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नींद गहरी है

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   कविताएँ      वंदना पराशर    रीढ़-विहीन लोग   उसकी रीढ़ की हड्डी    झुकती जा रही है वह हैरान नहीं है , थोड़ा परेशान है अपने बचपन की मासूमियत को खोकर आशंका है कि कल लोग रीढ़- विहीन हो जाएंगे उनके कान लम्बे किन्तु छिद्र प्राय: बंद होंगे सबके आंखों पर एक मोटी कांच की दीवार होगी जिसमें सबकुछ धुंधला दिखेगा स्वंय के बनाए हुए यंत्र ही   उसे ढाल देंगे एक यंत्र में जहां उसके सोचने- समझने की शक्ति संचालित होगी रोबोट की रिमोट से हाड़- मांस का बना यह शरीर एक यंत्र में बदल जाएगा खत्म हो जाएगी उसकी संवेदना उसकी हंसी , उसके आंसू सब नकली होंगे रीढ़- विहीन लोग   हताश होकर दौड़ रहें हैं चारों दिशाओं में कभी आकाश , कभी पाताल अंतरिक्ष के हरेक कोने में झांक रहे हैं और ढूंढ रहे हैं अपने लिए एक पहाड़- खुशियों का।                             एक गहरी चुप्पी   इतिहास में दर्ज हो जाएगी   कल की तरह ही आज की घटनाएं भी   वो तमाम बातें   वो तमाम किस्से   इतिहास ...

शंख और लामा

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    कविताएँ          दीपक जायसवाल     गैस-चैम्बर मृत्यु आँकड़ों की शक्ल में आए कितना विभत्स है यह नाज़ियों ने बनाए इसके लिए गैस-चैम्बर पूँजीवादियों ने बनाए बाज़ार।     भूख   भूख के मरते ही मर जाता है आदमी बहुत भूख से भी मर जाता है आदमी मरता तो तब भी है जब वह सिर्फ अपने लिए जीने लगता है जब दुनिया में कही कोई आदमी भूख से मरता है उस समय हर वह आदमी जिस की आँख में पानी मरा नहीं थोड़ा सा मर जाता है। मरने को तो मर गया सिकन्दर भी , हिटलर भी गांधी भी , नार्मन बरलॉग भी , टॉलस्टाय भी , मर्लिन मुनरो और आरकेस्ट्रा वाली मुनिया भी पर इनके भूख में अंतर था मरने में अंतर था । तय है कि हम सब मरेंगें मर जायेगा जेम्स बॉण्ड भी हम इस नियति को बदल नही सकते पर हम तय जरूर कर सकते हैं मरने के तरीके को कि कौन सी भूख हमें ताउम्र घसीटे ले चलेगी। बहुत खुशकिस्मत हैं जो आप पढ़ सकते हैं सोच सकते हैं और तय कर सकते हैं अपनी पसन्द के भूख ...