शमशेर बहादुर सिंह और पाब्लो नेरुदा

Susheel Dwivedi
शमशेर बहादुर सिंह और पाब्लो नेरुदा

      



शायद इसी का नाम मोहब्बत है शेफ़्ता
      एक आग सी है दिल में हमारे लगी हुई !
                                - मिर्ज़ा ग़ालिब
मिर्ज़ा ग़ालिब का शे’र प्रणय जीवन के कसमसाहट को व्यक्त करता है | मोहब्बत और आग दो विरोधी चीजें हैं | मोहब्बत मलयानिल की तरह शीतल और सुखदायी होती है ,जबकि आग दाहक | शे’र में ये दोनों बिम्ब  एक साथ आते हैं | वस्तुतः सुख और दुःख प्रणय जीवन की अनुभूतियाँ हैं | इन्हीं अनुभूतियों के माध्यम से रचनाकार सामाजिक चितवृत्तियों  को उकेरने का प्रयास करता है |एक महान रचनाकार वह है जो वैयक्तिक प्रेम की सीमा को लाँघ कर सामाजिक प्रेम की ओर अग्रसर होता है | एक शे’र में उर्दू शायर फैज़ अहमद फैज़  लिखते हैं  “ और भी  गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा ,राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा ”| फैज़ अहमद फैज़ की कविता  में प्रेम वैयक्तिकता की सीमा पार कर सामाजिक होता है | यहाँ  सामाजिक कहने का अभिप्राय सर्वहारा – किसान ,मजदूर ,स्त्री या किसी  उपेक्षित  वर्ग से है|
       दरअसल शमशेर बहादुर सिंह और पाब्लो नेरुदा की कविताओं में इसी तरह का सामाजिक प्रेम है ,जहाँ शमशेर बहादुर सिंह वैयाक्तिक प्रेम की सीमा को लांघते हुए चीन ,अफ्रीका ,रूस इत्यादि की सीमा में प्रवेश करते हैं वहीँ पाब्लो नेरुदा चिली के जंगल व जनजीवन तक सीमित हो जाते हैं| उनका यह वैयक्तिक प्रेम अंतरराष्ट्रीयता की सरहदें पार नहीं करता | उल्लेखनीय है कि मिर्ज़ा ग़ालिब और निराला शमशेर बहादुर सिंह के प्रेरक कवि रहे हैं | भगवान सिंह लिखते  हैं – शमशेर ने ग़ालिब से बहुत कुछ सीखा  है,पर वे ग़ालिब से और अपने समय से आगे पड़ते हैं 1. |
समकालीन रचनाकारों में शमशेर बहादुर एक मात्र ऐसे रचनाकार दिखाई देते हैं जो अपने बिम्ब विधान के चलते अज्ञेय ,नागार्जुन ,त्रिलोचन शास्त्री ,मुक्तिबोध,रामविलास शर्मा सबके चहेते बन जाते हैं | अपनी  बिम्ब योजना में वह डिप्लोमेटिक हैं | प्रणय सम्बन्धी कवितावों में सिद्धहस्त हैं| प्रणय के जितने बिम्ब उनकी कविताओं में मिल जायेंगे अपने समकालीन में उतने नहीं | प्रणय जीवन को आनंद  की तरह देखने के आदि हैं |शायद यही कारण है कि मुक्तिबोध उन्हें “प्रणय जीवन का प्रसंग-बध्द रसवादी कवि कहते हैं ”2. |
    प्रेम का आधार दैहिक है अथवा आत्मिक इसकी बहस समूचे अकादमिक दुनिया में जोरों सोरो से हुई  | भारतीय परिप्रेक्ष्य में लोग  प्रेम को आत्मिक देखने के आदी  हो गये हैं जबकि यूरोप की दुनिया में  दैहिक | वात्सायन के यहाँ भी प्रेम अंततः आत्मिक ही है ,वह आनंद और कला दोनों रूप में  है जबकि फ्रायड के यहाँ आनंद तो है लेकिन दैहिक आनंद |शमशेर बहादुर सिंह भारतीय परम्परा से प्रेम को देखने के आदी नहीं हैं | उनका प्रेम पाब्लो नेरुदा की तरह दैहिक है | एक ठोस बदन अष्टधातु का–सा, प्रेयसी आदि कवितायेँ दैहिक प्रेम की कवितायेँ हैं | नामवर सिंह लिखते हैं – शमशेर के लिए सौन्दर्य ‘ एक ठोस बदन अष्टधातु का सा’ है ,जिसमें जंघाएँ ठोस दरिया / ठैरे हुए से | कवि की पहली प्रेमिका ‘ जो आइने की तरह साफ है और बदन के माध्यम से बात करती है | और ‘ वह कांसे का सा चिकना बदन हवा में हिल रहा है’| हिंदी कविता में कहाँ है ऐसी सघन ऐद्रियता !३.  इसी के आगे वह लिखते हैं – ‘कभी कभी ऐसा लगता है की नारी –शरीर भी शमशेर के लिए जैसे एक कलाकृति है – अपने रूपाकार मात्र के लिए आकर्षक’४. | नेरुदा के कविता संग्रह ; हिंदी में अनुदित  ‘पाब्लो नेरुदा ,कविता संचयन ’ की भूमिका में नामवर सिंह लिखते हैं – ‘ नेरुदा प्रेम से अधिक काम भावना के कवि हैं | वे उन कवियों में से हैं जो सेक्स की वर्जना से सर्वथा मुक्त हैं | कभी कभी ऐसा लगता है कि नेरुदा के लिए काव्य- सर्जना कामभावना का पर्याय जैसा है ’५. | नामवर सिंह के दोनों कथनों में पाब्लो नेरुदा और शमशेर बहादुर सिंह  दैहिक प्रेम का  कवि बताया गया है

उठ रहे हैं तुम्हारे कंधें जैसे दो पहाड़ियां
तुम्हारी छातियाँ करती हैं चहल कदमी मेरी छाती पर ,
मेरा बाजू पहुँचता है बमुश्किल लिपटने उस पतली –सी
दूज के चाँद की रेखा –सी तुम्हारी कमर से :
उन्मत्त हो तुम प्यार में ,जैसे समुद्र का पानी:
नापती हैं बमुश्किल मेरी आँखें आकाश के और अधिक विस्तार को
और मैं झुकता हूँ अपने को तुम्हारे होंठों पर पृथ्वी को चूमने६.


ख.
एक ठोस बदन अष्टधातु का-सा
सचमुच ?
जंघाएँ दो ठोस दरिया
ठैरे हुए से
मगर जनता हूँ की वो
बराबर – बराबर बहुत तेज
रौ में है
ठै रा हुआ – सा मैं हूँ ...
ठोस वक्ष कपोल  उभरे हुए चारों
निमंत्रण देते चैलेंज –सा ...

( एक ठोस बदन अष्टधातु का-सा ; शमशेर बहादुर सिंह )७.  
नर- नारी का सम्बन्ध केवल भोग सम्बन्ध नहीं है ,वह प्रीत सम्बन्ध भी है |भोग और प्रीत दोनों का सम्बन्ध सौंदर्यशास्त्र से है |८. | दरअसल स्त्री को वैदिक मन्त्रों में पुरुष का घर तक कहा गया है | एक स्थान पर इंद्र से कवि कहता है “जाया इत् अस्तं” अर्थात स्त्री ही घर है | प्रणय क्रिया में स्त्री और पुरुष दोनों को लगभग सामान रूप से अनुभूति होती है | ऋग्वेद में इन्द्राणी गर्व से कहती है –“ मुझसे बढकर  कोई स्त्री भाग्यशालिनी नहीं है .....रति समय में मुझसे अधिक जांघों को उठाने वाली कोई नहीं है |”शमशेर बहादुर इस रति क्रिया के पारखी हैं | वह भी नेरुदा की तरह प्रणय में अपेक्षा रखते हैं | दरअसल प्रेम एक तरफ़ा नहीं हो सकता | एक तरफ़ा प्रेम करने वाला व्यक्ति या तो दिवालिया होगा अथवा पागल | शमशेर लिखते हैं –

         
   
हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
           …
जिनमें वह फँसने नहीं आतीं,
जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं
           
जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं,
तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ।९.


शमशेर और पाब्लो नेरुदा के प्रेम कविताओं में दुःख और सुख एक साथ आता है ;जहाँ प्रेयसी से बिछड़ने का दुःख भी है वहीँ प्रेयसी से जुडी स्मृतियाँ सुखदाई लगती हैं | इस तरह की दशा मैथिलीशरण गुप्त की रचना साकेत में भी है जहाँ उर्मिला लक्ष्मण के वियोग में दुखी है वहीँ उसकी स्मृति में खुश भी हो जाती हैं | इन दोनों रचनाकारों के यहाँ नकारात्मक बिम्ब सकारात्मक बनकर उभरता है|  पाब्लो नेरुदा लिखते हैं –
अब मैं उससे प्यार नहीं करता ,यह सही है ,लेकिन शायद मैं करता हूँ उससे प्यार |
कितना संक्षिप्त है प्यार ,और भूलने का अरसा कितना लम्बा
(लिख सकता हूँ कवितायेँ ) १०.

ख.
हो चुकी जब ख़त्म अपनी जिंदगी की दास्ताँ
उनकी फरमाईश हुई है ,इसको दोबारा कहें ११.
( कते और शे’र)
 संयोग की कविताओं देह उपस्थित है | बिना देह के संयोग के सुख का आनंद नहीं मिल सकता | विप्रलंभ की कविताओं वैसी दैहिकता नहीं है जैसी संयोग की | संयोग की कविताओं में नेरुदा और शमशेर एक जैसे दिखाई देते हैं| लेकिन वियोग की कविताओं में बहुत अंतर है | वियोग की कविताओं में नेरुदा का अहं विसर्जित नहीं हो पता जबकि शमशेर की कविताओं में अहं विसर्जित हो जाता है | चाहे वह ‘प्रेम’ हो या ‘ हार – हार समझा मैं’ दोनों कवितों में शमशेर नेरुदा से अलग हो जाते हैं –
हार – हार
समझा मै तुमको
अपने पार |
हँसी बन
खिली साँझ
बुझने को ही |
एक हाय – हाय की रात
बीती न थी
कि दिन हुआ |
हार- हार ...१२.
इस कविता में हारना कोई नकारात्मक क्रिया नहीं है | रचनाकार प्रेम में हार रहा है | वस्तुतः यहाँ उसके अहम् का विसर्जन हो रहा है |इसी तरह का विसर्जन शमशेर की कविताओं  में और दिखाई देता है- विप्रलंभ की कवितायेँ लिखते समय एक समय वह पुरुष के रूप में होते हैं तो दूसरे समय वह स्त्री के रूप में | पुरुषत्व कब स्त्रीत्व में परिवर्तित हो जाता है ; रचनाकार इसका भान तक नहीं  होने देता |इसी तरह का परिवर्तन कबीर में भी है वह कब राम की दुल्हनिया बन जाते हैं और कब स्वयं कबीर इसका भी अंदाजा नहीं रह जाता | सूरदास के यहाँ अहम् के विसर्जन में राधा और श्री कृष्ण आपस में वस्त्र –विनिमय करते हैं देह विनिमय नहीं | शमशेर और कबीर में देह – विनिमय होता है | ‘ एक पीली शाम’  कविता देह-विनिमय का एक उदाहरण है –
एक पीली शाम
पतझर का ज़रा अटका हुआ पत्ता
शांत
मेरी भावनाओं में तुम्हारा मुखकमल
कृश म्लान हारा-सा
( कि मैं हूँ वह
मौन दर्पण में तुम्हारे )
वासना डूबी
शिथिल पल में
स्नेह काजल में
लिए अद्भुत रूप कोमलता
अब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आंसू
सांध्य तारक- सा
अतल  में १३ |
     वस्तुतः पाब्लो नेरुदा और शमशेर बहादुर सिंह दोनों प्रेम कविताओं के दो ध्रुव हैं | दोनों कवि –चित्रकार प्रेम के दैहिक स्वरुप का चित्र उकरते हैं |  उनके  दैहिक वर्णन में बिम्बों की अद्भुत कला है | वह चित्रकार वॉन गॉग, और एजरा पाउंड की तरह हैं | प्रेम वैक्तिकता की सरहदें पार कर सामान्य जनजीवन के दुःख सुख से जुड़ता है | नेरुदा का काव्य संसार दक्षिणी चिली के जंगलों ,पहाड़ों और समुद्र के हरे भरे वातावरण के साथ साथ मछुहारों ,लकडहारों तथा दूसरे मेहनतकश लोगों से गुंजान है | इसी तरह शमशेर बहादुर सिंह  में प्रगतिशील तत्वों को अपनाते हैं | सृजनशीलता में दोनों ही किशोर की तरह पूरे संवेग के साथ प्रेम की गहराइयों में उतरते हैं , लेकिन सामान्य जनजीवन / मेहनतकश लोगों की संवेदनाओं के साथ बाहर निकलते हैं |

    सन्दर्भ ग्रन्थ सूचि
1.       भगवान सिंह ,शमशेर बहादुर की काव्य भाषा : इन्द्रधनुष के रंग , आलोचना पत्रिका ;अंक चालीस जनवरी-फरवरी २०११ से उद्धरि
2.       मुक्तिबोध ,शमशेर मेरी दृष्टि में : शमशेर तथा सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ;वहीँ
3.        भूमिका से ,शमशेर बहादुर सिंह ;प्रतिनिधि कवितायेँ ;राजकमल प्रकाशन ,२०१३ ,
4.       वहीँ
5.       पाब्लो नेरुदा  कविता संचयन ,अनुवादक – चन्द्रबली सिंह ,प्रथम संस्करण २०१४ ,भूमिका से
6.       रुको वो पृथ्वी ,पाब्लो नेरुदा ,अनु. प्रभाती नौटियाल ,भूमिका से
7.       शमशेर बहादुर ,प्रतिनिधि कवितायेँ ,पृष्ठ संख्या १८४
8.       भारतीय सौन्दर्यबोध और तुलसी दास,रामविलास शर्मा ,साहित्य अकादमी दिल्ली ,२०१५ 77
9.       कविता कोष ,शमशेर बहादुर सिंह की प्रेम कवितायेँ
10.   रुको,ओ पृथ्वी ,पाब्लो नेरुदा अनु.प्रभाती नौटियाल ,पृष्ठ४१
11.   शमशेर बहादुर सिंह ,प्रतिनिधि कवितायेँ ,पृष्ठ संख्या ११४
12.   वहीँ ,पृष्ठ संख्या २८

13.   वहीं ,पृष्ठ संख्या १०१ 

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