कविता में गाँव की उपस्थिति

    

   

               

                       

कुछ महत्वपूर्ण बातें

चंद्रदेव यादव की कविताएँ इतनी अच्छी लगीं कि मैं निःसंकोच कह सकता हूँ यादव जी ने जो काम किया है वह अद्वितीय है l कम लोग हैं जो गाँव पर इतना सोच विचार कर लिखते हैं l उन्होंने अपनी भावनाओं और अपने समय और समाज से लोगों को जोड़ दिया है

 - डॉ. पी. एन. सिंह ( मशहूर चिन्तक एवं आलोचक )

पिता का शोकगीत एवं गाँव नामा की कविताओं से मैं भलीभांति परिचित हूँ l पिता को लेकर जो लिखा गया है वह कविताओं में ही संभव है l कहानियों में वह शायद उतना भावप्रवण नहीं होता l इन कविताओं का आप चाहें जितनी बार पाठ करें, हर पाठ के बाद प्रश्न उठता है कि क्या हम सब कुछ समझ गये हैं कि कवि ने क्या कहना चाहा है ? शायद नहीं

-      प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह (मशहूर साहित्यकार एवं चिन्तक

चंद्रदेव यादव ने अपनी कविताओं में मौजूदा स्थितियों के प्रति असंतोष, आशंका, नफ़रत, क्षोभ, गुस्सा, उदासी के बावजूद आशा, चाह, आकांक्षा और संकल्प को अपने भीतर बचाए रखा है l

-      प्रो. दयाशंकर त्रिपाठी (वरिष्ठ आलोचक)

गाँव नामा में आज के गाँवों का यथार्थ है l भाव और संवेदना के स्तर पर यह एक लाजवाब काव्यकृति है

-      डॉ. प्रेम तिवारी

 

गाँव नामा और पिता का शोकगीत में शोक का बड़ा स्रोत है जिसके कारण पिता का शोकगीत लिखा गया l वह क्या है ? वह शोक है सादगी और भाईचारा

-      डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी

 

इन काव्यकृतियों पर अलग-अलग दृष्टियों से हो रही चर्चा को सुनकर मुझे ‘असाध्य वीणा’ की पंक्ति ‘सहसा वीणा झनझना उठी’ की याद आ गयी है

-      डॉ. प्रियदर्शिनी 

 चंद्रदेव जी का व्यक्तित्व मूलतः सृजनात्मक है l अपनी इसी मूल प्रवृत्ति के कारण वे सर्जना-पथ के साक्षी हैं, और उसके वाहक, संरक्षक, सर्जक  भी l इस सर्जना-पथ में उनका गमन सत्य की तलाश करते हुए सूक्ष्म से सूक्ष्मतर की ओर हुआ है l उनकी कविताएँ समकालीन रचनाकारों से पृथक हैं l पृथकता उनके यहाँ भिन्न-भिन्न अभिव्यंजनाओं, बोध और जीवन-दृष्टियों में है, जबकि एकता  वृहदत्तर मानव सभ्यता की खोज में l चंद्रदेव जी चयनात्मक-जीवन सन्दर्भों के पक्षधर नहीं हैं, अपितु उनमें मनुष्त्व-बोध है l इसलिए भोड़े विज्ञापन, चयनात्मक राजनीति, धर्मान्धता, वैमनष्यता, कुटिलता, छल-प्रपंच जैसे मनुष्यत्व विरोधी बाइनरियों के खिलाफ़ खड़े होते हैं l लोक में अभिव्यंजनाओं के जितने साधन हो सकते हैं, इसके तीनों काव्य-संग्रहों – ‘देस-राग, गाँवनामा, पिता का शोकगीत’ में विद्यमान है l इन संग्रहों में व्यक्ति स्वातंत्र, आत्माभिव्यक्ति लोक- निष्ठा, ईमानदारी व्यक्त हुई है l इसलिए समाज की निजी अभिलाषाओं, महत्वाकांक्षाओं और निहित स्वार्थों के कारण उनका मन खिन्न हुआ है l इसीलिए वे गाँव, जिसने रचनाकार का पिता की भांति लालन पालन किया है, कवि जब हताश-व्याकुल  हुआ तो शजर की तरह खड़ा रहा l उसके जर्जर होने, टूटने-बिखरने पर, भर भर आँख रोया भी l  ऐसे लोक के प्रति निष्ठावान, लोकग्राही रचनाकार वृहदत्तर मानवप्रेम के हित में  टिके रहेंगे  तब तक जब यह लोक है, समाज है, प्रेम है l गाँव को याद करते हुए कवि के शब्दों में –

 यह कितना अद्भुत है पिता

कि रेखाएँ खिंची जाती हैं कागजों पर

और बनने बिगड़ने लगता है तुम्हारा चेहरा ....

            आज़ादी के साथ-साथ जिस वज्र गरीबी और दुर्भिक्ष ने जन्म लिया, उसमें गाँव ही सर्वाधिक चपेट में आये l अशिक्षा तो पहले से ही थी l किन्तु आपसी भाईचारे की भावना बनी हुई थी l जवाहरलाल नेहरु और सरदार पटेल ने अपने ग्रामीण मॉडल में गाँव से गरीबी, दुर्भिक्ष और अशिक्षा को दूर  करने की योजना थी, किन्तु वे गाँव को नगर में बदलाव के पक्ष में न थे l हालाँकि गाँव की संरचना पहले भी एक जैसी हो, ऐसा भी नहीं है l  सामान्य गाँव रेवेन्यु विलेज की अपेक्षा पिछड़े हुए थे, जनजाति गाँव उससे भी अधिक l गाँव की संचना पर आप विचार करेंगे तो पाएंगे कि सभी गाँव एक जैसे नहीं थे l आज भी जब कभी दंडक वन के सुदूर गाँव को देखता हूँ तो गाँव का रही सही ग्राम्य-प्रेम दूर हो जाता है l भीम राव आंबेडकर ने इसलिए गाँव को नगर में तबदीली की वकालत की थी l बाद में नेहरु के मॉडल को तरजीह दी गयी l राम मनोहर लोहिया, किसन पटनायक  जैसे सामाजिक चिंतकों से बल मिला l सामान्य और रेवेन्यु विलेज विकसित होते गये l किन्तु वैमश्य, क्षुद्रता, काईयांपन  भी बढ़ता गया l

            श्रीलाल शुक्ल, फणीश्वरनाथ रेनु, उदयशंकर भट्ट, राही मासूम रजा, अब्दुल बिस्मिल्लाह जैसे उपन्यासकारों ने गाँव के  क्रमशः इस बदलते स्वरूप को समझा l उन्होंने अपने उपन्यासों में ग्राम्य-निकटता और ग्राम्य-तनाव को बचाए रखा l बाद के कवियों ने भी इस पर विशेष ध्यान दिया, इनमें अष्टभुजा शुक्ल ,देवी प्रसाद मिश्र जैसे रचनाकार हैं l  ‘गॉवनामा’ प्रो. चंद्रदेव यादव जी का सद्य प्रकाशित कविता-संग्रह है l इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह संग्रह हिन्दी के  ग्राम्य आधारित संग्रहों - ‘ग्राम्यगीत, कृषक क्रंदन, ग्राम्या, आकाल और उसके बाद, मैं उस जनपद का कवि हूँ, पद-कुपद की अगली कड़ी है l चन्द्रदेव यादव जी ग्राम्य-चितेरा कवि हैं l उनके कविताओं, आलेखों व संस्मरणों में गाँव की चिंता बराबर बनी रहती है l उन्होंने जो देखा है, जिया है, उसे बिना लागलपेट के लिख दिया है l इसीलिए गाँव की गंध,राग, दुःख जस का तस उतर आया है l गाँव की कथा-कहानी  में उन्होंने लिखा है- गाँव जब कराहता है तो मेरा दिल रोता है, और जब हँसता है तो मेरा रोम-रोम पुलकित हो जाता है  l  ऐसी बात, क्या हिन्दी के किसी रचनाकार ने लिखी है ? संभवतः नहीं, मेरे पढ़ने में तो यह बात कहीं आई नहीं l हिन्दी के गिने-चुने रचनाकार हैं जिन्होंने हल की मूठ पकड़ी है, हरवाही की है, गोरू-बछेरुओं को  चारापानी दिया है, उन्हें मेड मेड पर चराया-फिराया है l गाँव की छिछली राजनीति को जिया है, उसका शिकार हुआ है, भूख, गरीबी, बदहाली देखी है, तलरी का पानी पिया है l चंद्रदेव जी ऐसे ही रचनाकारों में से एक हैं l किन्तु उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद भी उन्हें यह बिसरा नहीं है l अपितु अपनी लेखनी को उन्होंने ‘हर’ बना लिया है, बैलों और गाँव को ‘स्मृति,’ खेत को कागज और उस पर अपने खून-पसीने से हरवाही की तरह ‘विषयों’ को पचिहार देते हैं l वे कविता की खेती करते हैं l अपनी इसी पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि मेरे लिए कविता हलवाही जैसा काम है l इसीलिए कविता के क्षेत्र में मैं शब्दों को टिटकारी मारकर एक आँतर फानने के लिए सजग करता हूँ और फिर अनजुती जमीन पर हराई बनाता हूँ l  धीरे-धीरे पूरी जमीन को जोतना जैसे आहिस्ता-आहिस्ता उसे महसूस करना है l मोटे तौरपर, चन्द्रदेव जी का व्यक्तित्व और उनकी लेखनी में कोई अंतर नहीं है l उनकी रचनाओं में उनका व्यक्तित्व, उनका संघर्ष, उनका गाँव के प्रति मोह पारे की तरह साफ झलकता है l करुणा उनका स्थाई भाव है l इसीलिए उनकी कविताएँ करुणाजन्य-यथार्थ की उपज हैं l

गाँवनामा गाँव का न केवल ओरहननामा है, अपितु कुटिलता, अकस, भोंडापन का आईना भी है l  वह तन्द्रा से आहिस्ता-आहिस्ता उठाता नहीं, बल्कि झकझोर देता है l इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ क्रांति-धर्मी हैं l अपने विन्यास, तन्यता, संयोजन, कसाव में विप्लव-धर्मी भी l वे पाठकों को भवभूति-सी  समीप बुलाती हैं और उनके कर्ण, कंठों में निराला-सा राग छेड़ देती हैं l सामाजिक-साम्यता का जामा-जोरा पहनाती हैं और बन्धुत्व की अलख जगाये रखती हैं l गाँवनामा की त्रिपदियों को ध्यान में रखकर, डॉ. रामप्रकाश कुशवाहा जी ने उचित ही लिखा है कि मार्क्स के साम्यवाद, आधुनिक मानवतावाद भेदभाव और शोषण व्यवस्था वाला भारतीय समाज तथा स्त्री की मुक्ति और समानता के प्रश्न भी कवि विभिन्न त्रिपदियों में उठाता है  (देखें, गाँवनामा : इतिहास चीख कर बोला , हस्तांक वेब पोर्टल ) l  ओरहन शिकायत नहीं है, उसमें आक्रोश भी है, शिकायत भी, दर्द भी है, क्षुब्धता भी l बनवारी, फुलवा, धनीराम, इतिहास चीख़कर बोला  जैसी कविताएँ को इस लिहाज से आप देख सकते हैं l

गाँव का विमर्शवादी-पाठ उत्तर-आधुनिकतावाद की देन है l हालाँकि मानवशास्त्र (एन्थ्रोपोलॉजी) ने यह बहस पहले शुरू की l बाद में अन्य अनुशासनों ने इसे अपने-अपने ढंग से स्वीकार किया l जर्मन-सम्प्रदाय व अमेरिकी-सम्प्रदाय गाँव के विमर्शवादी पाठ के महत्वपूर्ण अध्ययन केंद्र हैं l जर्मन-संप्रदाय गाँव का अध्ययन सांस्कृतिक चक्र के रूप में किया है l उनका मानना है कि इसके विकास का कोई निश्चित क्षेत्र नहीं है l जबकि अमेरिकी-सम्प्रदाय क्षेत्र विशेष के ऐतिहासिक अध्ययन पर जोर दिया है l अमेरिकी सम्प्रदाय के विचारक बोआस ने अपने लेख  द लिमिटेसन ऑफ़ द कॉम्परेटिव मैथड’ में समाज की निजी संस्कृति पर बल दिया है l उन्होंने कहा है कि समाज के निजी संस्कृति को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए l चंद्रदेव जी बोआस की भांति समाज को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने के पक्षपाती हैं l  भले ही उनका सृजनात्मक-समाज बनारस, गाजीपुर के आसपास की उपज हो, किन्तु उदात्तता के कारण वैश्विक गाँवों के समीप है l उन्हें लोकगीतों और लोक कलाओं की चिंता हमेशा बनी रहती है l इसीलिए गाँव की भुखमरी के दिन भी उन्हें जातीय गीत ‘बिरहा’ का स्मरण रहा l नमूना देखें -

सुबहें सुन्दर होती लेकिन

वह सब हमको नहीं सुहाता l

भूखे कोई बिरहा गाता ?

बिरहा, नौटंकी, घरों के छाजन, लिपाई-पोताई, गेरू के छाप, काउड़ा, सउर-कर्म, नार-कटाई, अनरसा,पूआ, दीप पर्व, जैसे सन्दर्भ वे भूले नहीं हैं, गाँव के सूक्ष्म से सूक्ष्मतम मनोचित्र के वर्णन में उनका जबरदस्त अधिकार है l यही कारण है कि इस तरह के सन्दर्भों के सन्मुख वे सम्मोहित अवश्य होते हैं किन्तु उससे बाहर निकलने का विवेक हमेशा बना रहता है l 

गाँधी व अम्बेडकर के नक्श-ए-कदम पर जिस गाँव ने क्रांतियाँ की हो, रेल लूटी  हो, जेल गया हो, अग्रेजों से लाठियाँ खाई हो, शहीद हुआ हो, मानवप्रेम का कारण बना हो, उसे बाद में लूटा गया हो, बंजर किया गया हो, बाजार और सस्ते डीजे गानों के थिरकनों के हाथ बेच दिया गया हो l यह सब देखकर उदारमना कवि का क्षुब्द, आक्रोशित होना स्वाभाविक है l  

चंद्रदेव जी ऐन्द्रिय बोध के कवि हैं l यदि देस-राग  ऐन्द्रिता और बिम्ब-धर्मिता का प्रवेश-द्वार है तो पिता का शोकगीत  गाँवनामा  उसका उत्कर्ष l इतिहास चीखकर बोला, गाँव गया था जब जाड़े में, फुलवा  जैसी कविताओं में कोई रंग-रोधन नहीं है l और न बिम्बों को उकेरने में कोई रमदा लगाकर चिकना किया गया है l इसलिए ये कविताएँ निजी जीवन की खेती लगती हैं l उत्तर-वैश्वीकरण के बाद गाँव में हुए तीव्र परिवर्तन के कारण गाँव में शहरीकरण का सस्ता  किन्तु भोंडा विकास हुआ है l अब अलाव पर बैठकर चिलम फूकते बूढ़े शायद ही मिलें किन्तु हर साँझ देशी और अंग्रेजी शराब के नशे में धुत युवा नहर की पटरियों,खलिहानों, ट्यूबवेलों  में झूमते दिख जायेंगे l कट्टा और बन्दूक, मारपीट, गाली-गलौज, झाँसेदारी, आगजनी जैसे क्रियाओं सन्दर्भों की बाढ़ आ गयी हो l नई रति, नये कामदेव की मादक क्रीडाओं से गाँव शर्मशार अवश्य हुआ है l नमूना देखें –

संझा को ठेकों पर रौनक – चिखना, चुक्कड़ और पियक्कड़ / पीने वाले लाल बुझक्कड़

अस्तु, गाँवनामा ग्रामीण-भारत के इतिहास का सर्जनात्मक दस्तावेज़ है l इसमें इमरजेंसी पूर्व ग्रामीण भारत, इमरजेंसी पश्चात, वैश्वीकरण तथा उत्तर वैश्वीकरण के ग्रामीण भारत में हुए परिवर्तनों, आंदोलनों, घटनाओं, पलायन, प्रवर्जन, मूल्यों व सांस्कृतिक सन्दर्भों का समय दर्ज हुआ है l सृजनात्मक कसाव, गठन, लय लम्बी कविताओं के बावजूद टूटा नहीं है, ग्रामीण पात्रों पर आधारित कविताओं में भाषा संवादधर्मी और आत्मीय है l ग्राम्य-निकटता व ग्राम्य तनाव लिए हुए है l इसलिए इसके विस्तृत कैनवास में किसी एक वृत्ति को उकेरना इसके साथ समझौता करना है l  

 

-               सुशील द्विवेदी

                                                 सम्पर्क : susheeld.vats21@gmail.com

 

 

                                  

 

    

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