शौक ए दीदार है तो नज़र पैदा कर : "डिजिटल फोटोग्राफी
( लेखक आत्मानन्द कश्यप सुपरिचित फोटोग्राफर और स्तम्भकार हैं)
आत्मानंद कश्यप फोटोग्राफी की एक ऐसी विधा जिसमे बहुत सारे इलेक्ट्रॉनिक फोटोडिटेक्टेर्स वाले कैमरे का प्रयोग लेंस द्वारा निर्दिष्ट की गयी वस्तु का फोटो बनाने के लिए करते हैं,यह फोटोग्राफिक फ़िल्म पर किसी वस्तु की अनावृत्ति से एकदम भिन्न है। इसके द्वारा खींची गयी फोटो को डिजिटल फॉर्म में किसी भी कंप्यूटर फाइल के रूप में रखा जा सकता है।
इस फाइल का उपयोग हम डिजिटल प्रोसेसिंग, डिजिटल पब्लिसिंग, फोटो को देखने अथवा उसका प्रिंट आउट निकालने के लिए कर सकते हैं।
दुनिया में आम उपभोक्ता के प्रयोग वाला पहला डिजिटल कैमरा सन 1990 में बाजार में उपलब्ध हुआ, पेशेवर तौर पर फोटोग्राफी करने वाले लोग जल्द ही इसके प्रति आकर्षित होने लगे क्योंकि डिजिटल फाइल्स के माध्यम से वे अपने ग्राहकों और नियोक्ताओं को पारंपरिक फोटोग्राफी की तुलना में अधिक शीघ्रता से बेहतर परिणाम प्रदान कर सकते थे। सन 2007 के बाद से स्मार्ट्फोन में भी डिजिटल कैमरा लगाया जाने लगा और आने वाले समय में सोसल मीडिया, ई मेल और वेबसाइट मे आसानी से उपयोग की जा सकने वाली तस्वीरों के कारण डिजिटल कैमरे वाले स्मार्ट्फोन का व्यापक प्रसार हो पाया। सन 2010 के बाद डिजिटल पॉइंट- एंड -शूट और डी एस एल आर फ़ॉर्मेट वाले कैमरों को भी मिररलेस डिजिटल कैमरा से प्रतिद्वंद्विता करनी पड़ रही है।
डिजिटल कैमरे के निर्माण का पहला प्रयास सन 1975 में ईस्टमॅन कोडक के अभियंता स्टीवन सॅसन द्वारा किया गया था। उन्होने फेर्चाइल्ड सेमिकंडक्टर द्वारा 1973 में विकसित किए गये सॉलिड-स्टेट सी. डी. डी. (चार्ज-कपल्ड डिवाइस, एक उच्च-गति वाला सेमिकंडक्टर) इमेज सेन्सर चिप्स का प्रयोग किया। अपने पहले प्रयास मे इस 8 पाउंड्स (3.6किलो ग्राम) वजन वाले कैमरे ने दिसंबर 1975 मे 23 सेकंड के समय में 0.01 मेगापिक्सेल (10000 पिक्सेल) रिज़ोल्यूशन वाली श्वेत-श्याम तस्वीर को एक कैसेट टेप पर रेकॉर्ड किया,यह प्रोटोटाइप कैमरा सिर्फ़ तकनीकी प्रयोग के लिए था और इसका कोई भी व्यापारिक उत्पादन नही किया गया।
पहला वास्तविक डिजिटल कैमेरा,जिसने तस्वीर को कंप्यूटर फाइल के रूप मे रेकॉर्ड किया 1988 मे बना फूजी डी. एस. -1 पी था. इसने एक 16 एम बी के बैटरी से चलने वाले मेमोरी कार्ड पर तस्वीर को डेटा के रूप मे सरंक्षित किया। इस कैमेरा को कभी भी अंतराष्ट्रीय रूप से बेचा नही गया और इसके जापान से बाहर ले जाए जाने की भी कोई प्रमाण नही मिलते।
व्यावसायिक रूप से उपलब्ध पहला डिजिटल कैमरा 1990 मे बना डयकाम मॉडेल 1 था। इसे लौजिटेक फोटोमैन के नाम से भी जाना जाता है. इसमे एक सी. सी डी. इमेज सेन्सर का उपयोग किया गया और इसने तस्वीरों को डिजिटली स्टोर किया. इस कैमेरा को इमेज डाउनलोड करने के लिए सीधे कंप्यूटर से भी जोड़ा जा सकता था.
फोटोग्राफी में आपको जो भी करना है प्रकाश यानी लाइट की मदद से करना है। चित्रकार अपनी चित्रकारी ‘रोशनी में’ करता है, लेकिन फोटोग्राफर अपनी चित्रकारी ‘रोशनी से‘ करता है। फोटोग्राफी में रोशनी एक रॉ-मटीरियल (कच्चा माल) की तरह है जिसका इस्तेमाल कर फोटो बनाई जाती है। इस तरह फोटोग्राफी रोशनी के उपयोग की कला है। आप लाइट यूज करने का स्किल जितना विकसित करेंगे आपकी फोटोग्राफी उतनी विकसित होगी। आप उतने ही बेहतर फोटोग्राफर होंगे।
आम तौर पर एक नया फोटोग्राफर यही सोचता है कि बढ़िया फोटो वह है जो शार्प हो और जिसमें भरपूर डीटेल्स हों। लेकिन नहीं, सही मायने में एक बढ़िया फोटो वह होती है जो देखने वाले के ऊपर प्रभावी असर पैदा करती है। ‘फोटोग्राफी क्या है’ इस सवाल के जवाब में हमारा मानना है कि फोटोग्राफी केवल किसी वस्तु का हू-ब-हू चित्र खींच लेना नहीं है, बल्कि यह एक मीडियम (माध्यम) है जिसके जरिए अपनी बात कही जा सकती है, अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया जा सकता है; वस्तु, व्यक्ति या दृश्य के सौंदर्य को दर्ज किया जा सकता है और किसी परिस्थिति या घटना के सच को दुनिया के सामने लाया जा सकता है। इस तरह, फोटोग्राफी एक आर्ट-फॉर्म है, एक कला है, एक मीडियम।
फोटोग्राफी क्या है’ इसे समझने के लिए कुछ मौलिक बातों को समझना जरूरी है। किसी भी अन्य आर्ट-फॉर्म की तुलना में फोटोग्राफी में ‘देखने’ (Observation) का महत्व सबसे अधिक है। चीजें जैसी सामान्य तौर पर दिखती हैं हू-बू-हू उन्हें वैसा ही दिखाने में कुछ भी अनोखा नहीं है, क्योंकि वैसा तो हर कोई देख सकता है। असल महत्व है चीजों को उस नजरिए से देखना जिससे उनके अर्थ खुलते हों। अमेरिकी फोटोग्राफर बेरेनिस अबोट मानती थींं कि ‘फोटोग्राफी लोगों को देखने में मदद करती है’, यानी देखना सिखाती है। इस लिहाज से फोटोग्राफी ‘देखने की कला’ (Art of Seeing) है।
इसमें सफल फोटोग्राफर वही है जो चीजों को केवल प्रेक्षक (Observer) के नजरिए से नहीं बल्कि एक कलाकार के नजरिए से भी देखे। यही है फोटोग्राफी का सार-तत्व। इसलिए एक कलाकार बेहद साधारण कैमरे से भी बेहतरीन तस्वीर का निर्माण कर सकता है जबकि एक सामान्य फोटोग्राफर तस्वीर के शार्पनेस, चमक, लाइट और डीटेल्स में ही उलझा रह जाता है। इसलिए एक बढ़िया और सार्थक फोटोग्राफर बनने के लिए चित्रकला का अध्ययन करना चाहिए। उसके सिद्धांतों को समझना चाहिए और कलाकार वाली नजर पैदा करनी चाहिए।
आम तौर पर लोग यह समझते हैं कि बढ़िया महंगे कैमरा और लेंस से ली गई साफ-सुथरी चमचमाती हाई क्वालिटी फोटो बेहतरीन फोटोग्राफी का नमूना होती है। लेकिन बात दरअसल ऐसी नहीं है। टेक्निकली फोटो कितनी भी हाई क्वालिटी की हो लेकिन उसमें यदि व्यूअर के लिए कोई संदेश ही न हो तो सब बेकार है। फोटो में सब्जेक्ट का महत्व होता है। फोटो की सुंदरता, बढ़िया एक्सपोजर, लाइट, चमक और डीटेल्स ये सारी बातें बाद में आती हैं। अपनी तस्वीर के जरिए आप क्या दिखा रहे हैं यह महत्वपूर्ण होता है।
साधारण कैमरे, यहां तक कि साधारण स्मार्ट फोन से भी ली गई तस्वीर धूम मचा सकती है यदि उसका आधार कोई दमदार सार्थक सब्जेक्ट हो या जिसके पीछे कोई मजबूत कहानी हो, या कोई ऐसा भाव या कोई ऐसा सौंदर्य जो देखने वाले के मन को छू ले। तस्वीर ऐसी होनी चाहिए जिसमें कोई स्टोरी हो, या जिसे देखकर व्यूअर को भावनात्मक अनुभूति मिले, या कुछ ऐसा जो जीवन के किसी अनदेखे पक्ष को उजागर करता हो।
फोटोग्राफी आत्मानंद कश्यप
फोटोग्राफी को औजार बनाकर ऐसा बहुत कुछ किया जा सकता है जिससे दर्शक को जीवन और जगत से जुड़ने की प्रेरणा मिले। फोटोग्राफी के जरिए सामाज और पर्यावरण की समस्या की तरफ लोगों का ध्यान खींचा जा सकता है। फोटोग्राफी के जरिए व्यक्ति और समाज के जीवन में बदलाव लाया जा सकता है, सार्थक संदेश दिया जा सकता है, और यह फोटोग्राफी की सबसे बड़ी ताकत भी है।
© आत्मानन्द कश्यप


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