पाठांतर सम्बन्ध : एक विवेचन( विशेष सन्दर्भ आचार्य शुक्ल और माता प्रसाद द्वारा सम्पादित जायसी कृत पद्मावत )
दरअसल पाठांतर की समस्या पाठक की समूची मनोदशा को बदल देती है | आधुनिक युग में यूरोपीय विद्वानों ने पाठांतर की समस्या पर पहली बार विचार किया और पाया कि पाठांतर पाठ के अर्थ निर्धारण की प्रक्रिया को कमजोर बनाता है |हिंदी में जगन्नाथदास रत्नाकर ने बिहारी सतसई की पांडुलिपियों और टीकों के माध्यम से बिहारी सतसई का एक नया पाठ निर्धारित किया जो महत्वपूर्ण है | इनके बाद शम्भुनारायण चौबे ,माताप्रसाद गुप्त आदि विद्वानों ने पाठांतर की समस्या का निर्धारण करते हुए नये नए पाठ तैयार किये |१९४२ ईस्वी में माता प्रसाद गुप्त ने बनारसी दास जैन की अर्द्धकथानक की पाठ समस्याओं पर एक विवेचनात्मक लेख हिंदी अनुशीलन में प्रकाशित किया | भारतीय काव्य शास्त्र में अभिनवगुप्त ने रस निष्पत्ति विचार पर एक टिका लिखा | इससे पूर्व भट्टलोल्लट ने भी टिका लिखा था लेकिन उनकी कोई भी टिका उपलब्ध नहीं मिलती लेकिन अभिनव गुप्त के यहाँ इसका ऊलेख अवश्य है | पूना के भण्डारकर शोध संस्थान में महाभारत का प्रमाणिक संस्करण मिलता है | इस संस्करण के लिए ११वीं शताब्दी में तेलगू और जापानी भाषा में अनुदित संस्करणों की सहायता ली गयी है | ध्यातव्य यह है कि पाठ निर्धारण के समय संपादक के सामने चुनौती होती है | इस चुनौती के सम्बन्ध में विनय मोहन शर्मा लिखते हैं –पाठ परम्पराएँ शब्द लोप ,प्रक्षेप ,संक्षेप,परिवर्तन ,परिवर्धन,वर्ण आगम,लोप आदि से भिन्न हो जाती है | यहाँ लिपिक अपने ज्ञान या अज्ञान का परिचय देता है लिपि ज्ञान के आभाव में वह मनमाने वर्ण लिख जाता है 1. |
पाठांतर का सम्बन्ध निर्धारण करते समय माता प्रसाद गुप्त ने लिख है – विभिन्न प्रतियों में ऐसे पाठांतर मिलते हैं जिनके अप्रमाणिक होने की सम्भावना स्वतः सिध्द नहीं है | ऐसी दशा में उनके आधार पर प्रतियों का पाठ सम्बन्ध तभी माना जा सकता है जब अशुध्दि साम्य के स्थल बहुतायत हों और अशुध्दियाँ यदि कविं के द्वारा सर्वथा असंभव नहीं तो कम से कम संभव अवश्य मानी जा सकती हैं |२. आगे वे लिखते हैं – इनमें से बीस पाठांतर तो प्रतिलिपि तथा प्रक्षेप दोनों संबंधों से सिध्द हैं तथा सत्ताईस केवल प्रतिलिपि सम्बन्ध से सिध्द हैं | शेष चौदह स्थलों के पाठांतर का वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है |३.
माता प्रसाद गुप्त ने पद्मावत के पाठ शब्द रूपों और भाषा रूपों के जरिये शुद्ध करने की कोशिश की है |हालाकि की कई जगह छंदों के साथ जबरजस्ती करने की कोशिश की गयी है | इसके बावजूद इनका पाठ आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जगह अधिक पठनीय और सुबोध पूर्ण है , अशुद्धियाँ कम हैं | आचार्य शुक्ल ने पद्मावत के जी अंश को रूपक बताते हैं ,उसी अंश को माताप्रसाद गुप्त ने क्षेपक कह कर हटा देते हैं | इस अंश का उदहारण देखा जा सकता है –
मैं एही अरथ पंडितन बूझा |
कहा कि हम्म किछु और न सूझा
तन चितउर मन राजा कीन्हा
हिय सिंघल बुधि पद्मिनी चीन्हा
गुरु सुआ जेहि पंथ देखावा
बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के संस्करण में उपसंहार वाला अंश –
मुहम्मद यदि कवि जोर सुनवा,सुना जो प्रेम पीर गा पावा |
जोरी लायी लकत कै लेई ,गढ़ी प्रीति नैन जल भेई |
औ मन जानि कवित अस कीन्हा ,मकु यह रहै जगत महं चीन्हा |
कहाँ सो रतनसेन अस राजा,कहाँ सुआ अस बुधि उपराजा |
कहाँ अलाउद्दीन सुलतानू,कहाँ राघो जेई कीन्ह बखानू |
कहाँ सुरूप पद्मावती रानी ,कोई न रहा जग रही कहानी |
धनि सो पुरुष अस कीरति जासू, फूल मरै पर मरै न बासू |
केइं न जगत जस बेंचा केइं न लीन्ह जस मोल
जो यह पढे न कहानी ,हम संवरें दूइ बोल ||
दरअसल जिसे माताप्रसाद गुप्त पूरे जोर देकर यह कह रहे हैं कि यह क्षेपक है ; उसे आचार्य शुक्ल रूपक के रूप में घोषणा करते हैं | लेकिन यह क्षेपक या रूपक है तो आगे आनेवाले दिनों में अनुसन्धान से वह प्रमाणिक हो जायेगा कि पारलौकिक थी या कि लौकिक | बहरहाल डॉ. माताप्रसाद गुप्त के संस्करण का पाठ अधिक निश्चय व जायसी के पाठ के अधिक नजदीक है | नागमती वियोग खंड के कुछ अंश के माध्यम से इस विवाद को समझा जा सकता है –
आचार्य शुक्ल - बिप्र रूप धरि झिलमिल इंदू
मा.प. गुप्त – भारथ भएउ छल मिला इंदू
जायसी ने कई स्थलों में भारत के लिए भारथ शब्द का प्रयोग किया है | भारत का प्रयोग भारत युध्द ,महाभारत ग्रन्थ और उसके पात्र अर्जुन के लिए किया जाता है | जबकि झिलमिल कवच का वाचक है | महाभारत में सूर्य देवता के पूजा के समय देवराज इंद्र कर्ण से कवच दान में मांग लेते है | लेकिन इस कवच के मांगने से कवि की सोच अर्जुन के आनंद तक जुड़ जाती है | यही कारण है कि वासुदेव शरण अग्रवाल भी म.प. गुप्त जी से सहमत हैं |
आचार्य शुक्ल - रकत पसीज भीज गई चोली
म.प. गुप्त - रकत पसीज भीज तन चोली
चोली कहने मात्र से तन चोली का भाव स्पष्ट हो जाता है | इसलिए तन चोली कहना अनावश्यक लगता है | वासुदेव शरण अग्रवाल भी मा.प. गुप्त जी से सहमत हैं | लेकिन तर्कतः आचार्य शुक्ल का यह वाक्य शुद्ध है |
आचार्य शुक्ल – खन एक आव पेट महं ! सांसा | खनहिं जाइ जिउ ,होइ निरासा ||
मा.प.गुप्त – खिन एक आव पेट महं स्वसा | खिनही जाई सब होई निरासा ||
यहाँ खन शब्द का प्रयोग क्षण के सन्दर्भ में प्रयुक्त हुआ है | लेकिन खन शब्द ध्वन्यात्मक है जैसे सिक्के का खनकना | यदि खिन शब्द कजा प्रयोग किया जायेगा तो वह खिन्नता या मलिनता के साथ आयेगा | स्वांस निकालने में या छोड़ने में ध्वनि निकलती है जिसे अनहद नाद कहा जाता है | इसलिए खान शब्द प्रयोग उचित है | इसके अतिरिक्त सब शब्द का प्रयोग भी उचित नहीं लगता क्योकि नागमती राजभवन की अकेली स्त्री है जो काम पीड़ित है , जिसका पति नहीं है |
आचार्य शुक्ल –
आजि जो मारे बिरह कै ,आगि उठै तेहि लागि |
हंस जो रहा सरीर महं ,पांख जरा, गा भागि ||
मा. प्र. गुप्त –
आह जो मारै बिरह की ,आगि उठी तेहि हांक |
हंस जो रहा सरीर महं ,पांक जरे तन थाक ||
आचार्य शुक्ल की टिप्पणी में हंस के पांख जलने के बाद भाग जाता है |गुप्त जी के यहाँ शरीर में पड़ा रह जाता है | हंस यदि आत्मा का प्रतीक तो वह शरीर में पड़ा है | इस सन्दर्भ में दोने के अर्थ भिन्न है-
आचार्य शुक्ल – इस समय जो बिरह की मरी हुई है उसमें लगी हुई आग ऊपर उठ रहीं है | शरीर में जो हंस या जीव था ,उसके पांख जल गये और वह भाग गया |
मा.प. गुप्त द्वारा निर्धारित अर्थ- उसके मुंह से बिरह की आग निकली | उस हांक से अग्नि उत्पन्न हुई शरीर में हंस था उसके पांख जल गये अतएव वह शरीर में ही रह गया |
थाक का अर्थ थकन और सीमा से है | पंख जलने के बाद वह उड़ने में असमर्थ है ,फिर भी अधिक प्रयास के चलते वह थक गया है इसलिए वह देह में ही रह गया है | म. प. गुप्त द्वारा दी गयी टिप्पणी आचार्य शुक्ल से अधिक स्पष्ट है अतः वह ठीक है |
यद्यपि समूचे पद्मावत में इस तरह का पाठांतर देखा जा सकता है | एक स्थान पर मा. प. गुप्त ने कौनिउ के स्थान पर शुक्ल जी द्वारा पुन्यों शब्द अधिक सार्थक है | यद्पि दोनों पाठ स्वत्रंत हैं इसके बावजूद शुद्ध पाठ के लिए ये दोनों पाठ आवश्यक है|
जूलिया क्रिस्तिवा ने अंतर्पाठीय के इस सम्बन्ध को बताती हुए लिखती हैं - Any text is a new tissue of past citations. Bits of code, formulae, rhythmic models, fragments of social languages, etc., pass into the text and are redistributed within it, for there is always language before and around the text. Intertextuality, the condition of any text whatsoever, cannot, of course, be reduced to a problem of sources or influences; the intertext is a general field of anonymous formulae whose origin can scarcely ever be located; of unconscious or automatic quotations, given without quotation marks. ("Theory of the Text" 39).
वस्तुतः पाठांतर केवल किसी पाठ निर्धारण में ही मदद नहीं करता बल्कि किसी पाठ के पढने का सिद्धांत विकसित करता करता है |
सन्दर्भ ग्रन्थ सूचि
शोध प्राविधि,डॉ. विनय मोहन शर्मा,मयूर पेपर बैक्स,दिल्ली संस्करण २०१३ ,पृष्ठ ८८
जायसी ,पदमावत, संपादक – डॉ. माता प्रसाद गुप्त ,साहित्य भवन प्र . लिमिटेड इलाहबाद ,संस्करण २००६ ,भूमिका से
वहीँ से
पदमावत,रामचंद्र शुक्ल , नागमती वियोग खंड
हिंदी पठानुसंधान ,कन्हैया सिंह ,
हिंदी शब्दकोश,डॉ. हरदेव बाहरी ,राजपाल प्रकाशन
- सुशील द्विवेदी
टिप्पणियाँ