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वह और मैं

उसने कहा- 'मुझे देखो' मैंने कहा - 'किताबें मुझे अधिक ‌पसन्द हैं' फिर उसने कहा  - 'मुझे स्पर्श करो' मैंने कहा - 'किताबों का स्पर्श मुझे अधिक प्रिय है।' उसने कहा - 'तुम' मैंने सुना - 'हम' फिर क्या.... मैंने कहा- 'तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय हो' उसने कहा - 'किताबें मुझे अधिक प्रिय हैं.... © सुशील द्विवेदी

इधर तो मेरा कमरा नहीं है

इधर तो मेरा कमरा नहीं है आज जब दिल्ली के सर्द मौसम में बेवज़ह अकेला टहल रहा हूं ,न जाने क्यों मुझे पिता जी की याद आ रही हैं । बचपन में मुझे कहानियाँ सुनने का बड़ा शौक़ था। जब तक एक- दो कहानियाँ सुन नहीं लेता,मुझे नींद नहीं आती थी। कई बार तो कहानियाँ सुनने के चक्कर में मार भी खानी पड़ती, दिन भर के कामकाज से थकी मां,मुझे कहानियाँ सुनाएं या थोड़ी देर आराम करें' ,उनके विषय में न मैं सोचता था और न इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता । मां की डांट या मार के लिए मैं हमेशा तैयार रहता किन्तु अपनी कहानियाँ सुनने की जिद में डटा रहता। आखिरकार मेरे ज़िद के आगे मां को हारना पड़ता। रात में सबका बिस्तर लगाने और जरुरी काम करने के पश्चात लगभग दस ग्यारह बजे तक वह अपना बिस्तर तैयार करतीं फिर कहीं मुझे कहानियाँ सुनाती। उनके कहानियों में शामिल होते थे - 'सीकन की गाड़ी , दुई मूस नाधे‌ जाएं' या फिर चिड़िया- चुरुकवा। उन दिनों मुझे तनिक भी एहसास नहीं होता था कि आखिर मां की कहानियों के विषय में ये सब  क्यों शामिल होते हैं? किन्तु आज जब मैं सोचता हूं तो आंखों से अनायास ही आँसू टपक पड़ते हैं। कभी- कभी...