सलमा की कविताएँ
[ सलमा खातुन इलाहाबाद डिग्री कॉलेज की परास्नातक की छात्रा हैं और स्वतंत्र लेखन करती हैं] सलमा खातुन 1. कुछ भी व्यर्थ नहीं हैं जैसे बादलों का बरसना कभी जोर-जोर, कभी पोर-पोर जैसे हवाओं का बहना कभी सनन-सनन, कभी सायं-सायं कभी घूम-घूम, कभी थिरक-थिरक कुछ भी व्यर्थ नहीं है जैसे इनकी भाषा जैसे इनका प्यार सच्ची अनुभुतियां उड़ती हुई सेमल-रुई की-सी नहीं हैं जैसे हल्की हवाओं में उनका काँपना व्यर्थ नहीं हैं जैसे नन्हें बच्चों के अधरों का काँपना व्यर्थ नहीं है वैसे कुछ भी व्यर्थ नहीं है ll 2. प्रकृति का आलिंगन जैसे माँ ने किया हो जो हवा के माध्यम से करती है प्यार ll...