सलमा की कविताएँ

 

      [सलमा खातुन इलाहाबाद डिग्री कॉलेज की परास्नातक की छात्रा हैं और स्वतंत्र लेखन करती हैं] 

                                                      

सलमा खातुन

1.      कुछ भी व्यर्थ नहीं हैं

 जैसे बादलों का बरसना

 कभी जोर-जोर, कभी पोर-पोर 

 जैसे हवाओं का बहना

 कभी सनन-सनन, कभी सायं-सायं

 कभी घूम-घूम, कभी थिरक-थिरक

 कुछ भी व्यर्थ नहीं है 

जैसे इनकी भाषा  

जैसे इनका प्यार

सच्ची अनुभुतियां उड़ती हुई सेमल-रुई की-सी नहीं हैं

जैसे हल्की हवाओं में उनका काँपना व्यर्थ नहीं हैं

जैसे नन्हें बच्चों के अधरों का काँपना व्यर्थ नहीं है

वैसे कुछ भी व्यर्थ नहीं है ll

 

 

2.      प्रकृति का आलिंगन

जैसे माँ ने किया हो

जो हवा के माध्यम से करती है प्यार ll  

 

बादलों का  धीर धीरे रंग बदलना

 फिर उमड़ घुमड़ कर बिखर जाना,

फिर खेत नदी नालों और शहरों के ऊपर

उड़ते हुए बहना और बहना ll

 

किन्तु हृदयग्राही सच्ची अनुभूतियों सी  

गिरती हैं वर्षा की बूँदें

उन बंजर खेतों पर

जैसे किसानों के सूखे अंतर पर

जैसे बच्चों के कोमल सपनों पर ll

 

3.      रात भर

      तुम्हारी याद में

भीगती तकिया

सीझते सपने

सूखते कंठ

सब सुखद हैं

 

बिल्कुल भोर में!

खिड़की से आसमान को देखना

और फिर बिखरे हुए तारों को

जैसे हम बिखरे हुए हैं – इधर-उधर 

कभी रूठते-मुस्कुराते

सब सुखद है

 

सच कहूँ

मुझे तुममें सब अच्छा लगता है ll

 

टिप्पणियाँ

Unknown ने कहा…
कविता अच्छी लगी..

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