नींद गहरी है

   कविताएँ 

 

 

वंदना पराशर 

 रीढ़-विहीन लोग

 

उसकी रीढ़ की हड्डी  

झुकती जा रही है

वह हैरान नहीं है,

थोड़ा परेशान है

अपने बचपन की मासूमियत को खोकर

आशंका है कि

कल लोग रीढ़- विहीन हो जाएंगे

उनके कान लम्बे किन्तु

छिद्र प्राय: बंद होंगे

सबके आंखों पर एक मोटी कांच की दीवार होगी

जिसमें सबकुछ धुंधला दिखेगा

स्वंय के बनाए हुए यंत्र ही 

उसे ढाल देंगे एक यंत्र में

जहां उसके सोचने- समझने की शक्ति

संचालित होगी रोबोट की रिमोट से

हाड़- मांस का बना यह शरीर

एक यंत्र में बदल जाएगा

खत्म हो जाएगी उसकी संवेदना

उसकी हंसी, उसके आंसू

सब नकली होंगे

रीढ़- विहीन लोग 

हताश होकर दौड़ रहें हैं

चारों दिशाओं में

कभी आकाश, कभी पाताल

अंतरिक्ष के हरेक कोने में झांक रहे हैं

और ढूंढ रहे हैं अपने लिए

एक पहाड़- खुशियों का।

 

                         

एक गहरी चुप्पी

 

इतिहास में दर्ज हो जाएगी 

कल की तरह ही

आज की घटनाएं भी 

वो तमाम बातें 

वो तमाम किस्से 

इतिहास के पन्नों से निकलकर 

क्या कभी चीखेगी?

क्या कभी मांगेगी हिसाब 

काली स्याह रात की उन तमाम घटनाओं का

जहां मानवता ने साध रखी थी,

एक गहरी चुप्पी 

दृश्य तेजी से घटित हो रहा था 

पर आंखें बंद थी सबकी 

कराहती आत्माओं की पुकार सुनकर भी

सबने बंद कर लिए थे अपने कान 

चौराहे के बीचों-बीच सजी 

उन तीनों मूर्तियों की शक्लें भी 

अब बदल गई है 

एक ने अपनी आंखों पर काला चश्मा चढ़ा रखा है 

दूसरे ने अपने कान में खोस लिया है ईयर- फोन 

जिसमें बज रहा था कोई पॉप म्यूजिक 

और तीसरे की ज़बान निरंकुश होकर

लपलपा रही थी बाहर को 

दृश्य तेजी से घटित हो रहा था और 

सामने जीता-जागता बुतों की शक्ल में 

एक लंबी भीड़ खड़ी थी 

सभ्यता और संस्कृति का बोझ बनकर।

 

   अंधी दौड़

 

यह भीड़तंत्र है,

भीड़तंत्र है!

हुजूम चली है चूहों की

अंधे,लंगड़े,गूंगे,बहरे

चल पड़े हैं सभी

किसी एक स्वर के पीछे

आगे-आगे बिल्ली ने

थाम लिया है झंडा

बिल्ली की तो पौ-बारह

बिल्ली ने हुंकार भरी है-

जीत हमारी निश्चित है

चिल्लाओ सभी,मेरे इस नारे को

कुत्ते की क्या है औकात

हमीं पड़ेंगे सब पर भारी

जीवन के अंतिम सांसों तक

लड़कर पूरी रोटी पानी है

यह हक़ है हमारा

चूहे की थी हालत पस्त

कुछ ऊंघते,कुछ सोते,कुछ अनमने से

केवल सबके पांव चल रहे थे

और नींद में बड़बड़ा रहे थे सभी

बिल्ली के सिखाए हुए मंत्र

देख रहे थे सभी सुखद स्वप्न

पूरी रोटी खाने की

कि तभी एक विस्फोट हुआ

झंडा छोड़कर भागी बिल्ली

चूहे सभी हुए वहीं ढेर

मत पूछो,इस तंत्र की बात

यह भीड़तंत्र है,

भीड़तंत्र है!

 

 अपना घर

 

स्त्री

भटकती है 

जन्म से मृत्यु तक

खोजती हुई

एक घर

पिता से

भाई,

पति से

पुत्र तक

ढूँढ़ती हुई/अपना घर।

 

                                   

नींद गहरी है

 

नींद

बचपन की

ग़रीबी की

गहरी होती है

दबे पाँव कभी जाकर देखो

सोये हुए बच्चों की बाहों में,

झूलते हुए खिलौने

मज़दूर के मटमैले जेब में

खनकते हुए कुछ सिक्के

उसके दिन-भर के श्रम की कीमत

करवटें बदलने पर

जो खनक उठती है ज़ोर से

मच्छरों के झुंड भी

भला कहाँ डाल पाती खलल

इनकी गहरी नींद में

जाते-जाते छोड़ जाते हैं

अपने आने की निशानियाँ

नींद गहरी है।

 

  देहरी के उस पार

 

चाक-चौबंध स्त्रियां

लांघ गई है देहरी

पसर गई है अमरबेल-सी

उन तमाम दिशाओं व भू -भागों में

जहां वर्जित है,

केवल स्त्रियों का जाना

कठकरेज स्त्रियां अब

भयभीत नहीं होती है

धर्म के ठेकेदारों से

उन शास्त्र-निर्माताओं से

जो धर्म की व्याख्या

मनुष्य की जाति व लिंग देखकर करते हैं

सावधान! प्रहरी

इसे मत रोको

कर लेने दो प्रवेश

उन तमाम दिशाओं व भू-खंडों में

जहां वर्जित है

स्त्रियों का जाना

इसे केवल मृगनयनी,कोमलांगी समझने की

भूल मत करना

सिंहनी है ये

बंजर धरती की कोख से

जो उगा लेती है फूल

इसे मत रोको, प्रहरी!

मंदिर के द्वार से

लौटाई गई स्त्रियां

अट्टहास कर पूछती हैं

मंदिर के गर्भगृह में

पाषाण होकर पूजित

उस स्त्री से की बतलाओ वह उपाय

जो पत्थर में ढालकर

तुम्हें देवी बना दिया है

बतलाओ की

कब तोड़ोगी यह कारा

और स्वतंत्र होकर

प्रवेश करोगी उन तमाम

दिशाओं व भू -भागों में

जहां वर्जित है

केवल स्त्रियों का जाना।

 

                                        

और

 

माँ की आंखें नम थीं

पिता ने एक बार फिर से

माँ को औरत होने का एहसास करवाया है

पिता

जिनके कमज़ोर शरीर का भार

टिका है माँ के कंधे पर

फिर भी पिता,

पिता है

और माँ...

पिता उतने भी निष्ठुर नहीं थे

जितना कि पितृसत्ता ने ढाल दिया है उन्हें

उन्हें प्यार था माँ से

वे चूमते थे माँ को

उनके माथे को छूते थे

जब वह ज्वर से पीड़ित होती

ख़्याल था उन्हें माँ के जने का भी

फिर भी पिता

पिता थे

मैंने हमेशा ही माँ का आँचल ढूंढा

जहाँ अथाह प्रेम और करुणा थी

निस्वार्थ, निश्चल और

अहम से कोसों दूर

 

                                     

 

 

चा

 

स्त्री

गीली मिट्टी की तरह होती है

कई बार

कई रूपों में

वह ढलती है

चाक पर

उसका आकार कभी

स्थायी नहीं होता

वह बदलती रहती है

समय के हिसाब से

कई धूप खाई

वह पकती है आग में

आग में तपकर निकली हुई मूर्तियों में

कुछ के कान

कुछ के मुँह,

नहीं होते हैं

होती हैं तो

गाय-सी बड़ी-बड़ी आँखें

जो झाँकती है

कुम्हार की आँखों में।

 

                               

 

 

भागते हुए लो

 

भागते हुए लोग

जल्दी-जल्दी में

भर-भरकर रख रहे हैं

धूप को

हवा को

मिट्टी को

कल शायद कम न पड़ जाएँ

कल अकाल पड़ेगा

धूप

हवा और

मिट्टी का।

                     

                               

 

 

विनाश की ओर

 

यह मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है ?

भूख की ओर

युद्ध की ओर

विनाश की ओर

किस ओर बढ़े चले आ रहे हैं ?

हैं कितने लोग बचेंगे

इस भूख से

इस युद्ध से

इस विनाश से

बीज तो उसका ही है

रोको! रोको! रोको इसे कहीं

जीवन का अंत न हो जाए।

 

   परिचय

वंदना पराशर

जन्म- 1984,सहरसा, बिहार

शिक्षा- पी.एच.डी (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी)

 कविताएँ कादंबनी, अभिनव प्रत्यक्षा आदि पत्रिकाओं  में प्रकाशित प्रकाशित होती रहती हैं l

सम्पर्क - vandanaamu84@gmail.com

                                          

 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कविता में गाँव की उपस्थिति

"कविता"