इलाहाबाद बनाम प्रयाग
दरअसल सवाल यह नहीं है कि इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयाग रख देने से हमारा मान बढ़ जायेगा, हमारी संस्कृति की रक्षा होगी। हम अपनी परम्परा से सीधे जुड़ेंगे। सवाल यह भी नहीं है कि हमारी जब़ान में इलाहाबाद का नाम इतना चढ़ गया है कि प्रयाग कहने में अटपटा लग रहा है। कोई भी नाम जो प्रचलित है उसे बदल देने से दो चार पीढ़ियाँ भले ही अपने को असहज महसूस करें, अपना को कटा हुआ पायें किन्तु एक समय के बाद हम उस नाम के आदी हो जाते हैं। 'प्रयाग संगीत समिति' ,प्रयाग महिला विद्यापीठ , प्रयाग जंक्शन का नाम बदलकर हम कोई दूसरा नाम रख दें तो क्या लोक उसे स्वीकार करेगा? ऐसा करना इतना आसान नहीं है जितना हम सोचते हैं। लोक में आज भी यह भावना नहीं है कि इलाहाबाद शब्द से मुस्लिम संस्कृति का बोध होता है या प्रयाग से हिन्दू संस्कृति का। हमारी परम्परा का। लोक इन सब बातों पर अधिक ध्यान नहीं देता है, उसके लिये ये सब अनर्गल बातें हैं। वह अपने ही प्रेम के नशे में स्वयं को सम्पृक्त पाता है। किसी की परवाह किये बिना अपने ही अंदाज़ में जीता है। भला दो चार किताबें, दस बीस ग्रंथों को पढ़ लेने से लोक का आत्मीय आनंद मिल सकता है ? इस बावरे मन को कौन समझाए कि लोक किताबों में नहीं हृदयों में बसता है। कोई भी नाम बदलने के पीछे कोई एक घटना प्रभावी नहीं होती,बल्कि संबंधित घटनाएँ ,कार्य शैलियाँ भी प्रभावित होती हैं। हमारी ही संस्कृति यह सीख देती है- 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' । माता और जन्मभूमि स्वर्ग से बढ़कर है। जिस मां ने हमें जन्म दिया, जिस भूमि में हम पैदा हुए ,जहाँ के वृक्षों, लताओं, नदियों ,तालाबों का उपयोग हमने किया तो क्या बड़े होकर हम उन्हीं के साथ फेरबदल करें ? उसका नाम बदलें? अपनी मां का नाम रीता से गीता या सीता कर दें, यह किसी भी देश की मनीषा स्वीकार नहीं करेगी। अपनी मातृभूमि के नाम में फेरबदल करने का असह्य दुःख भला वह व्यक्ति कैसे समझ सकता है जो स्वयं निर्मोही हो? आसानी से कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभूमि छोड़ना नहीं चाहता, कारणवश यदि उसे छोड़ना भी पड़ जाये तो उसके नाम को वह आजीवन नहीं भूल पाता। उसी नाम के सहारे पराये शहर में अपने को सुरक्षित पाता है। उसे हमेशा यह भान रहता है कि यदि यहाँ से निकाल भी दिये जायेंगे तो अपना वतन है ही , वह उसे उसी रुप में स्वीकार करेगा जो वह है। अपनी माटी से सबसे अधिक लगाव वहाँ के कामगारों, सैनिकों और विद्यार्थियों में होता है। तो क्या कोई भी देश इनका ऋण चुका पाने में समर्थ है। अनजाने में ही सही, जब कभी अपनी मातृभूमि का नाम कोई मजदूर, कोई सैनिक, कोई विद्यार्थी सुनता है तो महीनों, वर्षों की मलीनता एक क्षण के लिए इस तरह गायब हो जाती है गो उसके पूरे बदन में बिजली कौंध गयी हो। क्षण भर के लिए ही सही,उसे जो असीम आनंद मिलता है,क्या उसका कोई मूल्य हो सकता है? वह स्वयं सभी मूल्यों से बढ़कर है,भला जो स्वयं मूल्येतर है,उसका क्या मूल्य हो सकता है?
कोई भी नाम बदलने के लिए पूंजी का होना अति आवश्यक है। एक छोटा से छोटा सामान खरीदने के लिए बाजार जाइए ,बिना धन के कोई भी व्यापारी वह वस्तु नहीं देगा। मुझे याद है मेरे घर के आसपास कई ऐसे कामगारों, किसानों के घर हैं जिनके शाम को दीपक जलाने के लिए मिट्टी का तेल भी कभी कभी नहीं हुआ करता था। अंधेरे के डर से वह अपना काम जल्दी निपटा लेते। कभी कभी उन्हें दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती थी। उन्हें खाली पेट ही सोना पड़ता था। आज जब कभी उनका जिक्र सुनता हूं तो यकीन मानिए बहुत दुःख होता है। आज भी उनके घरों की उदासी , दरिद्रता, उनका पीछा नहीं छोड़ती। चुनाव के समय वह किसी भी नेता का चुनाव इसलिए नहीं करते कि उनकी संस्कृति की रक्षा होगी,बल्कि इसलिए कि शायद अमुक नेता के चयनित होने से उनका दुःख थोड़ा कम हो जायेगा। उन्हें यह आशा रहती कि हमारी भावी पीढ़ी सुखी रहेगी। इसलिए नहीं करते कि उनके दुःख को आप दूना कर दें। इधर बीच इलाहाबाद के कई समृद्ध लोगों से मेरी बातचीत हुई , उन्हें इस बात का सबसे बड़ा दुःख कि पैन कार्ड,आधार कार्ड में इलाहाबाद की जगह प्रयाग लिखवाने के लिए फिर से लाइन में लगना होगा,पैसा जो खर्च होगा ,उसकी कोई बात नहीं । अब जरा सोचिए कि समृद्ध परिवारों की स्थिति यह है, तो इलाहाबाद के सीमा पर बसे उन गांव के लोगों का क्या हाल होगा जिनके पास कोई फूटी कौड़ी भी नहीं है। आधार, पैन के अतिरिक्त अन्य जरूरी कागजात होंगे जिसमें उन्हें नाम बदलाना होगा। अपने काम का नुकसान कर पंक्ति में खड़ा होना पड़ेगा, व्यय जो होगा उसकी भरपाई वह कितने दिनों में करेंगे?
किसी शहर का नाम बदलने के लिए बहुत धन की जरूरत होती है, तो क्या ऐसे समय में जब हमें रोजगार न मिल रहा हो,हमारा अपमान कर हमें दूसरे प्रांतों से भगाया जा रहा हो , क्या हमारे मुखिया का यह दायित्व नहीं बनता कि जो आधार भूत जरुरत है,उस पर ध्यान दे ,न कि उसपर जो हमारे लिए जीवन से बढ़कर नहीं है..
कोई भी नाम बदलने के लिए पूंजी का होना अति आवश्यक है। एक छोटा से छोटा सामान खरीदने के लिए बाजार जाइए ,बिना धन के कोई भी व्यापारी वह वस्तु नहीं देगा। मुझे याद है मेरे घर के आसपास कई ऐसे कामगारों, किसानों के घर हैं जिनके शाम को दीपक जलाने के लिए मिट्टी का तेल भी कभी कभी नहीं हुआ करता था। अंधेरे के डर से वह अपना काम जल्दी निपटा लेते। कभी कभी उन्हें दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती थी। उन्हें खाली पेट ही सोना पड़ता था। आज जब कभी उनका जिक्र सुनता हूं तो यकीन मानिए बहुत दुःख होता है। आज भी उनके घरों की उदासी , दरिद्रता, उनका पीछा नहीं छोड़ती। चुनाव के समय वह किसी भी नेता का चुनाव इसलिए नहीं करते कि उनकी संस्कृति की रक्षा होगी,बल्कि इसलिए कि शायद अमुक नेता के चयनित होने से उनका दुःख थोड़ा कम हो जायेगा। उन्हें यह आशा रहती कि हमारी भावी पीढ़ी सुखी रहेगी। इसलिए नहीं करते कि उनके दुःख को आप दूना कर दें। इधर बीच इलाहाबाद के कई समृद्ध लोगों से मेरी बातचीत हुई , उन्हें इस बात का सबसे बड़ा दुःख कि पैन कार्ड,आधार कार्ड में इलाहाबाद की जगह प्रयाग लिखवाने के लिए फिर से लाइन में लगना होगा,पैसा जो खर्च होगा ,उसकी कोई बात नहीं । अब जरा सोचिए कि समृद्ध परिवारों की स्थिति यह है, तो इलाहाबाद के सीमा पर बसे उन गांव के लोगों का क्या हाल होगा जिनके पास कोई फूटी कौड़ी भी नहीं है। आधार, पैन के अतिरिक्त अन्य जरूरी कागजात होंगे जिसमें उन्हें नाम बदलाना होगा। अपने काम का नुकसान कर पंक्ति में खड़ा होना पड़ेगा, व्यय जो होगा उसकी भरपाई वह कितने दिनों में करेंगे?
किसी शहर का नाम बदलने के लिए बहुत धन की जरूरत होती है, तो क्या ऐसे समय में जब हमें रोजगार न मिल रहा हो,हमारा अपमान कर हमें दूसरे प्रांतों से भगाया जा रहा हो , क्या हमारे मुखिया का यह दायित्व नहीं बनता कि जो आधार भूत जरुरत है,उस पर ध्यान दे ,न कि उसपर जो हमारे लिए जीवन से बढ़कर नहीं है..
टिप्पणियाँ