इधर तो मेरा कमरा नहीं है
आज जब दिल्ली के सर्द मौसम में बेवज़ह अकेला टहल रहा हूं ,न जाने क्यों मुझे पिता जी की याद आ रही हैं । बचपन में मुझे कहानियाँ सुनने का बड़ा शौक़ था। जब तक एक- दो कहानियाँ सुन नहीं लेता,मुझे नींद नहीं आती थी। कई बार तो कहानियाँ सुनने के चक्कर में मार भी खानी पड़ती, दिन भर के कामकाज से थकी मां,मुझे कहानियाँ सुनाएं या थोड़ी देर आराम करें' ,उनके विषय में न मैं सोचता था और न इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता । मां की डांट या मार के लिए मैं हमेशा तैयार रहता किन्तु अपनी कहानियाँ सुनने की जिद में डटा रहता। आखिरकार मेरे ज़िद के आगे मां को हारना पड़ता। रात में सबका बिस्तर लगाने और जरुरी काम करने के पश्चात लगभग दस ग्यारह बजे तक वह अपना बिस्तर तैयार करतीं फिर कहीं मुझे कहानियाँ सुनाती। उनके कहानियों में शामिल होते थे - 'सीकन की गाड़ी , दुई मूस नाधे जाएं' या फिर चिड़िया- चुरुकवा। उन दिनों मुझे तनिक भी एहसास नहीं होता था कि आखिर मां की कहानियों के विषय में ये सब क्यों शामिल होते हैं? किन्तु आज जब मैं सोचता हूं तो आंखों से अनायास ही आँसू टपक पड़ते हैं। कभी- कभी मां जब अधिक थक जातीं तो पिता जी से मुझे कहानी सुनाने के लिए कहतीं। प्रायः पिता जी कहानियाँ नहीं सुनाया करते थे किन्तु बड़े आग्रह के बाद वे बहुत आदर्शात्मक या नैतिक कहानियाँ सुनाते,कभी तो उनके विषय इतने गम्भीर और पात्र इतने जटिल होते कि कहानियाँ समझ में भी नहीं आती थी। पहली बात यह कि कहानी इतनी बोझिल और ऊपर से पिता जी का डर ..मैं कह भी नहीं सकता था कि यह कहानी मत सुनाइए ,कोई और सुनाइए। यह कहानी मुझे समझ में नहीं आती। मैं कहना चाहता कि मां जैसी कोई कहानी जो हर रात मेरे कोमल सपनों में आती है ,किन्तु कहता कैसे, क्योंकि वह पिता हैं। एक बार तो शाम को ही पिता जी कहानी सुनाने लगे, उस दिन उनसे न किसी ने आग्रह किया और न उन्होंने न नूकूर की । न जाने क्यों, उस दिन वे बहुत खुश थे, मैंने महसूस किया कि उस दिन पिता जी मां के बराबर हो गये थे। आज जब सर्द हवा बड़ी जाहिलियत से कानों को छू रही है,मैं मफलर को कंधे से उठाकर आहिस्ता आहिस्ता कानों को ढकने की कोशिश कर रहा हूं। यह वही मौसम है जब पिता जी अलाव के पास मुझे बैठाकर , अपना साल ओढ़ने के लिए दे देते। एक बार तो मैंने बहुत कोशिश की किन्तु साल से अपने बदन को नहीं ढक सका, उस समय मैं यही सोचता था कि यह साल इतना छोटा क्यों है, आधा बदन ढकता है और आधा खुला रह जाता है। पिता जी मेरे इस असफल प्रयास को देखते रहते... फिर बड़े ही स्नेह से साल मेरे चारो ओर लटेप देते , कभी कानों को छूकर देखते,तो कभी पैरों को कि कहीं वे ठंड तो नहीं हो रहे,यदि ठंड होते तो अपने हाथ से सिकाई करते और फिर स्काप बांध देते। उस रोज भी उन्होंने यही किया था। पहले तो मुझे डर था कि कहीं वही बोझिल कहानी न सुना दें,लेकिन जब उन्होंने सुनाना शुरु किया, आह ! वह कितनी अद्भुत कहानी थी - एक बार की बात है - एक फकीर था, बहुत ही दुबला पतला। पहनावे से वह कोई दरिद्र ही दिख रहा था, फटी पुरानी,मटमैली बंडी पहने हुए महावां नगर में भिक्षा माँगने आया था। किन्तु वह भिक्षा मांगते समय बड़ी अजीब अजीब बातें कर रहा था - 'चार लात ले ले ,चार सौ रुपिया दे दे और चार बात सुन ले'। भला इस दरिद्र आदमी की यह शर्त कौन मानता? पूरे नगर में कूतूहल का विषय बन गया । लोग शोर मचाने लगे । जोर जोर से चिल्लाने लगे- इसे भगाओ,इसे भगाओ। आखिरकार राजा के सैनिक उसे अपने दरबार में ले गये। किन्तु राजा तो थे नहीं, वे शिकार पर गये हुए थे। राजकुमार महल में मौजूद थे, उनको यह बात बताई गयी। राजकुमार ने फकीर को बुलाया और सशर्त अपनी बात सुनाने के लिए कहा,किन्तु फकीर ने मना कर दिया,उसने कहा राजकुमार! मैं आपको यह बात नहीं बता सकता । राजकुमार को गुस्सा आ गया। उसने उसे डांटते हुए अपनी बात कहने के लिए कहा। फकीर को राजकुमार का डर था,भला डर के आगे कौन नहीं झुकता? उसने सशर्त राजकुमार को अपनी चार बात सुनाई,चार लात दिया और चार सौ रुपये लेकर वह चला गया। यह ख़बर आग की तरह पूरे नगर में फैल गयी। पूरे नगर में काना-फूसी होने लगी। शाम को राजा जब वापस अपने महल की ओर लौट रहा था, उसने राहगीरों को इस विषय में बातचीत करते हुए देखा। राजा को बहुत गुस्सा आया,किन्तु रास्ते में करे तो क्या करे, महल पहुंचते ही सबसे पहले उसने राजकुमार को बुलाया,तहकी़का़त की,किन्तु जब यह मालूम हुआ कि उसने फकीर से चार लात खाये हैं। राजा तुरंत राजकुमार को राज्य छोड़ने का आदेश दिया। राजकुमार बड़ा ही विनम्र स्वभाव का पितृभक्त था। पिता का आदेश पाकर वह नगर छोड़कर चला गया। अपने राज्य की सीमा खत्म होते ही उसे जंगल दिखाई दिया, घनघोर जंगल। इस जंगल को पार करते ही दूसरे राज्य की सीमा शुरु होती है। राजकुमार को फकीर की पहली बात याद आई - "राह चलंते दुई जन लीजै"। किन्तु राजकुमार तो अकेला था। उसे इस जंगल में कौन साथी मिलता? वह यह सब सोचते हुए जा रहा था कि उसे एक केकड़ा दिखाई दिया। राजकुमार ने केकड़े को पकड़कर अपनी झोली में डाल लिया। वह पूरी रात चलता रहा,दूसरे दिन दोपहर में उसे कुछ चरवाहे भेंड़-बकरियाँ चराते हुए दिखाई दिए। राजकुमार को कुछ सुकून मिला। वह एक बड़े बरगद की छांव में जाकर सुस्ताने लगा। चरवाहों ने उसे मना किया कि वह यहाँ न बैठे, उन्होंने बताया कि यहाँ बहुत विषैला साँप रहता है। किन्तु रात भर के थके-मांदे राजकुमार को यह सब कैस सुनाई देता। लेटते ही उसे नींद आ गयी। कुछ ही देर में चरवाहों की बात सच होने लगी। इस विशालकाय बरगद में एक कौआ और एक साँप रहता था,दोनों की खूब पटरी खाती थी। जब कोई राहगीर इस पेड़ लते सुस्ताने के लिए सोता, कौआ आवाज़ देता, साँप अपने कोटर से बाहर आता, उसे डस लेता और वापिस अपने बिल में घुस जाता। फिर कौआ बड़े इत्मीनान से उसे नोंच-नोंचकर खाता। इसी बहाने अन्य पक्षियों और मांसाहारी जानवरों की दावत भी हो जाती। आज भी राजकुमार के सोने के पश्चात कौआ ने आवाज दी,साँप अपने कोटर से बाहर निकला और राजकुमार को डस कर वापस चला गया। कौआ डाल से नीचे उतरा और ज्यों ही राजकुमार को चोंच मारने की कोशिश की, केकड़े ने पकड़ लिया, कौआ तेज़ तेज़ चिल्लाने लगा।यह सुनकर साँप विचार में पड़ गया कि आखिर अभी तो उसने उस राहगीर को डसा , अब कौन सी मुसीबत आन पड़ी कि कौआ इतने ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा है। वह बाहर निकला तो देखा कि कौआ को केकड़े ने बड़ी बेरहमी से पकड़ रखा है। साँप ने केकड़े से पूछा - 'हम एक ही जंगल में रहते हैं,हम दोनों मिलकर शिकार करते हैं तो आप लोग भोजन करते हैं फिर कौआ को मारने के लिए क्यों तुले हो'? केकड़े ने कहा - 'तुम दोनों ने मिलकर मेरे स्वामी का शिकार किया है,जब तक तुम मेरे स्वामी को जिंदा नहीं करोगे, मैं इसे नहीं छोडूंगा'। साँप परेशान हो गया,मारे तो खू़न नहीं । उसका मित्र भी मुसीबत में है,आखिरकार उसने अपने मित्र को बचाने का फैसला किया। साँप ने राजकुमार के शरीर से पूरा ज़हर खींच लिया। कुछ देर के बाद राजकुमार को होश आया। चरवाहों ने जब यह वृत्तान्त सुनाया, वह आश्चर्यचकित हो गया।
दोपहर ढल चुकी थी। राजकुमार भूख और प्यास से व्याकुल हो रहा था। उसने निश्चय किया कि वह किसी भी नज़दीक गांव में जाकर भोजन मांगेगा। एक घर में नहीं मिला तो वह दूसरे घर में जायेगा,उसे विश्वास था कि कहीं न कहीं भोजन उसे अवश्य मिलेगा। थोड़ी देर चलते ही उसे पगडंडी दिखाई दी। उसी पगडंडी के सहारे गाँव की तरफ बढ़ने लगा। अभी वह कुछ ही मिनट चला ही था कि उसे एक वृद्ध औरत दिखाई दी। सम्भवतः वह किसी का इंतजार कर रही थी। राजकुमार को देखते ही वह झट से बोल पड़ी- 'अरे लाला, ई हमार लकड़ी का तनि हमरे घर पहुंचाय देहो का'? राजकुमार को प्यास भी लगी थी और वह वृद्ध औरत की मदद भी करना चाह रहा था। उसने मन में सोचा कि इसी बहाने एक पंथ दुई काज हो जायेगा। राजकुमार ने लकड़ी उठाई और औरत के पीछे-पीछे उसके घर की तरफ चल दिया। तकरीबन दो सौ मीटर चलने के बाद उस औरत का घर आ गया। साफ- सुधरा और सुसज्जित घर। कोई भी व्यक्ति दूर से देखकर आकर्षित हो जाता। राजकुमार ने आँगन में लकड़ी पटकी और झट से पानी की मांग कर बैठा। वृद्ध महिला ने कहा - 'आप भलमानुष लागत हौ, तनिक बईठ जा'। (बहु को पुकारते हुए) 'अरे दुलहिन तनि क खटिया बिछाय देओ , अउर पानी पियय का ले आवो'। (राजकुमार से) - 'लागत है बहुत दूर से आए हौ,थक गये होबा ,कुछ देर आराम कई ला, फिर चले जाया'। बहु ने चारपाई पिछाई और उसके ऊपर रंगबिरंगा दसना बिछा दिया। उसने बड़े प्यार से राजकुमार को आवाज़ दी - 'आवा, ब ई ठा'। राजकुमार इस स्नेह को कैसे ठुकराते? वह बहु के कमरे में दाख़िल हुए, आह कितना सुन्दर कमरा था,रंगबिरंगे फूलों से सजा हुआ, मोहित। लेकिन यह क्या ! राजकुमार ने महसूस किया कि कदम रखते ही अजीब सी तरंगें उठ रही हैं। राजकुमार को फकीर की दूसरी बात याद आई -" आसन छार बिछौना कीजै" । राजकुमार सतर्क हो गया। उसने चारपाई पर बैठने से पहले दसने को ज्यों ही उठाया। उसके पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। उसने देखा - चारपाई के नीचे एक छोटी सुरंग, जिसमें चारपाई से गिरते ही कोई भी वस्तु आसानी से गर्म तेल से भरे कराहे में पहुंच जाती। राजकुमार को सब समझ में आ गया। उसने दसने को उसी तरह बिछा दिया। थोड़ी देर में सास और बहू कमरे में आई। राजकुमार को खड़ा देखकर बड़ी हैरानी से दोनों एक साथ बोल पड़ी - 'अब तक ब ई ठे नहीं? राजकुमार को ना आव सूझा न ताव, दोनों को चारपाई में गिराकर चला गया।
इस गांव से नगर से सटा हुआ एक गांव था,राजकुमार वहीं आकर रहने लगा। दिन भर लकडियाँ काटता और शाम को बाजार में बेचने जाता। एक दिन इस प्रांत के राजा के कुछ सैनिक उसे पकड़ने आए। राजकुमार ने बहुत पूछा कि उसने कौन सा अपराध किया है किन्तु किसी ने कुछ बताया नहीं । उसे राजदरबार में ले जाया गया। उसे लड़कहारा समझकर राजा ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार से करवाने कि बात कही किन्तु शादी से पहले उसे एक रात राजकुमारी के साथ गुजाराना था। किन्तु उसी रात उसे महल में ही रात गुजारने को कहा गया। राजकुमारी उसे अपने कमरे में ले गयी। रात बढ़ रही थी,सभी सैनिक और पहरेदार सो गये थे। राजकुमार को भी हल्की हल्की नींद आने लगी किन्तु अचानक उसे फकीर की तीसरी बात याद आई -"जागंते पावै नहीं कोई"। पिछले दो घटनाओं से अब तक फकीर की बात का प्रमाण मिल गया था। वह इसी इंतजार में था कि अब कौन विपत्ति आने वाली है। लगभग रात्रि के तीसरे पहर राजकुमार ने देखा कि एक जहरीला साँप फुफकारते हुए उसकी ओर चला आ रहा है। उसने अपनी तलवार उठाई और साँप की हत्या कर दी। कुछ देर के बाद वह स्वयं सो गया। सुबह हो गयी थी,सारे पहरेदार और सिपाही अपने अपने काम में लग गये। राजा भी स्नान-ध्यान करके अपने राजदरबार में जाने को तैयार हुआ। उसने सिपाहियों को बुलाया और राजकुमार को जो अब लड़कहारा के रुप में था, उसकी लाश को दफनाने के लिए कहा गया। किन्तु सिपाहियों ने जब यह कहा कि वह जीवित है, राजा बहुत खुश हुआ। राजकुमार को बुलाया गया। उससे पूछताछ की गयी,जब राजा को मालूम हुआ कि वह भी एक राजकुमार है तो राजा ने विवाह की धूमधाम तैयारी के लिए नगर को सजाने के लिए कहा। राजकुमार को तैयार किया गया ,पुरोहितों को बुलाया गया और राजकुमारी के साथ विवाह सम्पन्न किया गया। राजकुमार को दहेज में हाथी ,घोड़े, हीरे जवहरातऔर सैनिक दिए गये। राज्य का एक हिस्सा राजकुमार को उपहार स्वरुप दिया गया। राजकुमारी की सेवा के लिए दासियां तैयार की गयी। यह सब लेकर राजकुमार अपने वतन की ओर लौट चला। इधर राजा अपने पुत्र- वियोग की पीड़ा में डूब रहा था, उसने राज्य के तमाम हिस्सों में खोजबीन करवाई किन्तु राजकुमार का कहीं अता पता नहीं चला। आज जब यह सूचना मिली कि अमुक देस के सैनिक उसके राज्य की ओर बढ़ रहे हैं। उसने मंत्री परिषद की बैठक बुलाई और युद्ध के नीतियों और नियमों पर विचार हुआ। आखिरकार सभा ने यह स्वीकार किया गया युद्ध की तैयारी की जाये ,अमुक देस के सैनिक को किसी भी कीमत में राज्य की सीमा न लांघने पाये। उधर राजकुमार राजकुमारी के साथ अपने देश के सीमा तक पहुंच गया, उसने दूर से आती हुई सैनिकों की झुंड को भांप कर अशुभ के विचार दुखी होने लगा। राजकुमार के सैनिक भी युद्ध के लिए तैयार हो गये। दोनों के बीच फासला बहुत कम रह गया था ..राजकुमार को तभी फकीर की चौथी बात सूझी - " रिसीमारे दूना फल होई" । राजकुमार अपने रथ से उतर गया। वह पैदल अपने पिता के सैनिकों की ओर बढ़ने लगा। दूर से अपने पुत्र को आते हुए देखकर राजा ने सैनिकों अस्त्र शस्त्र नीचे रख देने के लिए कहा और स्वयं नीचे उतरकर पुत्र की ओर चलने लगा। पिता की ओर आत हुआ देखकर राजकुमार दौड़कर पिता के चरण में गिर पड़ा। राजा ने उसे उठाकर गले लगा लिया और देर तक उसे चूमता रहा.......
ओह , यह सोचते हुए मैं कितनी दूर चला आया हूं। दिल्ली की इस सर्द हवा में आज मैं अकेला हूं,नितांत अकेला। न पास में पिता जी हैं और न मां। कई बार मन करता है कि जाकर उन्हें जीभर देखूं ,उनसे बातें करुं ,अपनी कुछ बातें उन्हें सुनाऊं। किन्तु उन्हें मैं क्या जवाब दूंगा। कभी कभी प्रियजनों के सवालों के जवाब हमारे पास नहीं होते। वे आंखें अब वृद्ध हो रही हैं,उनके सवाल अब गहराई में नहीं छिपते, काजल की रेख की तरह आँखों के किनारे - किनारे आ खड़े होते हैं। अरे मैं किधर जा रहा हूं,इधर तो मेरा कमरा नहीं है...
© सुशील द्विवेदी
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