लाल बत्ती तथा अन्य कविताएं
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| दामिनी यादव |
(युवा कवयित्री दामिनी यादव की कविताएँ)
1. मांग और पूर्ति
धूप बहुत तेज़ है
और मैं पसीने से तर ब तर,
गला सूखा हुआ है, चेहरा भीगा हुआ
दौड़ाती हूं कुछ पाने-तलाशने को नज़र इधर-उधर,
एक छोटा सा जामुनी रंगत वाला लड़का
बैठा बेच रहा है जामुन
इस तपती तारकोल वाली सड़क के किनारे
कुछ पानी की बोतलें नज़दीक रखे डिब्बे के ऊपर रखी हैं
कुछ टिश्यूज़ के बॉक्सेज़ से उसकी दुकान
प्रासंगिक और समसामयिक बन पड़ी है,
मैं मौसम के साथ उसकी दुकान के तालमेल पर
मन ही मन मुस्कुराती हूं,
इस वक्त की सारी ज़रूरी चीज़ें एकसाथ देख
राहत भी पाती हूं,
फिर ‘कई चीज़ें ले रही हूं’ कहकर
‘सही भाव’ लगवाती हूं और
सारी चीज़ों पर पांच रुपये कम करने के फैसले के साथ ही
मैं अघोषित विजेता हो जाती हूं।
ठंडा पानी, टिश्यू और जामुन थामकर
जैसे ही पैर आगे को बढ़ाती हूं
उस लड़के को अपने दिए पैसे सिर-माथे लगाकर
फिर जेब में रखते देख ठिठक जाती हूं,
पूछने पर कहता है,
‘दीदी, आप बहुत अच्छी हो,
पहली बोहनी ही आपसे की है
सारी चीज़ें शाम तक बिक जाएंगी
ये उम्मीद बड़ी है।’
पता नहीं मेरी चतुराई बड़ी थी
या उम्मीदों में छिपा उसका सवाल ही बड़ा है।
मेरे भीतर के पांच रुपये का विजेता ज़मीन पर पड़ा है,
ओ सूरज, तू कितने जलते हुए पेटों के लिए,
कितनी ही ऐसी नन्ही जलती ज़िम्मेदार पीठों के लिए
जुटती रोटियों का तवा भी है,
इन जामुनी चेहरों वालों का तू टिश्यू भी है,
तू ही इनका जख़्म और तू ही दवा भी है।
ओ सूरज, तेरी आग में कितनी ठंडक छिपी है,
जिनमें आज इन भूखे पेटों की राहत भरी है।
2. लाल बत्ती
सुनो सेठजी,
लाल बत्ती पर खड़ी मैं वही भिखारिन हूं,
जिसकी फैली हथेली पर तुम्हारी दयालुता
कुछ सिक्के या नोट थमा जाती है,
और हे पुण्यात्मा,
एहसास है मुझे कि क्यों तुम्हारी हथेली
छिप कर मेरी हथेली को दबाती है,
इस गुप्तदान की रसीद तुम्हें
गुप्त तरीके से ही चाहिए न,
कुछ ऐसा ही उन पलों में
लपलपाती सी लपटों सरीखी भूख
तुम्हारी आंखों में नज़र आती है,
तुम साफ़-सुथरे, गाड़ी में बैठे साहब,
क्या मेरे शरीर का मटमैलापन और गंदगी
उस समय तुम्हें नज़र नहीं आती है,
कैसे कर लेते हो तुम ये परीक्षण की,
मेरे पहने चिथड़ों से भी तुम्हारी नज़र,
मेरे शरीर के ओर-छोर को बींध जाती है,
मेरे स्तनों में दिखते हैं तुम्हें
भींचने-झिंझोड़ने भर को दो मांस के लोथड़े,
क्यों उनमें तुम्हें मेरे बच्चे की
भूख नज़र नहीं आती है,
मैं भिखारिन तुम्हारे शहर की समृद्धि-वैभव पर
एक अवांछित कलंक सरीखी हूं,
फिर भी मेरी जांघों के बीच गिरने को
तुम्हारी घिनौनी तृष्णा कितनी बिलबिलाती है,
इस लालबत्ती पर मेरी स्थिति तो
सिर्फ़ मेरी भूख से बिलबिलाती है,
मगर मेरी ख़ामोश मजबूरी को
बिन कहे समझ जाती है ये लालबत्ती
और तुरंत हरी होकर
तुम्हें आगे भाग लेने को उंगली दिखाती है,
ओ गाड़ी वाले सेठजी
आगे फूट लेने से पहले सुनिए,
मेरी चिथड़ों से ढकने की कोशिश में लिपटी
फिर भी अधनंगी सी होती ये देह
मुझे मेरी नहीं,
तुम्हें तुम्हारी नंगी सफ़ेदपोशी की औक़ात बताती है...
3. बिकाऊ तिरंगे
ख़रीद लो
ख़रीद लो कि बिक रहे हैं तिरंगे चौराहों पर
कुछ मासूमों के काले-गंदे-खुरदुरे हाथों में,
शायद उन तिरंगों से तुम्हें
अपनी गाड़ी या दफ़्तर सजाना हो,
शायद बिके तिरंगों की कीमत से उन्हें
उस दिन अपने घर का चूल्हा जलाना हो,
ख़रीद लो तिरंगे
कि तिरंगे बेचने वालों में शायद
कई ऐसे हाथ भी शामिल हों
जो व्यवस्था से लड़कर आगे तो आए
मगर इस व्यवस्था की व्यवस्था से
खुद को बचा नहीं पाए
इनकी कामयाबी पर तो
सीना ठोककर हिंद भी नाज़ करता है
मगर सड़क किनारे जनमते और मरते इन बदनसीबों को
अक्सर कफ़न तक नहीं मिलता है, इसलिए
ख़रीद लो तिरंगे इनसे
कि तुम इन्हें तो क्या बचा पाओगे
इनका मुकद्दर तो क्या बदल पाओगे,
बस इनकी एक सर्द शाम को भूखा रहने से बचा लो
कीमत चुका दो आज इन तिरंगों की और
खुरदुरे हाथों से ख़रीदे इन रेशमी तिरंगों को
शान से आसमान में फहरा लो.
4. चांद और सूरज
गांव की कच्ची सड़क पर
पसरता यह पक्कापन
सुना है विकास के सूरज तक
जाता है।
इसी बनती सड़क के किनारे
कूटे हुए पत्थरों की ढेरी पर लेटा
गुदड़ी में लिपटा एक ‘चांद’
खिलखिलाता है।
सामने पत्थर तोड़ने में लगी
वो बच्ची ही
इस बच्चे की मां है,
शायद वो इसकी ममता ही है
जो धरातल की कठोरता पर
मुलायमियत बन पसरी हुई है
जभी तो तपती दोपहरी में भी
बच्चे के चेहरे पर
हंसी बिखरी हुई है।
बच्चे को सीधे धूप से बचाने को
एक चिथड़ा हवा में तिरछा टंगा हुआ है,
उसके एक पैबंद से बीच-बीच में
सूरज झिलमिला जाता है,
बच्चा समझ रहा है उसे भी
कोई खिलौना और
हाथ-पांव झटकता-पटकता
उसे पकड़ में आने को
हुलसकर पुकारता है।
यह बनता रास्ता तो
कहीं-न-कहीं पहुंच ही जाएगा,
पर मुझे नहीं मालूम
पत्थरों से अटी,
जमीन पर पड़ी
इस मासूमियत की पकड़ में
कभी विकास का कोई सूरज आ पाएगा?
5. भगवान का रचयिता
सड़क के किनारे
कड़ी धूप में बैठा वो
चला रहा है लगातारछैनी-हथौड़ा
उन प्रहारों से पत्थर बदल रहे हैं आकार में
कई भगवान भी बने बैठे हैं
कई सिल-बट्टा भी
भगवान का रहम उसे रोटी खिलावाएगा
और रोटी के लिए चटनीसिल-बट्टा बनाएगा
इस खुराक से मिलेगीजो ताकत उसको
उससे वो फिर छैनी-हथौड़ा उठाएगा
फिर से रचेगा कुछ भगवान
और कुछ सिल-बट्टे बनाएगा
और इसी तरह से रचना और रचनाकार के बीच
मांग और पूर्ति का एक सिलसिला बन जाएगा
-दामिनी यादव


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