कुछ रंग , कुछ कविताएँ

(युवा कवयित्री फाल्गुनी शर्मा की कविताएँ )

 

(कविता -१)

पूस में बिछी बर्फ़ की चादरों पर,

ज्येष्ठ की गर्म तपती सड़क पर,

आषाढ़ की बारिश के जलजले में,

कार्तिक के प्रसन्न महीने में भी,

वह दौड़ती है!

तन ढकने को,

पेट की आग बुझाने,

सर छिपाने,

चार पैसे कमाने,

बिना रुके,बिना थके,

करती है संघर्ष,

मुफलिसी मिटा के,

दो पल मुस्कुराने को,

वह दौड़ती है कि

रह न जाये मासूमियत परे 

फाल्गुनी शर्मा 
शहर की चकाचौंध से                                   

बह न जाये सपने नादान आंखों के,

जो देखे गए थे अंगीठी की आंच में।

कहीं बहक न जाये कदम नन्हीं ख़्वाहिशों के,

जो सँजोये थे पेट में पांव की उस पहली आहट से।

(कविता -२)

कल रात बहुत दिनों के बाद!

मेरी खिड़की पर,

फिर एक बार अधूरा चाँद आया,

जिसमें तुम्हारी पूरी तस्वीर बनी थी।

चाँद की चमक आज भी,

वैसी ही थी!

जिसे देख तुम ख़ुश होते थे।

कल रात भी मैं,

चाँद को खिड़की के उसी,

आख़िरी किनारे से लग कर देख रही थी,

जिसके सहारे तुम खड़े होते थे।

कल रात भी चाँद के पास,

वही दो तारे टिमटिमा रहे थे,

जिन्हें तुमने कभी मेरी उंगलियों से गिना था।

आसमां में उतनी ही घटा छायी थी,

जितनी तुम्हारे जाने के बाद,

मेरे जीवन में छा गई थी।

चाँद कल भी उतना ही अधूरा था,

जितना तब लग रहा था,

जिस रात तुमने मुझे अधूरा किया था।

(कविता -३)

क्या?

तुम्हें प्रेम है उससे

सच में...?

कभी ठहर कर दो पल।

आंखों को पढ़ा तुमने उसकी?

बाहरी खूबसूरती पर मरते हो ना,

अंदर से मन को टटोला कभी।

तुम्हारी इजाज़तों की मोहताज रहीं वो

पर क्या तुमने उसकी इजाज़त मांगी कभी?

नज़रें वो झुकाती रहीं

पर क्या,

तुमने सर को उठाया कभी?

तुम्हारी हरेक मुस्कान को अपनाती रहीं।

तुमने उसे थोड़ा भी हँसाया कभी?

(कविता -४)

कल रात बहुत दिनों के बाद!

मेरी खिड़की पर,

फिर एक बार अधूरा चाँद आया,

जिसमें तुम्हारी पूरी तस्वीर बनी थी।

चाँद की चमक आज भी,

वैसी ही थी!

जिसे देख तुम ख़ुश होते थे।

कल रात भी मैं,

चाँद को खिड़की के उसी,

आख़िरी किनारे से लग कर देख रही थी,

जिसके सहारे तुम खड़े होते थे।

कल रात भी चाँद के पास,

वही दो तारे टिमटिमा रहे थे,

जिन्हें तुमने कभी मेरी उंगलियों से गिना था।

आसमां में उतनी ही घटा छायी थी,

जितनी तुम्हारे जाने के बाद,

मेरे जीवन में छा गई थी।

चाँद कल भी उतना ही अधूरा था,

जितना तब लग रहा था,

जिस रात तुमने मुझे अधूरा किया था।

(कविता-५)

काश!

तुमने उन आंखों को पहचाना होता,

जिनमें तुम्हें दिखता तुम्हारे लिए प्रेम,

तुम्हें दिखता उनमें तुम्हारे लिए इंतज़ार,

दिखता तुम्हारे होकर भी न होने का एहसास।

तुमने मन की आंखों को,

तन की आंखें समझ ली हैं,

और अधरों के नीचे,

गले के बाद,

उन दो भूरी आँखों को गले लगाया।

तुम्हें  कजरारी  आंखों का नहीं

उन दो उभरी भूरी आंखों का दबना पसन्द आया,

जिन्हें देख तुम बेकाबू हो उठते थे।

तुम्हें उन अधरों की हंसी नहीं,

उन्हें नोच लेना पसन्द था,

उसकी अठखेलियां नहीं,

उस दर्द से प्यार था,

जो हर रात तुम उसे दिया करते थे।

हर रात वह लड़ती थी

एक लड़ाई....

खुद से,

तुम से,

अपने आत्म सम्मान से,

इस समाज से,

उसकी देह से,

और

उन उभरे हिस्सों के भीतर दबी एक रूह से।

तुम्हारी उन तनी हुई मूछों से,

बाईं हथेली के उस भूरे तिल से,

जो बना है तुम्हें जोड़े रखने वाली उंगली पर,

जिसकी अंगूठी उतार देते थे तुम,

हर उस रात,

जब तुम उसके करीब होते थे।

आज जब मूंद ली हैं,

आँखें उस सुडौलता ने,

खो गई है चमक उस आईने की

जिसकी आभा तुम्हें उस ओर ले जाती थी।

क्या अब भी?

करोगे तुम याद उसे उन्हीं उभरी हुई गोलाइयों से,

या करोगे प्यार उस तस्वीर की मुस्कान से,

जिसे संजोने के लिए,

उसने लगाई थी जान अपनी दाव पर।

© फाल्गुनी शर्मा


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