जगुआ
चांदनी रात में
घडी के बारह बजे
मैं कनॉट प्लेस के बीचो-बीच
पार्क में खड़े होकर चारो तरफ देखता हूँ
कि कनॉट प्लेस
शव वस्त्र में लिपटा हुआ दिखाई देता है
मैं बेतहासा भागता हूँ
कनॉट प्लेस का भूत मेरा पीछा करता करता है
रास्ते में मुझे
लुटियंस और हरबर्ट बेकर
हाथों में सुन्दर दिल्ली का भविष्य लिए दिखाई देते हैं
उस पर मैं
झपट्टा मारकर टुकड़े टुकड़े कर डालता हूँ
और भागता हूँ
कि गाजियाबाद और कानपुर की
ऊँची-ऊँची फैक्ट्रियों की चिमनियों से टकरा जाता हूँ
चिमनियों से निकला हुआ धुंआ
काली साया सा मेरी आत्मा में प्रवेश कर जाता है
और मैं मूर्छित हो जाता हूँ
कुछ समय बाद मैं खुद को मजदूरों के बीच पाता हूँ
किसी रेलवे स्टेशन की गंध
अपनी आत्मा में लिए मजदूर
खुद को भारत भाग्य विधाता के परचम के नीचे
अस्तित्वहीन पाता है
और उसके बच्चे आँखों में तरुणाई का सपना लिए
वृध्द हो गए हैं
पत्नियां बेवा हो गयी हैं
उनके नशों में
खून की जगह
मटमैला दिन
रात्रि का गहन अँधेरा
और भविष्य का मर्म
उतर आया है
सोचता हूँ कि
आज़ादी के सत्तर साल बाद भी
मज़दूरों का गाढ़ा लाल खून
मोहरों और स्टाम्प पेपर कि गाढ़ी स्याही से आगे नहीं निकल पाया
मुझे उनके चेहरे पर
प्रधान सेवकों के
हिंसक जुमले दिखाई देते हैं
जो मज़दूरों कि आत्मा को
बहुत ही धृष्टता के साथ चुनौती देते हैं
कि तुम मज़दूर हो
चिर सम्भावी मज़दूर
घडी के ठीक तीन बजे
अफ़राए डांगर सा
वहां से भागता हूँ
कि आनंद भवन की स्वेत ओपदार दीवार से टकरा जाता हूँ
पाता हूँ
कि आनंद भवन स्वेत वस्त्र में लिपटा हुआ पार्थिव शरीर बन गया है
मैं शववस्त्र को उघाड़ देता हूँ
मुझे नेहरू अपने जीवन -दर्शन
अर्थशास्त्र के सिद्धांतों
प्रमेयों ,अनुप्रयोगों
और इतिहास के अलिखित साक्ष्यों कि गुत्थियां
सुलझाते बैठे दिखाई देते हैं
मैं पूछता हूँ उनसे टपक सिद्धांत
वह मुझे गांव के सिवांर में खड़े
जगुआ की ओर इशारा करते हैं
मैं वहां से कस्बों ,गांवों और पुरवा-पाही को लांघता हुआ
जगुआ के खेत में पहुंच जाता हूँ
आज़ादी के सत्तर साल के इतिहास को
चारपाई के ओरचावन
और लटकते हुए बाध में पाता हूँ
और सत्तर साल के भूगोल को
सिरवा और पाटी के संयुग्मी पेरुआ में
जिसका एक सिरा सत्तर साल से
घिसते घिसते पाकिस्तान हो गया है
और दूसरा
कुंए की गरारी सा
घिसते हुए कचरे का गड्ढा
खुद समूची चारपाई
सत्तर साल का इतिहास
जिसमे जगुआ लेटता है
वह जितनी बार करवट बदलता है
चारपाई कराह उठती है
जिसके आर्तनाद से
गांव सिवांर ,पुरवा पाही
क़स्बा ,महानगर,देश का सीना सिकुड़ कर फोड़ा हो जाता है
जगुआ अपने चार जवान बेटियों के साथ
सुबह के पांच बजे
हल चलाता है तो इतिहास के धरती का सीना
ओदर कर रवा हो जाता है
गांव सिवांर से
उसके खेत में
अपने वस्त्रों को उघार कर
जब जवान लड़कियां
मलमूत्र त्याग करती हैं
तो विकास का सत्तर साल धुँआ हो जाता है
तब मलमूत्र की गंध और विकास की गंध में फर्क करना मुश्किल हो जाता है
जगुआ
जब अपने खेत में हल चलाता है
तो मटमैले कपड़ों व खेत की गंध से
उसका पसीना लोहित हो जाता है
तब जाकर विकास का सूर्य उदित होता है
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