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कुछ रंग कुछ राग

कुछ रंग .. चटक ,मद्धिम गर्भ में पड़ा स्याह डॉक्टर,नर्श ,कैचीं, इंजेक्शन,एक्स रे मशीन बाहर बम धामाका टूटी हड्डियाँ फैला रक्त - मांस चील,कौवे ...उड़ गये कनस्तर में भरा मांस साद रहा है डॉक्टर उल्टा आला लटकाए पैर पटक रहा .. गर्भ का स्याह लाल हो गया गहरा लाल एक लड़की तन कर कड़ी हुई मर्द झुक गया ....

फिल्म समीक्षा

“ मर्द एक ऐसा दरिंदा है जो बड़ी ख़ुशी से एक स्त्री को वेश्या तो बना देता है लेकिन कभी किसी वेश्या को एक औरत के रूप में कुबूल नहीं कर सकता ” जय प्रकाश के निर्देशन में बनी फिल्म “मार्केट ” का यह वाक्य मर्दवादी इतिहास की जड़ें हिला देता है| बहुत दिन के बाद आज वेश्या जीवन पर बनी फिल्म देखने का मन किया | हलाकि वेश्या कहने मात्र से मेरे पुरुषवादी मानसिकता का भान हो जाता है लेकिन क्या करूं उस स्थिति के लिए मेरे पास शब्द नहीं है | बहरहाल फिल्म हैदराबाद के एक दालमंडी की  अबादगी से शुरू होती है | इस दालमंडी में चारों तरफ जिस्म के क्रय- विक्रय के बीच अफरा-तफरी मची हुई है | इस बाजार को “गिद्ध बाजार ” कहना अन्योक्ति नहीं होगी | कहानीकार “ अरशद सिद्धिकी ” ने मुस्कान के जीवन संघषों को कहानी का केंद्र बनाया  हैं | मुस्कान इस फिल्म की केंद्र बिंदु है |    प्रणय परिणय से बंधा  नीलू का पति उसे दालमंडी में चालीस हजार रुपये में बेच देता है|  बाद में उसका भाई उसे छुड़ा ले जाता है | रही बात  मुस्कान की तो उसकी शादी बचपन में शेख गफ्फार क...