साक्षी वर्मा की कविता
सो जाऊं क्या ? सो जाऊं क्या ? लंबे सफर में एक लंबे अरसे से चलती रही हूं मैं बहुत दूर जाना है मुझे,इन रातों में जुगनुओं सी जलती रही हूं मैं नींद कहीं पीछे किसी कूंचे पर रख छोड़ आई हूं वापस ले आऊं क्या? थोड़ी देर सो जाऊं क्या? ये दर्द राहगीर बन साथ चले हैं मेरे, मानो इनकी हमसफ़र हुई हूं मैं तनहाई रातों में स्याही बन पीछे पड़ी है, टूटने पर और तोड़ी गई हूं मैं ये आंखें अब सूख चुकी है तुम पूछो हाल मेरा, मैं आंसू फिर से भर लाऊं क्या? इन गलियों से गुजरते अपनी ही दास्तां के ज़िंदा किरदार देखती आ रही हूं मैं, तुम इस फसाने से अंजान लगते हो कहो तुम्हे भी सुनाऊं क्या? क्या सुनाऊं तुम्हे भी मेरी ज़िन्दगी की चीखती खामोशी उस खामोशी से कुछ कहती मेरी तनहाई एक बेज़ुबां सी बोली सुनती मेरी परछाई मेरे ही साथ न जाने कितने रिश्ते लिए चलती मेरी परछाई कभी रोती तो कभी लडती,कभी गिरती और फिर खड़ी होती मेरी परछाई हर रोज़ एक जंग,हर रोज़ एक सी जंग लडत...