को जो किसी प्रेत से बचने के लिए बनाए...

शेष रह जाती हैं स्त्रियाँ

हर रोज सुबह बसुली,कुदाल,फावडा़... लिए हुए मजदूरों का झुंड शहर की ओर भागता है। हर रोज सुबह ही भागते हैं चील,कौवे और गिद्ध. हर रोज सुबह ही भागते हैं पंडित, मौलवी और पादरी... बस... शेष रह जाती हैं स्त्रियाँ और उनको निगलता हुआ अंधेरा...

''बहुत दिनों के बाद''

बहुत दिनों के बाद  आज तुम मुझे अच्छी लगी। अच्छी लगी तुम्हारी धूल में लिपटी दीवार के कोने में टंगी तस्वीर जिसे देखकर मैं अक्सर नये सपनों को गढ़ने लगता था और तुम धीरे से उन सपनों के बीच से गुजर जाती थी। मेरा अंतहीन ह्रदय सुगंधित होने लगता और टपकने लगता तुम्हारी देह से मय, मेरा मैं तुम्हारे मय में डूब जाता, फिर तुम शून्य हो जाती तुम्हारा शून्य मेरे अंतहीन ह्रदय में खो जाता। बहुत दिनों के बाद मैने महसूस किया है तुममें छिपा अपनेपन को जो किसी समय दब गया था । बहुत दिनों के बाद तुम्हारे बदन से टपका है महुए का रस, गेसुओं से सरसों की गंध और होठों से तिलमिलाता अनुराग। बहुत दिनों के बाद मैने चूमें हैं तुम्हारे हाथ,तुम्हारे गाल और अंत में रख दिया हूं तुम्हारे होंठों में अपने होंठ। बहुत दिनों के बाद तुम मुझे प्रतिमानों से अलग अपनेपन में नज़र आयी हो। "सुशील द्विवेदी "

''जहाँ धूप आकार लेती हैः प्रकृति, संगीत और देश की ऐंद्रीय एकता''

दुर्गा प्रसाद गुप्त के कविता संग्रह ‘जहाँ धूप आकर लेती है’ में सामान्यतः तीन शब्द ‘प्रकृति’, ‘सगीत’, और ‘देश’ अधिक बार प्रयुक्त हुए हैं। ये तीनों शब्द एक दूसरे से संबंधित हैं। इन्हीं शब्दों के माध्यम से कई तरह के पाठ किये जा सकते हैं। यदि हम ‘प्रकृति’ को ‘स्त्री’ ‘संगीत’ को ‘कविता’ और देश को काव्य सृजन का स्थान मान लें तो पूरी कविता स्त्री, परम्परा, संस्कृति तथा वैचारिकी के रूप में दिखाई देगी। इसके अलावा महानगरी समस्या, सांस्कृतिक समस्या, पर्यावरणीय समस्या से संबंधित समस्यामूलक पाठ भी हो सकता है। समस्या मूलक पाठ वैचारिकी का पाठ है। ‘कविता’ में भाव या इच्छाशक्ति ;ूपसस चवूमतद्ध अधिक दिखाई देती है। यही इच्छा शक्ति या भाव उन्हें बंधन से निकालकर उन्मुक्त कर देते हैं। समाज से परे एक नई दुनिया का सृजन करने लगते हैं। इस सृजन के दौरान वह उन्मुक्त के संसाधनों की सृष्टि करने लगते हैं। ‘निर्जन में संगीत’ इनकी ‘‘बंधन से उन्मुक्तता’’ की कविता है जिसमें कलाकार अपने यंत्रों के माध्यम से संसारिकता से परे एक नये जगत का निर्माण करता है। इस सृजन के दौरान वह संगीत की बनी बनाई परिपाटी से अलग हटकर अंतिम ज...

ज्वालामुखी के मुहाने : संस्थानीकरण पर एक बहस

ज्वालामुखी के मुहाने : संस्थानीकरण पर एक बहस सुशील द्विवेदी शोध-छात्र ( जामिया मिल्लिया इस्लामिया ) केन्द्रीय विश्वविद्यालय           मलखान सिंह सहज संवादी रचनाकार हैं। वह अपने समय और समाज से संवाद करते चलते हैं। संवाद के समय वह विवेकशून्य नहीं होते और न किसी गढ़ी गई परिपाटी पर चलना पसन्द करते हैं। इस नाते मलखान सिंह अपनी ओर अधिक आकर्षित करते हैं। इनका ‘‘ ज्वालामुखी के मुहाने ’’ (2016) कविता संग्रह संस्थाओं के पुनर्विचार का संग्रह है। इस संग्रह में मलखान सिंह संस्थानीकरण के दुर्ग को ढहाते चलते हैं। फिर एक नया दुर्ग बनाते हैं। इसी संग्रह में ‘ ज्वालामुखी के ‘‘ मुहाने ’’ एक छोटी कविता है। कविता संस्थान-निर्माताओं के मदमयता को तोड़ती है। कविता का अंतिम बंद महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें ‘‘ ज्वालामुखी ’’ विधि अधीनस्थ लोगों की आत्मबल और ऊर्जा का प्रतीक है जबकि ‘‘ मुहाना ’’ संस्थानों से बाहर निकलने वाला द्वार है। जहाँ स्वच्छदता है , आज़ादी है , बंधुत्व है , समानता है , आनन्द है। विधि निर्माता अपने बनाय गये नियमों से इस मुहाने को रोकता है। इस प्रक्...