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जनवरी, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सपना तंवर की चयनित कविताएँ

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नवांकुर कवयित्री सपना तंवर की कविताएँ जीवन के गहरे बोध से जुड़ी हैं.इनका स्वर मोमबत्ती के मद्धिम प्रकाश की तरह है.समय के तनाव व समाज के बाइनरी के बीच सहज और शेड्स के रूप में देखती हैं.इनके यहाँ पुरुष सत्ता का नकार भी सकारात्मक है. उसे सहयोगी के रूप में देखती हैं.उसके टूटने पर उसे संभालने की कोशिश करती हैं.बिम्बों और प्रतीकों के अत्यधिक भार से बचती हैं.नये शिल्प को गढ़ने का प्रयास करती हैं.    1. सपना तंवर तुम्हे मैं नदी का वो छोर समझ बैठी थी ,   जहाँ से मेरा जीवन ठहरा सा दिखता था ,   तुमने बहाव ला कर , नदी में तूफान ला दिया ,   औऱ वो जो मेरा था ,  उसे बहा दिया , समझा दिया मुझे , अर्थ क्या ?   ठहरा सा कुछ नही यहां ,  जो ठहर सका , वह "बदलाव" यहाँ। 2 .टूटा हुआ  तुझे देख, तेरी आँखों मे, मुझे टूटा हुआ सूरज नज़र आता है, टूटा सूरज वो, जो तूने अपने सपनो से बुना, ढल गई रोशनी, बिखर गई रोशनी, तेरे सपनो के आँचल की, शाम हो आई तेरे जीवन मे, तुझे देख, जीवन की थकान का मंजर दिखता है ।। उठ, देख सूरज ढल गया, यह निशानी, ...

“गुलाबी चप्पल”

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Susheel Dwivedi Editor at Hastank “गुलाबी चप्पल” ‘’बाई’ खुश थी कि उसे मिलेगी  एक जोड़ी गुलाबी चप्पल लाल हरे पीले चटक रंगों की बनी धारियों वाली गुलाबी चप्पल | जिसकी बद्धी में  सूअर के थूथुन जैसे बड़े बड़े फूल जड़ दिए गये हो | बा ई श बरस की बाई ने देखा था  एक बार दुधिया पैरों में गुलाबी चप्पल | हाँ ! तब से जिद कर लिया था अपने बबूली छाल वाले पैरों की खर्रादार एडियों में पहनेगी गुलाबी चप्पल ! बाई खुश थी ....!

शमशेर बहादुर सिंह और पाब्लो नेरुदा

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Susheel Dwivedi शमशेर बहादुर सिंह और पाब्लो नेरुदा        शायद इसी का नाम मोहब्बत है शेफ़्ता       एक आग सी है दिल में हमारे लगी हुई !                                 - मिर्ज़ा ग़ालिब मिर्ज़ा ग़ालिब का शे’र प्रणय जीवन के कसमसाहट को व्यक्त करता है | मोहब्बत और आग दो विरोधी चीजें हैं | मोहब्बत मलयानिल की तरह शीतल और सुखदायी होती है ,जबकि आग दाहक | शे’र में ये दोनों बिम्ब  एक साथ आते हैं | वस्तुतः सुख और दुःख प्रणय जीवन की अनुभूतियाँ हैं | इन्हीं अनुभूतियों के माध्यम से रचनाकार सामाजिक चितवृत्तियों  को उकेरने का प्रयास करता है |एक महान रचनाकार वह है जो वैयक्तिक प्रेम की सीमा को लाँघ कर सामाजिक प्रेम की ओर अग्रसर होता है | एक शे’र में उर्दू शायर फैज़ अहमद फैज़  लिखते हैं   “ और भी  गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा ,राहतें और भी हैं वस...