नींद गहरी है
कविताएँ वंदना पराशर रीढ़-विहीन लोग उसकी रीढ़ की हड्डी झुकती जा रही है वह हैरान नहीं है , थोड़ा परेशान है अपने बचपन की मासूमियत को खोकर आशंका है कि कल लोग रीढ़- विहीन हो जाएंगे उनके कान लम्बे किन्तु छिद्र प्राय: बंद होंगे सबके आंखों पर एक मोटी कांच की दीवार होगी जिसमें सबकुछ धुंधला दिखेगा स्वंय के बनाए हुए यंत्र ही उसे ढाल देंगे एक यंत्र में जहां उसके सोचने- समझने की शक्ति संचालित होगी रोबोट की रिमोट से हाड़- मांस का बना यह शरीर एक यंत्र में बदल जाएगा खत्म हो जाएगी उसकी संवेदना उसकी हंसी , उसके आंसू सब नकली होंगे रीढ़- विहीन लोग हताश होकर दौड़ रहें हैं चारों दिशाओं में कभी आकाश , कभी पाताल अंतरिक्ष के हरेक कोने में झांक रहे हैं और ढूंढ रहे हैं अपने लिए एक पहाड़- खुशियों का। एक गहरी चुप्पी इतिहास में दर्ज हो जाएगी कल की तरह ही आज की घटनाएं भी वो तमाम बातें वो तमाम किस्से इतिहास ...