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"कविता"

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'तुम्हारी साधना के बगैर मैं अधूरा हूं' •••••••••••••••••••••••••••••••••• वर्षों से जिसका मैं कठिन साधक हूं वही प्राण प्रिय शब्द, विलीन होते जा रहे हैं और मैं हूं अपनी अंतस्साधना में मग्न तिरोहित ,समयातीत तंत्र विद्याओं से युक्त निष्णात् , किन्तु अब मैं थक गया हूं हे प्राण प्रिय शब्द! उतरो,अविलम्ब उतरो मेरे मानस के गह्वर,गिरि,कानन में उतरो कि हृदय की वन्ध्या धरती सिंचित हो, उपजे जौ,अक्षत हे सरस-पुष्प! आओ मेरे कोटरों से झांको और नव शावक- शुक को प्यार करो उन्हें प्रभाती के गीत सुनाओ। कंठ दो उन्हें, ताकि वे गायें- प्रेम के गीत और झूमें,कलरव करें कि मेरे मानस का रेशा- रेशा जग जाये। हे पुनीत, सनद-पुत्र! आओ, कि ऋचाएं स्वतः प्रस्फुटित हों •••••••••••••••••••••••••••••••••• © सुशील द्विवेदी

मुक्तिबोध की कविता

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जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरज एक जॉबर-सा बराबर रौब अपना गाँठता-सा है कि रोज़ी छूटने का डर हमें फटकारता-सा काम दिन का बाँटता-सा है अचानक ही हमें बेखौफ़ करती तब हमारी भूख की मुस्तैद आँखें ही थका-सा दिल बहादुर रहनुमाई पास पा के भी बुझा-सा ही रहा इस ज़िन्दगी के कारख़ाने में उभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहा बेरुह इस काले ज़माने में जब दुपहरी ज़िन्दगी को रोज़ सूरज जिन्न-सा पीछे पड़ा रोज़ की इस राह पर यों सुबह-शाम ख़याल आते हैं... आगाह करते से हमें... ? या बेराह करते से हमें ? यह सुबह की धूल सुबह के इरादों-सी सुनहली होकर हवा में ख़्वाब लहराती सिफ़त-से ज़िन्दगी में नई इज़्ज़त, आब लहराती दिलों के गुम्बजों में बन्द बासी हवाओं के बादलों को दूर करती-सी सुबह की राह के केसरिया गली का मुँह अचानक चूमती-सी है कि पैरों में हमारे नई मस्ती झूमती-सी है सुबह की राह पर हम सीखचों को भूल इठलाते चले जाते मिलों में मदरसों में फ़तह पाने के लिए क्या फ़तह के ये ख़याल ख़याल हैं क्या सिर्फ धोखा है ?... सवाल है। (संभावित रचनाकाल 1948-50, अप्रकाशित)

लेख

इलावास से इलाहाबाद और फिर प्रयागराज बनने की कहानी, इतिहासकार की जुबानी NOV 02 , 2018 प्रो. हेरम्ब चतुर्वेदी शेक्सपीयर ने कहा था, “नाम में क्या रखा है?” रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है, “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध/ जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध”। यह मानते हुए भी कि नाम बदलने से कुछ नहीं होता फिर भी इतिहास के क्रूर मूल्यांकन में अपना पक्ष शिद्दत से रखना जरूरी होता है। दुष्यंत कुमार ने कहा भी है, “हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग/रो-रो के बात कहने की आदत नहीं रही”।  इतिहास के क्रम को नजरंदाज करके मानव-विकास के क्रम को हम नहीं समझ सकते। शासन का मूल्यांकन बाद की प्रक्रिया है, पहले सभी चरण इतिहास के विवरण में सम्मिलित तो हों? हम भारतीय इतिहास के प्राचीन काल को 10वीं सदी में समाप्त कर के सीधे 21वीं सदी की बात करके क्या मानव के विकास के क्रम को सत्यता, तार्किकता, तथ्यात्मकता, वैज्ञानिकता के बोध से चित्रित कर पाएंगे? क्या इतिहास मानव-विकास का क्रमबद्ध अध्ययन नहीं है? यदि है, तो हमें भारत के प्राचीन के साथ मध्यकाल के अध्ययन के बाद ही आधुनिक काल में प्रवेश ...

बाबी यार

बाबी यार •••••••••••••••••••••••••••••••••••• बाबी यार पर कोई स्मारक नहीं सिर्फ एक खड़ी चट्टान, कब्र के बेडौल पत्थर की तरह मुझे लगता है मैं उतना ही पुराना हूं जितनी समूची यहूदी जाति मैं खुद को एक प्राचीन इजरायली की तरह देखता हूँ मैं प्राचीन मिस्र की सड़कों पर भटकता हूं और यहाँ, क्रांस पर ,यातनाएँ झेलता हुआ मरता और आज भी मुझ पर कीलों के निशान मौजूद हैं मुझे लगता है कि मैं ही ड्रेफस हूं फलस्तीनियों ने मुझे धोखा दिया और अब फैसला दे रहे हैं मैं एक पिंजरे में हूं,घिरा हुआ और कैद मुझे सताया जाता है, मुझ पर थूका जाता है झूठी निंदा की जाती है ,और ब्रुसेल्स के भड़कीले कपड़ों में सुरुचिसम्पन्न सुन्दरियां मेरे चेहरे पर अपनी छतरियां चुभोती किलकारियां मारती हैं मैं खुद को बेलोस्तोक में एक लड़के की तरह देखता हूं फर्श पर खू़न बिखरकर बहता है बर और पबों के लीडर गुस्से में फट पड़ते हैं और वोदका और प्याज की गंध मारते हैं एक बूट मुझे पीछे फेंक देता है,मुझमें कोई ताकत नहीं बची मैं व्यर्थ ही नरसंहार करने वाली भीड़ के आगे गिड़गिड़ाता हूं उन्मादी नारों के आगे ' यहूदियों को मारो...

इलाहाबाद बनाम प्रयाग

दरअसल सवाल यह नहीं है कि इलाहाबाद का‌ नाम बदलकर प्रयाग रख देने से हमारा मान बढ़ जायेगा, हमारी संस्कृति की रक्षा होगी। हम अपनी परम्परा से सीधे जुड़ेंगे। सवाल यह भी नहीं है कि हमारी जब़ान में इलाहाबाद का नाम इतना चढ़ गया है कि प्रयाग कहने में अटपटा लग रहा है।‌ कोई भी नाम जो प्रचलित है उसे बदल देने से दो चार पीढ़ियाँ भले ही अपने को असहज महसूस करें, अपना को कटा हुआ पायें किन्तु एक समय के बाद हम उस नाम के आदी हो जाते हैं।  'प्रयाग संगीत समिति' ,प्रयाग महिला विद्यापीठ ,  प्रयाग जंक्शन का नाम बदलकर हम कोई दूसरा नाम रख दें तो क्या लोक उसे स्वीकार करेगा?  ऐसा करना इतना आसान नहीं है जितना हम सोचते हैं।  लोक में आज भी यह भावना नहीं है कि इलाहाबाद शब्द से मुस्लिम संस्कृति का बोध होता है या प्रयाग से हिन्दू संस्कृति का। हमारी परम्परा का। लोक इन सब बातों पर अधिक ध्यान नहीं देता है, उसके लिये ये सब अनर्गल बातें हैं। वह अपने ही प्रेम के नशे में स्वयं को सम्पृक्त पाता है। किसी की परवाह किये बिना अपने ही अंदाज़ में जीता है। भला दो चार किताबें, दस बीस ग्रंथों को  पढ़ लेने से लोक ...