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ज्योति तिवारी की चार कविताएँ

1.  नहाते हुए गीत गाने वाली स्त्री .. . नहाते हुए गीत गाने वाली स्त्री गीत गाने वाली कोयल है जो फूलों की डालियों के साथ काँच के पिंजरे में कैद है। गीत गाती स्त्री की बिछिया पहनने वाली उँगलियाँ गायब हैं मंगलसूत्र वाला गला अदृश्य है पर वह नाखून भर सिन्दूर जरूर लगाती है और आइने में उसकी एक गड्डमड्ड परछाई तैर जाती है। हकीकत में नहाते हुए गीत गाने वाली स्त्री उमस भरी बदरी है जो छत के एक कोने में आकर अटक जाती है और बरसने और ना बरसने के द्वद्व के बीच घुमडती रहती है। दरअसल वह गीत गाती स्त्री एक जादुई स्त्री है जिसके आँचल में एक मुट्ठी सधवा अनाज फसल बन लहलहाता हैक और जिसके आँखों का विधवा पानी सुन्दर आँखों वाली मछलियाँ हैं। 2- मेरे बच्चे की दुनियाँ मेरा बच्चा अब अ से अनार की जगह अ से आतंक पढता है उसकी वर्णमाला में क से कातिल और ख से खून भी है वह जानता है.... गुलेल को बन्दूक और कंचों को गोली बनाना पर फिर भी मैं उसे अ से अमन और क से कलम पढाना नहीं भूलती जिसे पढते वक्त वह बडी देर तक मेरी गोद में दुबका रहता है। मेरे बच्चे के लिए रंगों के मायने बदले से...
                                             पाठांतर सम्बन्ध : एक विवेचन ( विशेष सन्दर्भ आचार्य शुक्ल और माता प्रसाद द्वारा सम्पादित जायसी कृत पद्मावत )      दर असल पाठांतर की समस्या पाठक की समूची मनोदशा को बदल देती है | आधुनिक युग में यूरोपीय विद्वानों ने      पाठांतर की समस्या पर पहली बार विचार किया और पाया कि पाठांतर पाठ के  अर्थ निर्धारण की प्रक्रिया को           कमजोर बनाता है |हिंदी में जगन्नाथदास रत्नाकर ने बिहारी सतसई की पांडुलिपियों और टीकों के माध्यम से           बिहारी सतसई का एक नया पाठ निर्धारित  किया जो महत्वपूर्ण है | इनके बाद शम्भुनारायण चौबे ,माताप्रसाद           गुप्त आदि विद्वानों ने पाठांतर की समस्या का निर्धारण करते हुए नये नए पाठ तैयार किये |१९४२ ईस्वी में माता      प्रसाद गुप्त ने बनारसी ...

भारतीय साहित्य में तुलनात्मक अध्ययन की समस्याएं

भारतीय साहित्य में तुलनात्मक अध्ययन की समस्याएं                    भारतीय साहित्य अपने अमूर्तता में स्थानीय ,प्रान्तीय,तथा राष्ट्रीय संरचनाओं में सांस्कृतिक एकता को चिन्हित करता है | सर्वपल्ली राधाकृष्णन ,सुनीति कुमार चटर्जी जैसे विद्वानों ने भारतीय साहित्य कहने    पर बल दिया है |यदि हम भारतीय साहित्य के किसी विशेष कालखंड को देखें तो यह अपने संरचनात्मक स्तर में एक दिखाई देगा लेकिन समूचे प्रान्तीय साहित्य में स्वानुभूति की कमी अवश्य दिखाई देगी | इस प्रान्तीय साहित्य की अलग  अलग शैलियाँ हैं | भारतीय काव्यशास्त्र में इस शैली को रीति नाम दिया गया है |  वामन,दंडी, आदि विद्वानों ने अलग अलग रीतियों का उल्लेख किया है |                 भारतीय साहित्य अनेक जातियों ,संस्कृतियों ,सभ्यताओं तथा धार्मिक साहित्य का समुच्चय है | उदहारण के लिए भक्ति साहित्य दक्षिण के आलवारों के यहाँ से होते हुए कर्नाटक, महाराष्ट्र,गुजरात ,राजस्थान तक फैला हुआ है| यह साहित्य अपने आस्था ,मिथक व् अनुश्रुतियों मे...

जगुआ

चांदनी रात में  घडी के बारह बजे  मैं कनॉट प्लेस के बीचो-बीच पार्क में खड़े होकर चारो तरफ देखता हूँ  कि कनॉट प्लेस  शव वस्त्र में लिपटा हुआ दिखाई देता है  मैं बेतहासा भागता हूँ  कनॉट प्लेस का भूत मेरा पीछा करता करता है  रास्ते में मुझे  लुटियंस और हरबर्ट बेकर हाथों में सुन्दर दिल्ली का भविष्य लिए दिखाई देते हैं  उस पर मैं  झपट्टा मारकर टुकड़े टुकड़े कर डालता हूँ  और भागता हूँ  कि गाजियाबाद और कानपुर की  ऊँची-ऊँची फैक्ट्रियों की चिमनियों से टकरा जाता हूँ  चिमनियों से निकला हुआ धुंआ  काली साया सा मेरी आत्मा में प्रवेश कर जाता है  और मैं मूर्छित हो जाता हूँ  कुछ समय बाद मैं खुद को मजदूरों के बीच पाता हूँ  किसी रेलवे स्टेशन की गंध  अपनी आत्मा में लिए मजदूर  खुद को भारत भाग्य विधाता के परचम के नीचे  अस्तित्वहीन पाता है  और उसके बच्चे आँखों में तरुणाई का सपना लिए वृध्द हो गए हैं  पत्नियां बेवा हो गयी हैं  उनके नशों में...

कबीर का लोक और लोक के कबीर

कबीर का लोक और लोक के कबीर              लोक शब्द ऋग्वेद में जन,स्थान,दृष्टि आदि के रूप में आया है|  यह सर मोनियर विलियम्स के शब्दकोष में भी है| लेकिन अभिनव गुप्त के यहाँ( लोको नाम जनपदवासी जनः) जनपदीय समुदाय ही लोक है के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है| प्रारंभ से ही लोक दो पदों के अर्थ में ही प्रयुक्त होता रहा है |पहला-दार्शनिक पद के लिए जैसे –इहलोक ,परलोक ,पाताललोक आदि |दूसरा ग्रामीण रीतिरिवाजों,रुढियों  ,अन्धविश्वासों आदि   |लेकिन हिंदी में लोक फोक का अनुवाद है| लोक में शास्त्र मत मिला होता है |ग्राम्सी लोक को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने का आग्रह करते हैं |उनका मानना है कि प्रत्येक वर्ग का अपना लोकमत(कॉमन सेंस) होता है और साधुमत (गुड सेंस) भी ,जो उसकी विश्वदृष्टि भी है | यद्यपि लोकमत के निर्माण में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका होती है लेकिन वह मुख्यतः जनता के इन्द्रियबोध और अनुभव से बनता है ,इसलिए उसमें भौतिक तत्व की प्रधानता होती है और यथार्थपरकता  की भी |                कबीर के काव्य में लोक प...