"कविता"
'तुम्हारी साधना के बगैर मैं अधूरा हूं' •••••••••••••••••••••••••••••••••• वर्षों से जिसका मैं कठिन साधक हूं वही प्राण प्रिय शब्द, विलीन होते जा रहे हैं और मैं हूं अपनी अंतस्साधना में मग्न तिरोहित ,समयातीत तंत्र विद्याओं से युक्त निष्णात् , किन्तु अब मैं थक गया हूं हे प्राण प्रिय शब्द! उतरो,अविलम्ब उतरो मेरे मानस के गह्वर,गिरि,कानन में उतरो कि हृदय की वन्ध्या धरती सिंचित हो, उपजे जौ,अक्षत हे सरस-पुष्प! आओ मेरे कोटरों से झांको और नव शावक- शुक को प्यार करो उन्हें प्रभाती के गीत सुनाओ। कंठ दो उन्हें, ताकि वे गायें- प्रेम के गीत और झूमें,कलरव करें कि मेरे मानस का रेशा- रेशा जग जाये। हे पुनीत, सनद-पुत्र! आओ, कि ऋचाएं स्वतः प्रस्फुटित हों •••••••••••••••••••••••••••••••••• © सुशील द्विवेदी