जब भी सोचता हूं
जब भी सोचता हूं अम्मा! मुझे तुम्हारा चेहरा याद आता है। याद आता है मुझे पुरानी कोठरी जहाँ तुम खांसते खांसते ढेबरी को बुझा देती और किसी एकांत की तलाश करती ताकि जी भर कर खांस सको। अम्मा! तुम्हारी यह खांसी तुम्हारी अपनी हो गयी है। जब भी सोचता हूं अम्मा ! तुम्हारा मिट्टी का बना चूल्हा याद आता है गीली लकड़ियों और गीले कंडों से , खाना पकाने के लिए घण्टों- घण्टों जूझती रहती थी.. जब भी सोचता हूं अम्मा! वह भादों का महीना याद आता है घर के चारों ओर कीचड़ से बजबजाती गलियाँ जो हर शाम झींगुरों,टिड्डों,पाखियों से भर जाती थी.. मुझे याद आता है अम्मा ! तुम्हारा गाय ,भैंसों का दुहना। मुझे याद आता है अम्मा! तुम्हारी फटी हुई बिवाईयां जिससे रिसता रहता था खून.. अम्मा ! मुझे याद आता है तुम्हारे टोटके जो तुम अक्सर ग्रहण में करती थी ताकि उसका प्रभाव हम पर न पड़े अम्मा! मुझे याद आता है तुम्हारा वह विद्रोही स्वर जब बाबू किसी पंडा या फकीर को घर बुलाते और तुम कहती.. " किस्मत हमारी नहीं तुम्हारी खराब है.." और फेंक देती उन ताबीजों को जो किसी प्रेत से बचने के लिए बनाए...