शंख और लामा

    कविताएँ      

 

दीपक जायसवाल 

 

गैस-चैम्बर


मृत्यु आँकड़ों की शक्ल में आए

कितना विभत्स है यह

नाज़ियों ने बनाए इसके लिए

गैस-चैम्बर

पूँजीवादियों ने बनाए

बाज़ार।

 

 

भूख

 

भूख के मरते ही मर जाता है आदमी

बहुत भूख से भी मर जाता है आदमी

मरता तो तब भी है

जब वह सिर्फ अपने लिए जीने लगता है

जब दुनिया में कही कोई आदमी भूख से मरता है

उस समय हर वह आदमी जिस की आँख में पानी मरा नहीं

थोड़ा सा मर जाता है।

मरने को तो मर गया सिकन्दर भी,हिटलर भी

गांधी भी,नार्मन बरलॉग भी,टॉलस्टाय भी,मर्लिन मुनरो

और आरकेस्ट्रा वाली मुनिया भी

पर इनके भूख में अंतर था

मरने में अंतर था

तय है कि हम सब मरेंगें

मर जायेगा जेम्स बॉण्ड भी

हम इस नियति को बदल नही सकते

पर हम तय जरूर कर सकते हैं

मरने के तरीके को

कि कौन सी भूख हमें ताउम्र घसीटे ले चलेगी।

बहुत खुशकिस्मत हैं जो आप पढ़ सकते हैं

सोच सकते हैं और तय कर सकते हैं

अपनी पसन्द के भूख को।

जानते हैं अंतड़ियों के सूखते हुए मरना कैसा होता है?

अपने बच्चे को अपनी गोद में भूख से मरते हुए देखना कैसा होता है?

कभी सोचते हैं इनकी जिम्मेदारी किन पर है?

यदि नहीं तो आप मर चुके हैं।

 

 

गाँधी महतमा

 

मेरी माँ बताती हैं कि

गाँधी देवता आदमी थे

उनके दो पैर, चार आँखे, बारह हाथ थे

और बड़ा सा दिमाग भी

उनका दिल मोम का बना था

उनको देखकर अंग्रेज थर थर काँपते थे

हवा पीकर बहुत दिन तक वे रह सकते थे

वे नंगे रहते थे

उनके कपड़े अंग्रेज चुरा ले गए थे

उनका चश्मा बहुत दूर तक देखता था

बुधिया के आंसूं  उनके चश्में पर

जाकर गिरते थे

वे बकरी का दूध पीते थे

सहारे के लिए एक

पतली सी लाठी रखते थे

बच्चों के मानिन्द हँसते थे

उनके पास कई जिन्ह थे

आजादी के बाद

संसद भवन में

बकरीद मनाई गई थी

उनकी बकरी वहीं मारी गयी थी

उनकी लाठी खींचा-तानी में

चौदह अगस्त की रात टूट गयी थी

उसका एक हिस्सा हिंदुस्तान ने लिया

दूसरा हिस्सा पाकिस्तान

उनके जिन्ह

बहुत दिनों से एक पैर पर खड़े थे

अब उन्हें कुर्सी चाहिए थी

मेरी माँ बताती हैं

जब दंगे होने शुरू हुए

वे गलने लगे थे

वे बूढ़े हो गए थे

 

 

 जन्म और मृत्यु

 

हम हर वक्त रिसते रहते हैं

जैसे रिसता है रक्त

जैसे रिसती है नदी

जैसे रिसता है रेत

हमारे भीतर हर वक्त

कुछ भरता रहता है

जैसे भरता है समुन्दर

जैसे भरता है घाव

जैसे आँखों में भरता है आँसू

जैसे बादल में भरता हो पानी

जैसे फसलें भरती हो दाने

जैसे ट्रेन भरती है पैसेंजर

हाँ यह सच है

हम वक्त के साथ पीले होते जायेंगे

जैसे हर पतझर में हो जाते हैं पत्ते

हम डबडबाई आँखो से बह जायेंगे

जैसे बहता है आँसू

हम पकने के बाद

काट लिए जाएंगे

और ट्रेन हमें चाहते हुए भी उतार देगी

अगले यात्रियों के लिए

लेकिन जन्म और मृत्यु

के बीच जो जीवन है

उसे हम भले जीत सकते हों

पर जी सकते हैं

 

 

 स्मृतियाँ

 

क्या होगा यदि हम भूल जाए

अपनी सारी स्मृतियाँ

शायद तब हम खण्डहर भी

 नहीं  रहेंगे

क्यूँकि वह भी जीते हैं

अपनी स्मृतियों में

हम जीवित हैं क्योंकि

हमारे पास यादे हैं

क्योंकि हम बना रहे हैं

स्मृतियाँ हर धड़कन के साथ

हर बार फेफड़े में आती जाती

हवा के साथ

मेरा घर मेरी मां मेरे पिता

मेरा गाँव यह बारिश बचपन दोस्त

यह आकाश और मेरा बगीचा

और मेरी बेवफा प्रेमिका

मेरे भीतर जीवित रहते हैं

जैसे जीवित रहती है मछली

पानी के भीतर

जैसे जीवित रहता केंचुआ

गीली मिट्टी में

स्मृतियों में जीवित रहता हूँ मैं

शाहजहाँ मरा थोड़ी है ?

इतिहासकारों की आँखें नहीं होतीं

वे सुन नहीं सकते

वे हाथों पर बस गिनते हैं

कुछ गिनतियाँ

और कह देते हैं शाहजहाँ मर गया

 

 

 तांगे के घोड़े

 

तांगे के घोड़े हँसते नहीं

सिर झुकाए

दर्द और ग़ुलामी में दौड़ते हैं।

घोड़े की नाल में

जब लोहा ठोका जाता है

और उनके नाक को छेदकर

गुलाम बनाया जाता है

वे जोर से हिनहिनाते हैं

उनकी चिंघाड़

बहुत भयानक होती है

अफ़्रीका में और मार-तमाम

जगहों पर बहुत से लोग हैं

जो लोहे का स्वाद याद कर

सिहर उठते हैं।

जब हम तांगे पर बैठे होते हैं

और तेज चलाने की शिकायत करते हैं

तो हर मिनट उसकी चमड़ी

चाबुक सहती है

बहुत से मज़दूरों की अनऊँघी आँखों में

डूबता सूरज उतर आता है

मशीन उन्हें निगल जाती हैं।

घोड़ों की आँखें बेहद उदास होती हैं

वे रोते नहीं

उनकी टाँगों से रिसता है खून

सड़क पर पड़े खून

बाद में आने वाले ताँगावान को

राह दिखाती हैं

कोई घोड़ा मर कर तारा नहीं बनता

ताँगेवाले बनते हैं मरने का बाद ध्रुवतारा

 

 

 

 शंख और लामा

 

तिब्बत के पर्वतों से आते हैं लामा

इक रोज़ खुद के देश में

बंधक बना लिए गए लामा

निर्वासित जीवन जीते हैं लामा

असीम दुःख सहते हैं

आँसू पीते हैं लामा

बहुत कम बोलते हैं

बड़े संवेदनशील होते हैं लामा

हर वो चीज जो बोलती है

उनको सुनते हैं

जिन चीजों के पास

अपनी आवाज नहीं

उन्हें और गौर से सुनते हैं लामा

पत्थरों पर सोते हैं

बहुत धीरे धीरे चलते हैं लामा

हमेशा ध्यान में होते हैं

शंख रखते हैं लामा

शंखों से गुजरते वक्त हवाएं

लामाओं से बात करती हैं

जब कोई लामा आत्मदाह करता है

रुंध जाते हैं शंखों के गले

झुककर बोलते हैं लामा

लामाओं के बाल बड़े नहीं होते

चीवर ओढ़ते हैं लामा

जब कोई लामा मरता है तो

समुन्द्र छोड़ जाते हैं अपने किनारे

एक शंख

उस दिन बादल खूब बरसते हैं

फूल उस दिन नहीं खिलते

सूरज डूबते वक्त उस दिन

बहुत भारी हो जाता है

 

 

 मेरी दुनिया के मज़दूरों

 

देवताओं ने अधूरी सृष्टि बनाई

वे पूजनीय कहलाए

और चले गए रहने के लिए स्वर्ग

तुमने गलती और सड़ती हुई दुनिया को

सींच खून--पसीने से बनाया स्वर्ग

कहलाए मज़दूर-जाहिल-असभ्य

तुम्हारे रहने के लिए नहीं रखी गयी कोई जगह

सिर्फ़ भूख से मर सकते थे तुम

और जो हम सभ्य थे तुम्हारे लिए बस इतना किया

कि तुम्हें धीरे-धीरे मरते हुए देखते रहे

सुसंस्कृत-शालीन आँखों से

और फिर इक रोज़ तुम्हारे मरते ही

तुम्हारे बच्चों को बना लाए मज़दूर

 

 

 

 

कर्फ्यू और एक छोटी लड़की

 

हिंसा इतनी बढ़ गयी थी

कि शहर में लगाना पड़ा कर्फ्यू

देखते ही गोली मारने के

दे दिए गए थे आदेश

सड़कों पर बंदूक,पत्थर,खून

टूटे हुए चप्पल और सन्नाटे के सिवा

कुछ नहीं था

ताजी हवा और परिंदों ने कर्फ्यू के चलते

अपने रास्ते बदल दिए थे

लोगों के दम घुट रहे थे।

सड़क पर अचानक एक छोटी बच्ची दिखी

जिसकी माँ खाना बनाते वक्त

बाहर का दरवाजा बंद करना भूल गयी थी

वह हँस रही थी

खेल रही थी

उन टूटे हुए चपल्लों

बिखरे हुए पत्थरों के साथ

और पूछ रही थी बन्दूकों से

कि यह टूटे हुए चप्पल उनके हैं

अचानक बन्दूकें भारी हो गयी थी

वे उठ नहीं पा रही थीं

कर्फ्यू टूट गया था

  

 

- दीपक जायसवाल

 

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