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भुईरा दादा

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भुईरा दादा सांझ होते ही गलारियों के हांकने की आवाज़ थम जाती  अधबुढ़ स्त्रियाँ नित्यक्रिया के लिए घरों से बाहर निकलतीं अकेले नहीं, दो चार के समूह में वे किसी सरकारी चापे की तरह  धीरे धीरे भुईरा दादा के खेत की ओर दाखिल होतीं यह वही समय होता जब अनावृत मौन स्त्रियाँ सबसे ज्यादा मुखरित होतीं ठीक उसी वक्त भुईरा दादा कंधे पर वह मटमैली धोती डालते जो अब फटकर गमछा हो चुकी थी लाठी उठाते धीरे धीरे घोड़े की टाप की तरह लाठी पटकते, खांसते चौपाल की तरफ चले आते यह कोई मान्य चौपाल नहीं थी। अर्द्धगीली लकड़ियों और कण्डें की अलाव होती टुनटुन बढ़ई होते ,डॉक्टर लाला,रनवा ठाकुर और घनश्यमवा पंडित और उनके छगनमगन।  भुईरा दादा उन्हीं के बीच बैठते सुर्ती मलते ,कहानियाँ सुनाते, उनके कहानियों में शामिल होते- फसलों को चरने वाले जानवर, डाई-पोटास की मंहगाई,परती खेत और भूख-प्यास...  कहते हैं भुईरा दादा को किसी ने हंसते हुए नहीं देखा था, किन्तु उस रोज अपनी शादी की घटना  पर वह खूब हंसे थे। कहते हैं कि उस दिन रेडियो पर मुहम्मद रफी का  गीत" चांद मेरा दिल,चाँदनी हो तुम" देर...

"कविता"

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'तुम्हारी साधना के बगैर मैं अधूरा हूं' •••••••••••••••••••••••••••••••••• वर्षों से जिसका मैं कठिन साधक हूं वही प्राण प्रिय शब्द, विलीन होते जा रहे हैं और मैं हूं अपनी अंतस्साधना में मग्न तिरोहित ,समयातीत तंत्र विद्याओं से युक्त निष्णात् , किन्तु अब मैं थक गया हूं हे प्राण प्रिय शब्द! उतरो,अविलम्ब उतरो मेरे मानस के गह्वर,गिरि,कानन में उतरो कि हृदय की वन्ध्या धरती सिंचित हो, उपजे जौ,अक्षत हे सरस-पुष्प! आओ मेरे कोटरों से झांको और नव शावक- शुक को प्यार करो उन्हें प्रभाती के गीत सुनाओ। कंठ दो उन्हें, ताकि वे गायें- प्रेम के गीत और झूमें,कलरव करें कि मेरे मानस का रेशा- रेशा जग जाये। हे पुनीत, सनद-पुत्र! आओ, कि ऋचाएं स्वतः प्रस्फुटित हों •••••••••••••••••••••••••••••••••• © सुशील द्विवेदी

मुक्तिबोध की कविता

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जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरज एक जॉबर-सा बराबर रौब अपना गाँठता-सा है कि रोज़ी छूटने का डर हमें फटकारता-सा काम दिन का बाँटता-सा है अचानक ही हमें बेखौफ़ करती तब हमारी भूख की मुस्तैद आँखें ही थका-सा दिल बहादुर रहनुमाई पास पा के भी बुझा-सा ही रहा इस ज़िन्दगी के कारख़ाने में उभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहा बेरुह इस काले ज़माने में जब दुपहरी ज़िन्दगी को रोज़ सूरज जिन्न-सा पीछे पड़ा रोज़ की इस राह पर यों सुबह-शाम ख़याल आते हैं... आगाह करते से हमें... ? या बेराह करते से हमें ? यह सुबह की धूल सुबह के इरादों-सी सुनहली होकर हवा में ख़्वाब लहराती सिफ़त-से ज़िन्दगी में नई इज़्ज़त, आब लहराती दिलों के गुम्बजों में बन्द बासी हवाओं के बादलों को दूर करती-सी सुबह की राह के केसरिया गली का मुँह अचानक चूमती-सी है कि पैरों में हमारे नई मस्ती झूमती-सी है सुबह की राह पर हम सीखचों को भूल इठलाते चले जाते मिलों में मदरसों में फ़तह पाने के लिए क्या फ़तह के ये ख़याल ख़याल हैं क्या सिर्फ धोखा है ?... सवाल है। (संभावित रचनाकाल 1948-50, अप्रकाशित)

लेख

इलावास से इलाहाबाद और फिर प्रयागराज बनने की कहानी, इतिहासकार की जुबानी NOV 02 , 2018 प्रो. हेरम्ब चतुर्वेदी शेक्सपीयर ने कहा था, “नाम में क्या रखा है?” रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है, “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध/ जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध”। यह मानते हुए भी कि नाम बदलने से कुछ नहीं होता फिर भी इतिहास के क्रूर मूल्यांकन में अपना पक्ष शिद्दत से रखना जरूरी होता है। दुष्यंत कुमार ने कहा भी है, “हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग/रो-रो के बात कहने की आदत नहीं रही”।  इतिहास के क्रम को नजरंदाज करके मानव-विकास के क्रम को हम नहीं समझ सकते। शासन का मूल्यांकन बाद की प्रक्रिया है, पहले सभी चरण इतिहास के विवरण में सम्मिलित तो हों? हम भारतीय इतिहास के प्राचीन काल को 10वीं सदी में समाप्त कर के सीधे 21वीं सदी की बात करके क्या मानव के विकास के क्रम को सत्यता, तार्किकता, तथ्यात्मकता, वैज्ञानिकता के बोध से चित्रित कर पाएंगे? क्या इतिहास मानव-विकास का क्रमबद्ध अध्ययन नहीं है? यदि है, तो हमें भारत के प्राचीन के साथ मध्यकाल के अध्ययन के बाद ही आधुनिक काल में प्रवेश ...

बाबी यार

बाबी यार •••••••••••••••••••••••••••••••••••• बाबी यार पर कोई स्मारक नहीं सिर्फ एक खड़ी चट्टान, कब्र के बेडौल पत्थर की तरह मुझे लगता है मैं उतना ही पुराना हूं जितनी समूची यहूदी जाति मैं खुद को एक प्राचीन इजरायली की तरह देखता हूँ मैं प्राचीन मिस्र की सड़कों पर भटकता हूं और यहाँ, क्रांस पर ,यातनाएँ झेलता हुआ मरता और आज भी मुझ पर कीलों के निशान मौजूद हैं मुझे लगता है कि मैं ही ड्रेफस हूं फलस्तीनियों ने मुझे धोखा दिया और अब फैसला दे रहे हैं मैं एक पिंजरे में हूं,घिरा हुआ और कैद मुझे सताया जाता है, मुझ पर थूका जाता है झूठी निंदा की जाती है ,और ब्रुसेल्स के भड़कीले कपड़ों में सुरुचिसम्पन्न सुन्दरियां मेरे चेहरे पर अपनी छतरियां चुभोती किलकारियां मारती हैं मैं खुद को बेलोस्तोक में एक लड़के की तरह देखता हूं फर्श पर खू़न बिखरकर बहता है बर और पबों के लीडर गुस्से में फट पड़ते हैं और वोदका और प्याज की गंध मारते हैं एक बूट मुझे पीछे फेंक देता है,मुझमें कोई ताकत नहीं बची मैं व्यर्थ ही नरसंहार करने वाली भीड़ के आगे गिड़गिड़ाता हूं उन्मादी नारों के आगे ' यहूदियों को मारो...

इलाहाबाद बनाम प्रयाग

दरअसल सवाल यह नहीं है कि इलाहाबाद का‌ नाम बदलकर प्रयाग रख देने से हमारा मान बढ़ जायेगा, हमारी संस्कृति की रक्षा होगी। हम अपनी परम्परा से सीधे जुड़ेंगे। सवाल यह भी नहीं है कि हमारी जब़ान में इलाहाबाद का नाम इतना चढ़ गया है कि प्रयाग कहने में अटपटा लग रहा है।‌ कोई भी नाम जो प्रचलित है उसे बदल देने से दो चार पीढ़ियाँ भले ही अपने को असहज महसूस करें, अपना को कटा हुआ पायें किन्तु एक समय के बाद हम उस नाम के आदी हो जाते हैं।  'प्रयाग संगीत समिति' ,प्रयाग महिला विद्यापीठ ,  प्रयाग जंक्शन का नाम बदलकर हम कोई दूसरा नाम रख दें तो क्या लोक उसे स्वीकार करेगा?  ऐसा करना इतना आसान नहीं है जितना हम सोचते हैं।  लोक में आज भी यह भावना नहीं है कि इलाहाबाद शब्द से मुस्लिम संस्कृति का बोध होता है या प्रयाग से हिन्दू संस्कृति का। हमारी परम्परा का। लोक इन सब बातों पर अधिक ध्यान नहीं देता है, उसके लिये ये सब अनर्गल बातें हैं। वह अपने ही प्रेम के नशे में स्वयं को सम्पृक्त पाता है। किसी की परवाह किये बिना अपने ही अंदाज़ में जीता है। भला दो चार किताबें, दस बीस ग्रंथों को  पढ़ लेने से लोक ...

अब विमोचन होगा

महीने की बीस तारीख को विमोचन होगा 'आयेंगे किसी विश्वविद्यालय के बड़े कवि- आलोचक, पत्रिका के प्रधान सम्पादक, अंग्रेजी अखबार के चीफ एडिटर, लोकसभा के बड़े नेता' यह खबर वर्ष के साठ दिन फेसबुक, इंस्ट्राग्राम,ह्वाट्सअप न्यूज़ पोर्टलों में फैलाई गयी। कॉलेजों और विश्वविद्यालय के मुख्य सूचना पट पर आकर्षक ,सचित्र पोस्टर चिपकाये गये तयसुदा तिथि पर हॉल में चार सौ कुर्सियां सुसज्जित की गयीं मंच सजाया गया होर्डिंग और कैमरे लगवाये गये माइक ठीक किया गया 1440 घंटों के प्रचार प्रसार में आये मुख्य अतिथि, उनके चार चहेते,दो सुरक्षा कर्मी तीन मित्र संचालक,लेखक , अन्य गणमान्य अतिथि और कार्यक्रम में उपस्थित हुए कुल जमा चालीस लोग थोड़ी देर सन्नाटा पसरा फिर .... घड़ी ने सूचना दी लेखक ने आंख मारी संचालक ने कहा- अब विमोचन होगा। © सुशील द्विवेदी

सपना तंवर की चयनित कविताएँ

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नवांकुर कवयित्री सपना तंवर की कविताएँ जीवन के गहरे बोध से जुड़ी हैं.इनका स्वर मोमबत्ती के मद्धिम प्रकाश की तरह है.समय के तनाव व समाज के बाइनरी के बीच सहज और शेड्स के रूप में देखती हैं.इनके यहाँ पुरुष सत्ता का नकार भी सकारात्मक है. उसे सहयोगी के रूप में देखती हैं.उसके टूटने पर उसे संभालने की कोशिश करती हैं.बिम्बों और प्रतीकों के अत्यधिक भार से बचती हैं.नये शिल्प को गढ़ने का प्रयास करती हैं.    1. सपना तंवर तुम्हे मैं नदी का वो छोर समझ बैठी थी ,   जहाँ से मेरा जीवन ठहरा सा दिखता था ,   तुमने बहाव ला कर , नदी में तूफान ला दिया ,   औऱ वो जो मेरा था ,  उसे बहा दिया , समझा दिया मुझे , अर्थ क्या ?   ठहरा सा कुछ नही यहां ,  जो ठहर सका , वह "बदलाव" यहाँ। 2 .टूटा हुआ  तुझे देख, तेरी आँखों मे, मुझे टूटा हुआ सूरज नज़र आता है, टूटा सूरज वो, जो तूने अपने सपनो से बुना, ढल गई रोशनी, बिखर गई रोशनी, तेरे सपनो के आँचल की, शाम हो आई तेरे जीवन मे, तुझे देख, जीवन की थकान का मंजर दिखता है ।। उठ, देख सूरज ढल गया, यह निशानी, ...

“गुलाबी चप्पल”

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Susheel Dwivedi Editor at Hastank “गुलाबी चप्पल” ‘’बाई’ खुश थी कि उसे मिलेगी  एक जोड़ी गुलाबी चप्पल लाल हरे पीले चटक रंगों की बनी धारियों वाली गुलाबी चप्पल | जिसकी बद्धी में  सूअर के थूथुन जैसे बड़े बड़े फूल जड़ दिए गये हो | बा ई श बरस की बाई ने देखा था  एक बार दुधिया पैरों में गुलाबी चप्पल | हाँ ! तब से जिद कर लिया था अपने बबूली छाल वाले पैरों की खर्रादार एडियों में पहनेगी गुलाबी चप्पल ! बाई खुश थी ....!

शमशेर बहादुर सिंह और पाब्लो नेरुदा

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Susheel Dwivedi शमशेर बहादुर सिंह और पाब्लो नेरुदा        शायद इसी का नाम मोहब्बत है शेफ़्ता       एक आग सी है दिल में हमारे लगी हुई !                                 - मिर्ज़ा ग़ालिब मिर्ज़ा ग़ालिब का शे’र प्रणय जीवन के कसमसाहट को व्यक्त करता है | मोहब्बत और आग दो विरोधी चीजें हैं | मोहब्बत मलयानिल की तरह शीतल और सुखदायी होती है ,जबकि आग दाहक | शे’र में ये दोनों बिम्ब  एक साथ आते हैं | वस्तुतः सुख और दुःख प्रणय जीवन की अनुभूतियाँ हैं | इन्हीं अनुभूतियों के माध्यम से रचनाकार सामाजिक चितवृत्तियों  को उकेरने का प्रयास करता है |एक महान रचनाकार वह है जो वैयक्तिक प्रेम की सीमा को लाँघ कर सामाजिक प्रेम की ओर अग्रसर होता है | एक शे’र में उर्दू शायर फैज़ अहमद फैज़  लिखते हैं   “ और भी  गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा ,राहतें और भी हैं वस...