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अगस्त, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कुछ सवाल,कुछ जवाब

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  ( मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार से सम्मानित युवा कवि- उपन्यासकार तेज प्रताप नारायण से सुशील द्विवेदी की बातचीत । ) तेजप्रताप नारायण   सवाल :  कविता के सन्दर्भ में आपकी क्या राय है? जवाब : कविता को मैं मानव मन की  अभिव्यक्ति मानता हूँ जो व्यक्तिगत और सामाजिक संवेदनाओं का प्रतिफलन होती है ।इस लिए कविता स्वान्तः सुखाय भी हो सकती है और समाजोन्मुखी भी। कवि का परिवेश, तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक ,भौगोलिक ,आर्थिक और वैश्विक परिस्थितियों का भी कविता के कथ्य पर प्रभाव होता है ।कविता का शिल्प कवि का स्वयं का बुना होना चाहिए ।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कविता में अवास्तविक शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए । आजकल बहुत सारे कवि विज्ञान परक कविताएँ भी लिख रहे हैं ।विज्ञान के कई सारे शब्द जैसे बिग बैंग ,गैलेक्सी आदि का कविता में बिम्ब के रुप में प्रयोग हो रहा है जिससे कविता में वस्तुपरकता बढ़ी है । कविता का विस्तार हुआ है । सोशल मीडिया के आने से भी कविता जन जन तक पहुंच रही है ।समाज का कमज़ोर  तबका भी कविता के माध्यम से अपनी आवाज़ समाज तक पहुंचा रहा है ।कविता केव...

स्मृतियों का सघन कोलाज : माओ के देश में

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 ( लेखक डॉ. जगदीश सौरभ झारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर और युवा कवि-समीक्षक हैं) डॉ. जगदीश सौरभ अपनी कसी हुई दुनिया में उलझे  लोगों के पास बाहर झाँकने के झरोखे कम होते हैं. विज्ञान और तकनीकी ने मनुष्य से जो एक वादा किया था कि वह मशीने बनाएगा और इन्सान को फुर्सत होती जाएगी। अबतक जितने मशीने बनी, इस हिसाब से आदमी को फुरसत में हो जाना चाहिए था। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। आदमी व्यस्त से व्यस्ततम होता गया। सोचने-समझने की जगहें लगातार सिकुड़ती गयीं। आजकल, अगर मज़ाक में कहें, तो विद्वता की डिग्रियाँ भी फेसबुक और वाट्सएप से बाँटी जा रही हैं. हालाँकि यह मजाक नहीं है, क्योंकि अंग्रेजी की एक मशहूर कहावत है- ‘जोक इज़ अ सीरियस बिजनेस।' मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि हमें बहुत सारी चीजों के बारे में थोड़ा-थोड़ा जानना चाहिए और थोड़ी सी चीज़ों को बहुत ज़्यादा। अब जबकि पढ़ना-पढ़ाना अगर आपका पेशा भी हो तो यह ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है। आपके पेशे की संरचना यह मांग करती है कि साहित्य से संलग्न संस्कृति, धर्म, कला, दर्शन के साथ आपको विज्ञान, तकनीकी, इतिहास, भूगोल, समाज और अर्थव्यवस्था की बुन...

शौक ए दीदार है तो नज़र पैदा कर : "डिजिटल फोटोग्राफी

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( लेखक आत्मानन्द कश्यप सुपरिचित फोटोग्राफर और स्तम्भकार हैं) आत्मानंद कश्यप फोटोग्राफी की एक ऐसी विधा  जिसमे बहुत सारे इलेक्ट्रॉनिक फोटोडिटेक्टेर्स वाले कैमरे का प्रयोग लेंस द्वारा निर्दिष्ट की गयी वस्तु का फोटो बनाने के लिए करते हैं,यह फोटोग्राफिक फ़िल्म पर किसी वस्तु की अनावृत्ति से एकदम भिन्न है। इसके द्वारा खींची गयी फोटो को डिजिटल फॉर्म में किसी भी कंप्यूटर फाइल के रूप में रखा जा सकता है।  इस फाइल का उपयोग हम डिजिटल प्रोसेसिंग, डिजिटल पब्लिसिंग, फोटो को देखने अथवा उसका प्रिंट आउट निकालने के लिए कर सकते हैं। दुनिया में आम उपभोक्ता के प्रयोग वाला पहला डिजिटल कैमरा सन 1990 में बाजार में उपलब्ध हुआ, पेशेवर तौर पर फोटोग्राफी करने वाले लोग जल्द ही इसके प्रति आकर्षित होने लगे क्योंकि डिजिटल फाइल्स के माध्यम से वे अपने ग्राहकों और नियोक्ताओं को पारंपरिक फोटोग्राफी की तुलना में अधिक शीघ्रता से बेहतर परिणाम प्रदान कर सकते थे। सन 2007 के बाद से स्मार्ट्फोन में भी डिजिटल कैमरा लगाया जाने लगा और आने वाले समय में सोसल मीडिया, ई मेल और वेबसाइट मे आसानी से उपयोग की जा सकने वाली तस्वीरों क...

साहित्य सम्बन्धी प्रेमचंद की चिंतन-दृष्टि

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    आशुतोष तिवारी  (लेखक आशुतोष तिवारी दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र हैं | आप उनसे दिए गये संपर्क सूत्र से संवाद कर सकते हैं पता- डी.एस. कोठारी हॉस्टल, दिल्ली विश्वविद्यालय ई-मेल- ashutoshtiwari2017@gmail.com मो. 7503805703) साहित्य क्या है? साहित्य किसके लिए है? और साहित्य में क्या होना चाहिए? इन प्रश्नों के सबके लिए अलग-अलग मायने हैं। चूँकि हर साहित्यकार की सोचने समझने की दशा और दिशा काफी हद तक अपने समकालीन परिवेश से निर्मित होती है, इसीलिए प्रेमचंद की साहित्य-चिंतन दृष्टि पर हमें गाँधी के मूल्यों, स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जोर-आजमाइश करते लोगों की आशाओं-अपेक्षाओं, द्विवेदीयुगीन नैतिकता एवं पूँजीवादी-सामंतवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में उभरे साम्यवादी मूल्यों का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। उल्लेखनीय है कि यह प्रभाव उनके यहाँ अंधानुकरण में तब्दील नहीं होता है क्योंकि बाकौल, जैनेन्द्र कुमार 'उनकी कलम अँधेरे में भी धोखा नहीं खाती है।' 1   प्रेमचंद मतलब एक साधारण खाते-पीते निम्नमध्यवर्गीय किसान घर का आदमी, जिसके पास इतना तो है कि वह अपने को जिन्...