फिल्म समीक्षा
“मर्द एक ऐसा दरिंदा है जो बड़ी ख़ुशी से एक स्त्री को वेश्या तो बना देता है लेकिन कभी किसी वेश्या को एक औरत के रूप में कुबूल नहीं कर सकता ”
जय प्रकाश के निर्देशन
में बनी फिल्म “मार्केट ” का यह वाक्य मर्दवादी इतिहास की जड़ें हिला देता है| बहुत
दिन के बाद आज वेश्या जीवन पर बनी फिल्म देखने का मन किया | हलाकि वेश्या कहने
मात्र से मेरे पुरुषवादी मानसिकता का भान हो जाता है लेकिन क्या करूं उस स्थिति के
लिए मेरे पास शब्द नहीं है | बहरहाल फिल्म हैदराबाद के एक दालमंडी की अबादगी से शुरू होती है | इस दालमंडी में चारों
तरफ जिस्म के क्रय- विक्रय के बीच अफरा-तफरी मची हुई है | इस बाजार को “गिद्ध
बाजार ” कहना अन्योक्ति नहीं होगी | कहानीकार “ अरशद सिद्धिकी ” ने मुस्कान के
जीवन संघषों को कहानी का केंद्र बनाया हैं
| मुस्कान इस फिल्म की केंद्र बिंदु है | प्रणय परिणय से बंधा नीलू का पति उसे दालमंडी में चालीस हजार रुपये में
बेच देता है| बाद में उसका भाई उसे छुड़ा
ले जाता है | रही बात मुस्कान की तो उसकी
शादी बचपन में शेख गफ्फार के साथ हो जाती है | शेख गफ्फार मुस्कान की उम्र से लगभग
चार गुना है | हफ्ते भर मुस्कान के साथ सेक्स करने के बाद उसे तलाक दे देता है |मुस्कान के पिता थाने में रिपोर्ट लिखवाने के
बाद वापस घर लौटते हैं जिस समय दुकान में
बैठे हुए लोग उन पर अपमानजनक टिप्पणी करते हैं | लोगों की इस टिपण्णी को वह सहन नहीं
कर पाते और रात को आत्महत्या कर लेते हैं
| पिता की मृत्यु के बाद मुस्कान किसी रिश्तेदार के साथ चली जाती है जिसे मुस्कान
चच्चा कहती है |एक रात पैर दबवाने के बहाने उसका चच्चा मुस्कान के साथ बलात्कार
करने की कोशिश करता है लेकिन बीच में पत्नी के
आ जाने पर मुस्कान बच जाती है|
यहीं से मुस्कान की जिंदगी एक गिद्ध बाजार की जिंदगी बन जाती है | आठ महीने
तारीख पर तारीख का इंतजार करते हुए उसके पति गफ्फार शेख को कोर्ट बइज्जत बरी कर
देता है | और शेख दुबई चला जाता है | यहाँ एक बात महत्वपूर्ण है कि पुलिस , न्यायाधीश ,और वकील रुपये के चक्कर में एक लड़की को न्याय न देकर एक मुल्ज़िम को बइज्जत
बरी कर देते हैं | साथ ही हैदराबाद की दालमंडी में रेड पड़ जाती
है और सारी वेश्याएं हैदराबाद छोड़कर मुम्बई चली जाती हैं |
मुंबई में मुस्कान की स्थिति हैदराबाद से
अच्छी नहीं कही जा सकती |लेकिन कुछ मायनों में कि उसे बबलू पांडेय जैसा पहला
व्यक्ति मिलता है जो उसे शादी के लिए प्रस्ताव रखते हुए यह कहता कि मै तुमसे प्यार
करने लगा हूँ तुम चाहो तो शादी कर सकती हो | इस पर मुस्कान कहती है कि “ मै एक ऐसे
मार्केट में हूँ जहाँ दिल की कोई वैल्यू नहीं है यहाँ सिर्फ बॉडी और जवानी बिकती
है ”| दूसरा की उसे लूसी जैसा हाई प्रोफ़ाइल दलाल मिलता है जो खुद को मार्केटिंग मैनेजर बताता है
| लूसी की वजह से मुस्कान जो मुंबई में मल्लिका नाम से जानी जाती है लीज़ा के साथ दुबई
जाती है | मुंबई पुलिस ,छोटे-छोटे गुंडों का इन वेश्यायों पर कहर देखकर मन ग्लानी
से भर जाता है |
दुबई में अन्ना नाम के एक अंडरवर्ल्ड डॉन के यहाँ आमंत्रित लीज़ा उसके साथ रूकती है |यहीं
मल्लिका की मुलाकात पुनः बबलू से होती है
वह उसे दुबई घूमाता है | एक रिजोर्ट में मल्लिका की मुलाकात शेख गफ्फार से होती है |मल्लिका उस पर झप्पटे मारती है
लेकिन बबलू आकर उसे रोक देता है | शेख गफ्फार
का असिस्टेंट शेख से कहता है कि “जब कोई औरत किसी से इंतकाम लेने की ठान लेती है
न तो वह नागिन से भी ज्यादा खतरनाक हो
जाती है ”| बाद में मुस्कान बबलू से अपनी
आपबीती बताती है तो वह दुबई के कानून का हवाला देते हुए शेख को न मारने के लिए
कहता है ,इस बात पर मुस्कान कहती है कि “मरने का डर उन्हें होता है जो जिन्दा हो
,मुस्कान तो दस साल पहले मर चुकी थी | ये जिस्म तो एक लास है जिसके हजार टुकड़े हो
जाये तो भी कोई दुःख नहीं मुझे ”|
दूसरी पत्नी और समाज के डर से शेख़ मुस्कान को मारने के लिए अन्ना को
पांच करोंड़ रुपये देता है | अन्ना अपने आदमियों को मुस्कान को मारने के लिए होटल
में भेजता है जहाँ मुस्कान रुकी हुई है लेकिन
उससे पहले लीज़ा बबलू को फ़ोन कर उसे बचाने
की गुहार लगाती है | बबलू मुस्कान को लेकर एयरपोर्ट पहुँचता है वहीँ अन्ना के
आदमियों से मुठभेड़ में बबलू की मृत्यु हो जाती है | मुस्कान पुनः अन्ना के यहाँ चली
जाती है | एक लघु संवाद होता है जिसमे एक जगह मुस्कान कहती है “औरत पर ताकत अजमाने
वाला मर्द नहीं नामर्द होता है ”|
बहरहाल मुस्कान अन्ना के माध्यम से शेख
को मारने में सफल होती है और ख़ुश-ख़ुशी मुंबई वापस लौट आती है | फिल्म इसी जगह आकर
ख़त्म हो जाती है |
वेश्या जीवन पर बनी फिल्मों के संवादों
में मुझे यह पहली फिल्म अच्छी लगी जिसके संवाद किसी पुरुषवादी मानसिकता की जड़े
हिलाने के लिए काफी हैं ||
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