"कविता"

'तुम्हारी साधना के बगैर मैं अधूरा हूं'

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वर्षों से जिसका मैं कठिन साधक हूं
वही प्राण प्रिय शब्द,
विलीन होते जा रहे हैं
और
मैं हूं अपनी अंतस्साधना में मग्न
तिरोहित ,समयातीत
तंत्र विद्याओं से युक्त
निष्णात् ,
किन्तु अब मैं थक गया हूं
हे प्राण प्रिय शब्द!
उतरो,अविलम्ब उतरो
मेरे मानस के गह्वर,गिरि,कानन में
उतरो कि हृदय की वन्ध्या धरती
सिंचित हो, उपजे जौ,अक्षत
हे सरस-पुष्प!
आओ मेरे कोटरों से झांको
और नव शावक- शुक को प्यार करो
उन्हें प्रभाती के गीत सुनाओ।
कंठ दो उन्हें,
ताकि वे गायें-
प्रेम के गीत और झूमें,कलरव करें
कि मेरे मानस का रेशा- रेशा जग जाये।
हे पुनीत, सनद-पुत्र!
आओ,
कि ऋचाएं स्वतः प्रस्फुटित हों

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© सुशील द्विवेदी

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