ज्योति तिवारी की चार कविताएँ
1. नहाते हुए गीत गाने वाली स्त्री..
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नहाते हुए गीत गाने वाली स्त्री
गीत गाने वाली कोयल है
जो फूलों की डालियों के साथ
काँच के पिंजरे में कैद है।
गीत गाने वाली कोयल है
जो फूलों की डालियों के साथ
काँच के पिंजरे में कैद है।
गीत गाती स्त्री की
बिछिया पहनने वाली उँगलियाँ गायब हैं
मंगलसूत्र वाला गला अदृश्य है
पर वह नाखून भर सिन्दूर जरूर लगाती है
और आइने में उसकी एक गड्डमड्ड परछाई तैर जाती है।
बिछिया पहनने वाली उँगलियाँ गायब हैं
मंगलसूत्र वाला गला अदृश्य है
पर वह नाखून भर सिन्दूर जरूर लगाती है
और आइने में उसकी एक गड्डमड्ड परछाई तैर जाती है।
हकीकत में नहाते हुए गीत गाने वाली स्त्री
उमस भरी बदरी है
जो छत के एक कोने में आकर अटक जाती है
और बरसने और ना बरसने के द्वद्व के बीच
घुमडती रहती है।
उमस भरी बदरी है
जो छत के एक कोने में आकर अटक जाती है
और बरसने और ना बरसने के द्वद्व के बीच
घुमडती रहती है।
दरअसल वह गीत गाती स्त्री एक जादुई स्त्री है
जिसके आँचल में एक मुट्ठी सधवा अनाज
फसल बन लहलहाता हैक
और जिसके आँखों का विधवा पानी
सुन्दर आँखों वाली मछलियाँ हैं।
जिसके आँचल में एक मुट्ठी सधवा अनाज
फसल बन लहलहाता हैक
और जिसके आँखों का विधवा पानी
सुन्दर आँखों वाली मछलियाँ हैं।
2- मेरे बच्चे की दुनियाँ
मेरा बच्चा अब अ से अनार की जगह
अ से आतंक पढता है
उसकी वर्णमाला में क से कातिल
और ख से खून भी है
वह जानता है....
गुलेल को बन्दूक और कंचों को गोली बनाना
पर फिर भी मैं उसे
अ से अमन और क से कलम पढाना नहीं भूलती
जिसे पढते वक्त वह बडी देर तक
मेरी गोद में दुबका रहता है।
अ से आतंक पढता है
उसकी वर्णमाला में क से कातिल
और ख से खून भी है
वह जानता है....
गुलेल को बन्दूक और कंचों को गोली बनाना
पर फिर भी मैं उसे
अ से अमन और क से कलम पढाना नहीं भूलती
जिसे पढते वक्त वह बडी देर तक
मेरी गोद में दुबका रहता है।
मेरे बच्चे के लिए रंगों के मायने बदले से हैं
वह बस एक ही रंग पहचानता है
............खौफनाक लाल!
मैं घबराहट में उसे और अधिक दुलार करती हूँ
पर हाँ तब मैं इश्किया लाल बिन्दी
माथे पर साटना कभी नहीं भूलती
जिसे छूते हुए वह बडी देर तक सुबकता रहता है।
वह बस एक ही रंग पहचानता है
............खौफनाक लाल!
मैं घबराहट में उसे और अधिक दुलार करती हूँ
पर हाँ तब मैं इश्किया लाल बिन्दी
माथे पर साटना कभी नहीं भूलती
जिसे छूते हुए वह बडी देर तक सुबकता रहता है।
मेरे बच्चे की दुनियाँ से तितलियाँ गायब हैं
वह हथेलियों में रंग पोत दीवार चित्रकारी भी नहीं करता है
उसकी गोल गहरी सूनी आँखों से डरकर
मैं अपनी आँखों में हँसी का मोटा काजल लगा लेती हूँ
वह आँखें बन्द कर बडी देर तक मेरी हँसी ताकता है।
वह हथेलियों में रंग पोत दीवार चित्रकारी भी नहीं करता है
उसकी गोल गहरी सूनी आँखों से डरकर
मैं अपनी आँखों में हँसी का मोटा काजल लगा लेती हूँ
वह आँखें बन्द कर बडी देर तक मेरी हँसी ताकता है।
मेरे बच्चे की दुनियाँ अब मैं खुद बन गई हूँ
अक्सर धमाकों के बीच मैं उसे लोरियाँ सुनाती हूँ
कैद जगहों पर उसे मैं घोडा बन घुमाती हूँ
मेरी उँगलियाँ पकड कर खडा होते हुए
अक्सर उसकी आँखें पूछती हैं......
माँ आखिर मैं क्या करूं?
जवाब में मैं उसके माथे पर
प्रेम भरा बोसा टाँक देती हूँ
जिसे वह अपनी सुकूनी मुट्ठियों में समेटे
बडी देर तक मुझसे लिपटा रहता है।
अक्सर धमाकों के बीच मैं उसे लोरियाँ सुनाती हूँ
कैद जगहों पर उसे मैं घोडा बन घुमाती हूँ
मेरी उँगलियाँ पकड कर खडा होते हुए
अक्सर उसकी आँखें पूछती हैं......
माँ आखिर मैं क्या करूं?
जवाब में मैं उसके माथे पर
प्रेम भरा बोसा टाँक देती हूँ
जिसे वह अपनी सुकूनी मुट्ठियों में समेटे
बडी देर तक मुझसे लिपटा रहता है।
3-- मेरे सपने में अब कविताएँ नहीं आती..
मेरे सपने में अब कविताएं नहीं आती
बल्कि एक नवजात बच्ची आती है
जिसके चेहरे पर नाखूनों के
अनगिनत निशान हैं
और हजारों भयानक हाथ
उसकी तरफ बढ रहे हैं।
बल्कि एक नवजात बच्ची आती है
जिसके चेहरे पर नाखूनों के
अनगिनत निशान हैं
और हजारों भयानक हाथ
उसकी तरफ बढ रहे हैं।
कभी-कभी सपने में
की-बोर्ड पर तडपती दो आँखें आती हैं
जिनके लाल मोतियों के छींटें
कम्प्यूटर स्क्रीन पर बिखरे हैं
और कुछ उँगलियाँ
आजादी और बलात्कार लिख रहे
बटनों के बीच निढाल पडी हैं।
की-बोर्ड पर तडपती दो आँखें आती हैं
जिनके लाल मोतियों के छींटें
कम्प्यूटर स्क्रीन पर बिखरे हैं
और कुछ उँगलियाँ
आजादी और बलात्कार लिख रहे
बटनों के बीच निढाल पडी हैं।
मेरे सपने में एक बुढियाँ आती है
जिसके एक हाथ में लुकाठी है
और दूसरे में बोरी भर लाशें
जलती लाशों के साथ
अनवरत बडबडाती वह बुढियाँ
जख्मी खामोशी की वह सारी गिरहें खोलती है
जब कोई स्त्री अपनी आत्मा
किसी फन्दे में छुपाती है।
जिसके एक हाथ में लुकाठी है
और दूसरे में बोरी भर लाशें
जलती लाशों के साथ
अनवरत बडबडाती वह बुढियाँ
जख्मी खामोशी की वह सारी गिरहें खोलती है
जब कोई स्त्री अपनी आत्मा
किसी फन्दे में छुपाती है।
हाँ कभी-कभी मेरे सपने में
कैलेन्डर पर रंग पोतती
कुछ औरतें आती हैं
जैसे कि वह उस इतिहास का
नामोनिशान मिटाना चाहती हों
जब स्त्री-पुरुष के साझे विरासत में
उनके हिस्से गुलाम दिमागों की पहरेदारी थी।
कैलेन्डर पर रंग पोतती
कुछ औरतें आती हैं
जैसे कि वह उस इतिहास का
नामोनिशान मिटाना चाहती हों
जब स्त्री-पुरुष के साझे विरासत में
उनके हिस्से गुलाम दिमागों की पहरेदारी थी।
मेरे सपने में अब कविताएँ नहीं आती
बल्कि खूब सारे दरवाजे आते हैं
जिनपर हकीकत की साँकल चढी है
जिसकी चौखट पर आधे मुरझाये
फूलों का गुच्छा है
दरवाजे के भीतर से उठती चीख
मुझे यह बताती है
कि तकलीफ की तपिश से दम तोडता यह गुच्छा
हकीकत में मेरी ही कविता है।
बल्कि खूब सारे दरवाजे आते हैं
जिनपर हकीकत की साँकल चढी है
जिसकी चौखट पर आधे मुरझाये
फूलों का गुच्छा है
दरवाजे के भीतर से उठती चीख
मुझे यह बताती है
कि तकलीफ की तपिश से दम तोडता यह गुच्छा
हकीकत में मेरी ही कविता है।
4-
इश्किया दुपट्टे वाली स्त्री
-
इश्किया दुपट्टे वाली स्त्री
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इस मंदिर की मुंडेर और उस मस्जिद की मीनार में
उस स्त्री ने एक अलगनी बाँधी है
ताकि अपना केसरिया और धानी रंगी
इश्किया दुपट्टा सूखा सके।
उस स्त्री ने एक अलगनी बाँधी है
ताकि अपना केसरिया और धानी रंगी
इश्किया दुपट्टा सूखा सके।
वह स्त्री दोनों छज्जों पर रोते हुए
उन लाचार और बेबस बालकों को उठा लाती है
जिनका नाम राम और रहीम है
और उसकी छातियों में उमडता दूध ही
जिनकी तंदुरुस्त खुराक है।
उन लाचार और बेबस बालकों को उठा लाती है
जिनका नाम राम और रहीम है
और उसकी छातियों में उमडता दूध ही
जिनकी तंदुरुस्त खुराक है।
अलगनी पर बैठने वाले नीले कबूतर
बस अलगनी भर लेकिन एकदम तनी हुई
दूरी देखते रहते हैं
वे उदास मन वाले कबूतर
उड जाना चाहते हैं
दूर अनन्त आकाश में।
बस अलगनी भर लेकिन एकदम तनी हुई
दूरी देखते रहते हैं
वे उदास मन वाले कबूतर
उड जाना चाहते हैं
दूर अनन्त आकाश में।
वह स्त्री भावुक पर मजबूत स्त्री है
वह नीले कबूतरों को गोल टोकरी में सहेजे रखती है
और दुपट्टे को टोकरी में बाँध एक झूला बनाती है
ताकि बच्चों के चेहरे पर उभरा भय का काला रंग
मिलाप का गुलाबी रंग हो जाये
और पनियायी आँखों में ममत्व का
गाढा सफेद रंग चढ जाये।
वह नीले कबूतरों को गोल टोकरी में सहेजे रखती है
और दुपट्टे को टोकरी में बाँध एक झूला बनाती है
ताकि बच्चों के चेहरे पर उभरा भय का काला रंग
मिलाप का गुलाबी रंग हो जाये
और पनियायी आँखों में ममत्व का
गाढा सफेद रंग चढ जाये।
सूखी आँखों से एकांत में अलगनी निहारती वह स्त्री
अलगनी पर उग आये उन काँटों को देखती है
जिनमें फँसकर कई सारी
टोपियों और गमछे लहूलूहान हैं
और जिनके सिरे पर लगी गाँठों में
सबकी अपनी कहानियाँ कैद हैं।
अलगनी पर उग आये उन काँटों को देखती है
जिनमें फँसकर कई सारी
टोपियों और गमछे लहूलूहान हैं
और जिनके सिरे पर लगी गाँठों में
सबकी अपनी कहानियाँ कैद हैं।
कलेजे के हूक को जज्ब करती वह स्त्री
एक ठंडी आह के साथ नई अलगनी बाँध देती है
और ठीक तभी कबूतर उसकी हथेलियाँ चूम लेते हैं
दुपट्टे उसके सिर पर साफे की तरह सज जाते हैं
और बच्चे उसकी उँगलियाँ
बेहद मुलामियत मजबूती से पकड लेते हैं।
एक ठंडी आह के साथ नई अलगनी बाँध देती है
और ठीक तभी कबूतर उसकी हथेलियाँ चूम लेते हैं
दुपट्टे उसके सिर पर साफे की तरह सज जाते हैं
और बच्चे उसकी उँगलियाँ
बेहद मुलामियत मजबूती से पकड लेते हैं।
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