मैंने तुम्हें प्रेम किया
हां! तुम! Susheel Dwivedi Editor at Hastank टेबल लैम्प के मद्धिम प्रकाश से उतर रही थी पहले पाठ के अक्षर झिलमिलाए फिर गोल गोल घूमने लगे शब्दों से रक्तिम विचार लुढ़कर खिड़की की ओर भागे, एक मनहूस हवा ने बड़े रौ के साथ मेरे कमरे में घुसकर किताबों को उलट-पलट दिया, गांधी की तस्वीर को गिरा दिया और क्षण भर में कमरे को अस्त-व्यस्त कर दिया। आसमान से एक तारा टपका कमरे के ईशान से तेज धुंवा उठा आहिस्ता- आहिस्ता कमरा श्मशान में बदल गया मैं खवास को बुलाया, पंडित,मौलवी भी आये मंत्रोच्चार हुआ देवता प्रगट हुए देवियाँ आयीं नाग और गंधर्व आये यक्ष और यक्षणियां आयीं शुक सारिका आये सारस और कोयल आयी मेघ आये फिर क्रमशः पूरा कमरा देवताओं, किन्नरों राक्षसों, वानरों और ऋचाओं से भर गया। यक्ष ने मेघ से कहा- मना कर दिया ब्रह्म ने नारद से कहा- मना कर दिया फिर एक एक करके मना करने का सिलसिला ही शुरू हो गया और देखते ही देखते सभा अंतर्ध्यान हो गयी कमरे का मरघटपन उभरने लगा दिशाएँ रूठने लगीं मस्तिष्क की नशें जवाब देने लगीं और मज्जाओं के स्राव से आँखें ढबढबा गयीं फिर अचानक एक बू...