कुछ सवाल,कुछ जवाब
(मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार से सम्मानित युवा कवि- उपन्यासकार तेज प्रताप नारायण से सुशील द्विवेदी की बातचीत । )
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| तेजप्रताप नारायण |
सवाल: कविता के सन्दर्भ में आपकी क्या राय है?
जवाब : कविता को मैं मानव मन की अभिव्यक्ति मानता हूँ जो व्यक्तिगत और सामाजिक संवेदनाओं का प्रतिफलन होती है ।इस लिए कविता स्वान्तः सुखाय भी हो सकती है और समाजोन्मुखी भी। कवि का परिवेश, तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक ,भौगोलिक ,आर्थिक और वैश्विक परिस्थितियों का भी कविता के कथ्य पर प्रभाव होता है ।कविता का शिल्प कवि का स्वयं का बुना होना चाहिए । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कविता में अवास्तविक शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए । आजकल बहुत सारे कवि विज्ञान परक कविताएँ भी लिख रहे हैं ।विज्ञान के कई सारे शब्द जैसे बिग बैंग ,गैलेक्सी आदि का कविता में बिम्ब के रुप में प्रयोग हो रहा है जिससे कविता में वस्तुपरकता बढ़ी है । कविता का विस्तार हुआ है । सोशल मीडिया के आने से भी कविता जन जन तक पहुंच रही है ।समाज का कमज़ोर तबका भी कविता के माध्यम से अपनी आवाज़ समाज तक पहुंचा रहा है ।कविता केवल समाज का आईना ही नहीं बन रही है वरन समाज को दिशा भी दे रही है ।सच पूछिए तो आज की कविता डेमोक्रेटाइज़ हुई है ।कविता या किसी भी विधा पर मठाधीशी नहीं चलने वाली ।वह दिन गए जब लेखक प्रकाशकों का मुँह देखता था ।अब कविता को वैश्विक प्लेटफॉर्म मिल रहा है । कविता जन और जीवन से बेहतर तरीके से जुड़ रही है जो साहित्य की समृद्धि के लिए अच्छा संकेत है।
सवाल: सामाजिक तनाव और काव्य तनाव को आप किस प्रकार देखते हैं? क्या सामाजिक तनाव कविता का तनाव हो सकता है?
जवाब: सूचना क्रांति के साथ सोशल मीडिया के आने से सूचना को ऐसा टूल मिल गया कि सूचनाओं को आप छिपा नहीं सकते है ।हालाँकि कई बार अफ़वाह भी सूचना के रूप में परोसी जाने लगी जिससे बचना ज़रुरी है । अब जब हर किसी को सही सूचना उपलब्ध होती है जो ऐतिहासिक ,भाषाई और सामाजिक सांस्कृतिक तथ्यों को रद्द कर रही हो तो सामाजिक तनाव अवश्यम्भावी होगा ।समाज का उपेक्षित तबका अपने अधिकारों के लिए लामबंद हो रहा हो लेकिन हठधर्मी शोषक वर्ग नाग की तरह कुंडली मारे बैठा हो तब सामाजिक तनाव होगा और यह सामाजिक तनाव कविता के भीतर अवश्य पैदा होगा ।
इसके अतिरिक्त कवि के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन का तनाव भी कविता में व्यक्त होता है ।
मेरा कहने का मतलब है कविता में तनाव तो होगा ही चाहे वह व्यक्तिगत तनाव हो या सामाजिक तनाव या दोनों का मिश्रण ।
और तनाव ही क्यों जब कवि का मन प्रफुल्लित होता है ,जब मन मयूर नाचने लगता है,तब कवि की कविता भी प्रफ्फुलित करने वाली होती है ।यह कारण कार्य प्रभाव सदृश है जो कविता में परिलक्षित होता होता है ।
कविता या अन्य कोई विधा में मानसिक और सामाजिक तनाव सिर्फ़ व्यक्त ही नहीं होता है बल्कि लेखन की प्रक्रिया में यह तनाव बहुत हद तक कम भी होता है जिसे कैथेरसिस भी कहा जाता है ।जब आप अपनी बात की अभिव्यक्ति दे पाते हैं तो दो बातें एक साथ होती हैं ।एक तो आप कुछ रच रहे होते हैं और दूसरा you are venting out your feelings ..आप खाली होते जाते हैं ।ज़िन्दगी में आप का फोकस बढ़ता जाता है ।आप एक बेहतर इंसान बन पाते हैं ।
आप संतुष्ट भी महसूस करते हैं कि आपने आप कर्म किया और अपनी बात समाज मे रख दी जो आपका लोकतांत्रिक कर्तव्य भी है । मतलब रचनात्मक कर्म एक लोकतांत्रिक कर्तव्य भी हो जाता है ।
ऊपर की चर्चा से हम यह पाते हैं काव्य में सामाजिक तनाव अभिव्यक्ति पाता है और संवाद का माध्यम बनता है ।कवि अपनी बात शासन,सत्ता तक पहुंचा सकता है और अपने मानसिक तनाव को कम भी कर सकता है । विपरीत परिस्थितियों में कविता एक संतुलन बनाने में भी मदद करती है ।आप जो महसूस करते हैं उसे अभिव्यक्ति देकर आप खाली हो जाते हैं ।इस लिहाज से कविता लिखना मुक्ति का एहसास भी है ।
रचना प्रक्रिया एक जटिल प्रकार होती है जो कवि को सरल बनाती है ।
सवाल : कविता के लिए 'कवि की ईमानदारी' को आप कितना मूल्यवान मानते हैं?
जवाब : ईमानदारी कविता के लिए नहीं जीवन के हर पहलू के लिए ज़रूरी होती है । वैसे ईमानदारी के अलग अलग पैमाने हैं,लेकिन यदि कवि ,कविता लिखते अपनी रचनाधर्मिता के प्रति ईमानदार नहीं होगा ।मेरा तो मानना है कि कवि को अपना रास्ता ख़ुद बनाना चाहिए ।कविता कहने का अपना ढंग विकसित करना चाहिए ,लेकिन इसके लिए बहुत धैर्य की ज़रूरत होती है जो धैर्य कई बार आज कल की भागती ज़िन्दगी में कम पाया जाता है । कई सारे अच्छे रचनाकार भी इंस्टेंट फेम पाने के चक्कर में रहते हैं जिसके लिए किसी प्रसिद्धि कविता को तोड़ मरोड़कर लिखने से बाज़ नहीं आते हैं या ऐसा कुछ लिखते हैं जो बहुत सनसनीखेज हो ।अगर इन सबसे भी काम नहीं चला तो प्रायोजित समीक्षाएँ ,चर्चाएँ करवाने से भी बाज नहीं आते हैं । इसमें रचनाकार थोड़ा चर्चित हो सकता है लेकिन उसका कविकर्म घुटने लगता है ।
एक बात और यह भी है कि मैं इसमें कवि की ही ग़लती नहीं मानता ।हिंदी साहित्य में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जो नए लोगों को देखे,उन्हें नोटिस करे और उनको आगे लाए ।यहाँ तो इतनी गुटबाज़िया हैं कि एक गुट अपने से इतर गुट के किसी कवि या लेखक पर ध्यान देना अपनी तौहीन समझता है ।इन सबमें लेखक का नुकसान जो है सो है लेकिन साहित्य का उससे अधिक नुकसान होता है ।इस प्रक्रिया में कवि की ईमानदारी मारी जाती है । मेरे लिए ईमादारी का एक पैमाना यह भी है कि मैं जो लिखता हूँ उसको जीने का प्रयास भी करता हूँ । कहने का मतलब मैं यदि लिखूं कि मानव मात्र की गरिमा स्थापित हो तो मैं अपने मन,वचन और कर्म से ऐसा करने का प्रयास ज़रूर करूँ ।व्यक्तित्व का दोहरापन होगा तो कविता के साथ न्याय नहीं होगा, ऐसा मेरा मानना है ।
बस इसमें थोड़ी सी दिक़्क़त है मेरे लिए जो ईमानदारी का आदर्श है वह मैं औरों पर कितना आरोपित कर सकता हूँ ।
सवाल: इस दशक में कविता अपने पुराने मूल्यों को छोड़कर नये मूल्य ग्रहण कर रही है। हालांकि यह हमेशा से होता आया है। आपके लिए इस दशक में कौन सा मूल्य परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ है।
आज की कविता में जनपक्षधरता बढ़ी है ।समाज के हर तबके की भागीदारी हो रही है जो हिन्दी कविता के लिए अच्छा संकेत है ।सोशल मीडिया की वजह से भाषा ,शिल्प और कथ्य हर स्तर पर कविता समृद्धि हुई ।सबसे बड़ी बात है कविता अपने क्लासिकल शिल्प के चंगुल से बाहर निकलने में समर्थ हुई । सोशल मीडिया का ही कमाल है कि जापान की हाइकू विधा में बहुत सारे कवि लिख रहे हैं ।पंजाबी लोक विधा जैसे माहिया को उत्तर प्रदेश का कवि लिख रहा है । यह कविता के लिए बहुत शुभ संकेत है ।कविता संकुचित न होकर फैल रही है ।छंद मुक्त,मुक्तछंद,छंद बद्ध जैसे अलग अलग शिल्प में कविताएँ लिखी जा रही हैं ।बड़ी कविताएँ लिखी जा रहीं हैं तो दो पंक्तियों की कविताएँ भी ,जो अर्थ के स्तर पर अधिक व्यंजनात्मक हैं ।
सवाल : कुछ रचनाकारों के लिए यह समय नव रीतिवाद का है, आप इसे कैसे देखते हैं?
जवाब : एक समय में कई सारी धाराएँ होती हैं लेकिन सब कविता का भाग ही होती हैं । यह सही भी है ।अब आप सबको नहीं कह सकते हैं कि आप समाज की समस्याएं लिखिए या प्रेम कविताएँ लिखिए ।हर कोई हर प्रकार की कविता नहीं लिख सकता है । किसी को ऐसा करने के लिए कहना भी नहीं चाहिए यही तो कविता का लोकतंत्र होगा जो कुछ ज़रूरी बंधनों के साथ सबको लिखने की आज़ादी देगा ।
इस तर्क को आगे बढ़ाने से हिंदी साहित्य का वर्गीकरण ही अतार्किक हो जाता है । कोई धारा मुख्य या गौण हो सकती है लेकिन जब आप मुख्य धारा को ही युग कह देते हैं तो थोड़ी गड़बड़ हो जाती है । हिंदी आलोचकों और विश्वविद्यालयों में हिंदी के आचार्यों को थोड़ा खुला दृष्टिकोण रखने की ज़रूरत है ।हिंदी का संसार बहुत बड़ा है ।आपने तो सिर्फ़ उसके एक छोटे से हिस्से को ही हिंदी साहित्य कहा है ।

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