मानवीय संवेदना और उदय प्रकाश की कहानियां
(लेखक विवेक पाण्डेय अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैं। आप उनसे vpandeyonline1@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)
![]() |
| विवेक पाण्डेय |
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । प्रकृति में विद्यमान प्रत्येक जीव, जंतु, वनस्पति आपस में श्रृंखलाबद्ध रूप से जुड़ें हुए हैं इसलिए मनुष्य का मनुष्य एवं प्रकृति के प्रति जुड़ाव ही उनके सह-अस्तित्व का बोध कराता है । उनकी इसी पूरकता के कारण उनके बीच संवेदना का होना स्वाभाविक होता है । मानव अपने जीवन को आसान बनाने के लिए लगातार प्रगति करता रहता है उसकी इसी प्रगति में अगर किसी का सर्वाधिक ह्रास हुआ है तो वह है मानवीय संवेदना । विकास की अंधी दौड़-दौड़ता इंसान शायद यह भूलता जा रहा कि वह इंसान भी है क्योंकि उसकी इंसानियत का पतन हो रहा है । कुछेक को छोड़कर सामान्यतः यह देखा जाता है कि व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि में समाज इस तरह मशगूल हो गया है; उसे किसी का अहित दिखाई ही नहीं देता । इंद्रिय सुख के लिए प्रकृति का अन्धाधुंध दोहन तो करता ही है साथ ही व्यक्ति के साथ भी अमानवीयता का व्यवहार करता है । प्रायः यह देखा जाता है कि जिनका प्रकृति के साथ जुड़ाव अधिक रहा है, वे ज्यादा संवेदनशील होते है । ग्रामीण लोगों का शहरी लोगों के अपेक्षा प्रकृति से लगाव अत्यधिक होता है, जिनके कारण उनकी संवेदनशीलता महानगरीय लोगों की तुलना में अधिक होती है ।
साहित्यकार की संवेदना उसकी चेतनता मानी जाती है । “संवेदना का सम्बन्ध मन, ज्ञान एवं अनुभूति से होता है । सुख, संवेदना का लक्षण या मानसिक घटना है । जिसमें किसी घटना के बाबत प्रेरित संकलित प्रतिवर्तन के कारण घटना के घटित होने को प्रवृत्त किया जाता है । दुःख, संवेदना का लक्षण या मानसिक घटना है जिसमें किसी घटना के बाबत प्रेरित या संकल्पित परिवर्तन के कारण कम या अधिक प्रवर्तन घटना के अवसान में होता है” ।
नोबेल पुरस्कार प्राप्त कवि मिलोश कहते कि ‘कवि के पास डबल विजन होना चाहिए । एक उसे चीजों को ऊपर से देखना चाहिए, दूर से निरपेक्ष भाव से, विस्तार से देखना चाहिए । दूसरा उसे निकट से देखना चाहिए । बातों की गहराई में बारीकी से देखना समझना चाहिए’ । उदय प्रकाश के पास ये दोनों विजन हैं । वे चीजों को जितनी बारीकी से देखते हैं, उतने ही विस्तार से भी । वे सामाजिक यथार्थ को देख कर पहले तो विश्लेषित करते है और फिर उस यथार्थ को बिम्बों में ढाल कर कहानी की विषयवस्तु बनाते हैं । उन्होंने समाज की मानवीय संवेदना के विविध आयामों को अत्यंत ही सजीवता के साथ चित्रित किया है । इसके लिए उन्होंने एक नई जमीन की तलाश की, जो आगे चलकर प्रतीक बन गयी और फिर मिथकों में तब्दील हो गयी । उदय प्रकाश मानवीय संवेदना के तराजू में आधुनिक समाज को तौलते हैं । सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, महानगरीय, ग्रामीण संवेदना कुछ मुख्य आधार है ।
यांत्रिकीकरण, औद्योगीकरण, बाजारीकरण, की तेज होती प्रक्रिया से नगर और महानगरों का विकास हुआ है । सामान्यतः महानगर को ईंटों का जंगल कहा जाता है, जिसमें एक तरफ भीड़-भाड़, यातायात, महंगाई, बड़ी-बड़ी इमारतें, मनोरंजन, रोजगार के विविध साधन तथा आर्थिक संपन्नता मौजूद है, वहीं दूसरी तरफ झुग्गी-झोपड़ी, गंदगी, प्रदूषण, बेरोजगारी, आर्थिक विषमता भी है । गाँवों से महानगर आने के बाद मनुष्य इस जनसंख्या कुम्भ में अपनी अस्मिता खोता जा रहा है । अपने वजूद के लिए वह दिन-रात यंत्रवत काम करता है । उसके पास अपने घर, परिवार, समाज के लिए जरा भी वक्त नहीं है । वह सामाजिक जीवन जीने के बजाय एकाकी जीवन जी रहा है परिणामस्वरूप आत्मकेंद्रित कुण्ठा का शिकार हो रहा है । ऐसे में वह असंवेदनशील अमानवीयता की ओर बढ़ रहा है । “महानगरों के जीवन का सबसे बड़ा संकट मुझे यह लगता है, कि यहां मनुष्य धीरे-धीरे अमानवीय होता जा रहा है । सभी संबंध खुल कर व्यावसायिक बनते जा रहे है । पूंजीवादी समाज-व्यवस्था किस तरह समाज में जीते हुए व्यक्ति को असामाजिक, क्रूर, स्वार्थी, कुटिल और असुरक्षित बनाती है । इसका भयावह रूप महानगरों में विशेष रूप से दिखाई देता है” ।
यदि महानगरीय असंवेदनशीलता की बात करें तो वहां हमें इसका चरम रूप दिखाई देता है क्योंकि आधुनिकता, भूमंडलीकरण, यांत्रिकीकरण के दौर में मानवीय संवेदना और मूल्य एवं संस्कृति का पतन हो रहा है । भूमंडलीकरण के कारण व्यक्ति जहां एक तरफ उपभोक्तावादी संस्कृति का शिकार हो रहा है वहीं दूसरी तरफ यांत्रिकीकरण के कारण मनुष्य धीरे-धीरे असंवेदनशील हो रहा है ।
‘तिरिक्ष’ महानगरीय असंवेदनशीलता के चरम रूप को बयां करने वाली कहानी है । कहानी में पिताजी जो हमेशा गाँव में रहते है और शहर जाने से डरते है किन्तु कचहरी के काम से उन्हें शहर जाना पड़ता है । ‘मैं’ शैली में लिखी कहानी में पिताजी को ‘तिरिछ’ जो एक विषैला जंतु है, के काटने से नहीं मरते बल्कि शहरी जीवन की संवेदनहीनता, निर्ममता के कारण मरते है । विष की वजह से गला सूखा जा रहा है । इधर-उधर भटकने के बाद जब पिताजी पानी नहीं मिलता तो एक स्टेट बैंक में यह सोच कर घुस जाते है कि यहाँ तो जरूर प्यास बुझ जाएगी । बैंक का कैशियर अग्निहोत्री पिताजी के चेहरे पर जमी धूल मिट्टी देखकर डर गया और चीखते हुए घंटी बजा दी । बैंक के चपरासी, चौकीदार और दूसरे कर्मचारी कैशियर की चीख एवं घंटी की आवाज से चौंक गए । नेपाली चौकीदार थापा पिता जी को दबोच कर मारता हुआ कॉमन रूम की तरफ ले गया । उसके बाद चपरासियों ने भी पिता जी को मारा । “जब साढ़े ग्यारह बजे आसपास पिताजी बैक से बाहर आये तो उनके कपड़े फटे हुए थे और बिचला होंठ कट गया था, जहाँ से खून निकल रहा था । आँखों के नीचे सुजन और कत्थई चकत्ते थे” जब यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता । पिता जी जब शहर के थाने पहुँचते है तो सिपाही भी उन्हें पागल समझता जो थाने में घुस आया है क्योंकि उनके शरीर पर कमीज नहीं थी और पैंट भी फटी हुई थी । वहाँ पिता जी के साथ सब ने अमानवीय व्यवहार किया “ सिपाही पिता को घसीटता हुआ बाहर ले गया” । इसके बाद पिता को सम्पन्न कालोनी, इतवार कॉलोनी में घसीटते हुए देखा गया । कॉलोनी वालों ने भी उन्हें पागल समझा वहां के लोग उन पर ढेले मार रहे थे । “सड़क का ठेका लेने वाले ठेकेदार अरोड़ा के बीस बाईस साल के लड़के संजू ने उन्हें दो-तीन बार लोहे के रॉड से भी मारा था ।”
कहानी में पिताजी कोई पागल व्यक्ति नहीं थे । तिरिक्ष के काट लेने के बाद उसके विष से आपादमस्तक आक्रांत जब शहर में कचहरी तारीख पर आए तो अपने मानसिक उथल-पुथल के बीच भी वे पूरी तरह मानसिक रूप से स्वस्थ थे । गर्मी में विष से जूझते शहर में एक गिलास पानी की तलाश में भटकते पिता जी को शहरी बाबुओं और शोहदों ने पागल घोषित कर दिया । फ्लैश बैक शैली में और निर्मम तटस्थता के साथ लिखी गई कहानी में पिता की मृत्यु का जो चित्र ने खींचा गया है उससे शहरी जीवन की अमानवीयता, असंवेदनशीलता की परीक्षा हो जाती है साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि जंगल में तिरिक्ष के काटने से तो पिता जी बच सकते थे परंतु शहर के बीच एवं अमानवीय बर्बरता से भरे तिरिक्ष के समूह से न बच सके । सरबजीत सिंह का कहना है कि ‘तिरिक्ष’ सिर्फ एक पिता की कहानी नहीं है और ना केवल नैरेटिव की, बल्कि इन सब के माध्यम से घर-परिवार, नगर और सोशल सैटअप के अमानवीय रूपों का भयावह यथार्थ दिखलाती है ।‘मोहनदास’ कहानी आर्थिक तंगी से जूझते अस्मिता और अस्तित्व की संघर्षगाथा है । दलित घर में पैदा, पला-बढ़ा मोहनदास तमाम जद्दोजहद के बाद बी.ए. पास करता है । अखबार में फोटो छपती है । एक पहचान मिलती है । नौकरी के लिए उधार के पैसों से फॉर्म डालता है, शारीरिक परीक्षा एवं साक्षात्कार में भी सफल होता है परंतु उसे नौकरी नहीं मिलती है क्योंकि उसके पास न तो रिश्वत देने के लिए पैसे हैं और न ही पहुँच । विचारधाराओं का ढांचा रूढ़ होता है । उनमें मानवीय संवेदना की गुंजाइश नहीं होती है । दलित पढ़-लिखकर नौकरी करें, वह संपन्न हो यह समाज के उच्च वर्ग को मंजूर नहीं । ब्राह्मण कुल का विश्वनाथ मोहनदास के स्थान पर उसी के नाम से नौकरी कर रहा है । मोहनदास कुछ नहीं कर सकता । कहानी के अंत में वह चिल्ला-चिल्लाकर केवल एक ही बात कहता है ‘मैं मोहनदास नहीं हूँ’ मोहनदास असंवेदनशील लोगों से संवेदना की उम्मीद लगाये बैठा है । वह जानता था कि, “हिन्दुस्तान में भष्टाचार बहुत है नौकरियां बिक रही है । फिर भी उसे उम्मीद है कि कम से कम दस से बीस प्रतिशत अपनी मेरिट और योग्यता के दम पर नौकरी पाते हैं ।”
“ मुखौटा पहन कर, फैंटेसी के जरिए मोहनदास में उदय प्रकाश जी ने बहुत कारुणिक कथा कही है । जो अथक परिश्रम करते हुए और सब कुछ सहते हुए भारत का आम निरीह कातर नागरिक रोज-ब-रोज भोगता है ।”
ग्राम तो एक इकाई है, उसमें लोकमानस विद्यमान रहता है ।यहां रिश्तों में एक ख़ास लगाव, आकर्षण तथा अपनापन होने के कारण लोग आपस में जुड़े रहते है । “ग्रामीण संवेदना की संज्ञा जो अभी भारत के गाँवों के लिए प्रयुक्त होती है । इसका अभिप्राय उन अनेकों परिवार के समूह से है, जो एक ही स्थान पर निवास करते हैं तथा उसमें उनका सुख-दुख शामिल होता है ।” परन्तु सुविधाओं के आभाव में ग्रामीण जीवन अधिकाधिक संघर्षमय होता है । प्रायः गाँवों में भी दो वर्ग होते है एक शिक्षित मध्य वर्ग और दूसरा अनपढ़ निम्न वर्ग । निम्न वर्ग परंपरा के बोझ तले दबे धार्मिक एवं सामाजिक अंधविश्वास में जीता है । इसी का लाभ उठा कर शिक्षित मध्य वर्ग उसका शोषण सदियों से करता हैं ।
सामान्यत: ग्रामीण जीवन में पारिवारिक संबंधों को ज्यादा महत्व दिया जाता है क्योंकि वहां अधिकांश परिवार संयुक्त होते हैं साथ ही अपनेपन की भावना एवं एक दूसरे के प्रति समर्पण का भाव दिखाई पड़ता है । संयुक्त परिवार में पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-भाई, भाई-बहन, सास-बहू, माँ-बेटा-बेटी आदि के संबंधों के माध्यम से उदय प्रकाश ने ग्रामीण संवेदना को चित्रित किया है ।
सामाजिक व्यवस्था में पति-पत्नी के बीच का रिश्ता प्रेम, सहयोग, विश्वास का होता है । स्वस्थ परिवार में दोनों एक-दूसरे के पूरक है । उ।नके सम्बन्ध के आधार पर ही परिवार के संस्कार, आदर्श, यश-अपयश अवलंबित होते हैं । “ दोनों को एक-दूसरे के प्रति विश्वास और वफादारी रखनी चाहिए । जीवन केवल मौजमस्ती के लिए नहीं है ।” ‘सहायक’ कहानी में भी माँ हमेशा पिता की राह देखती रहती है, क्योंकि पिताजी के अत्यंत सहायक स्वभाव होने के कारण औरों की मुसीबत खुद पर ओढ़े घर से बाहर रहते है । जिसकी चिंता माँ को लगातार सताती रहती है । सोन नदी में बाढ़ आने पर लोगों को आने-जाने के लिए प्रकाश की आवश्यकता थी । तब पिताजी ने खुद के ट्रैक्टर पर प्रकाश को पहुंचाने की व्यवस्था की । परंतु जब ट्रैक्टर बाढ़ की चपेट में आकर बहने लगा तो पिताजी भी बाढ़ में बहने लगे । यह सुनकर माँ पागलों की तरह रो रही थी “ रोने की आवाजें हमारे घर से भी उठने लगीं ।सबसे ज्यादा माँ रो रही थीं । वे पागल हुई जा रही थीं ।मुझे माँ का चेहरा याद है वे बारिश से भीगी जमीन पर लोट-लोटकर रो रही थीं” । वह एक दर्शक ही थी । उसकी सांस रुकी जा रही थी । पिता जिंदा है यह सुनकर उसकी जान में जान आ गयी । माँ की बेटे के प्रति संवेदना को ‘नेलकटर’ कहानी में रेखांकित किया गया है । जहाँ माँ बीमार है परन्तु बेटे का बराबर ध्यान रखती है ।“ माँ ने मेरे बालों को छुआ । वे कुछ बोलना चाहती थीं लेकिन मैंने रोक दिया । वे बोलती तो पूछती कि मैं सिर से क्यों नहीं नहाता ? बालों में साबुन क्यों नहीं लगाता ? इतनी धूल क्यों है ? और कंघी क्यों नहीं कर रखी?”
ग्रामीण जीवन में पुरुष प्रधान संस्कृति में पिता अपने पुत्र की अच्छी परवरिश करता है । उसे अच्छी शिक्षा, संस्कार देकर अपने खानदान का नाम रोशन करने की अपेक्षा रखता है । पुत्र का पिता के प्रति सम्मान का भाव होता है । ‘तिरिक्ष’ कहानी में बेटा अपने पिता पर हमेशा गर्व करते हुए कहता है “हम पिता पर गर्व करते थे, प्यार करते थे, उनसे डरते थे और उनके होने का एहसास होता था जैसे हम किसी किले में रह रहे हों । ऐसा किला जिसके चारो ओर गहरी नहरें खुदी हो, बुर्जे बहुत ऊंची हों, दीवारें सख्त चट्टानों की बनी हो हर बाहरी हमले के सामने हमारा किला अभेद्य हो” वर्तमान में पिता और पुत्र में ही संघर्ष दिखाई देता है । “ आधुनिक काल में त्याग, बलिदान की जगह पिता-पुत्र में संघर्ष ही दिखाई देता है ।उनमें एक दूसरे के प्रति प्यार, आदर, आत्मीयता और विश्वास कम हो रहा है । पिता पुत्र का सम्मान नहीं करता । उनके आपसी संबंध टूटने लगे हैं” ग्रामीण जीवन में यह आधुनिक बोध महानगरीय जीवन से आया है । यांत्रिकीकरण, व्यावसायिकता, पारिवारिक संबंधों पर हावी हो रहे हैं । संबंधों का नाजुक धागा टूटकर उनमें संघर्षों की गांठे पड़ने लगी हैं । संबंधों पर सामाजिक परिवर्तनों का असर हो रहा है । जिनकी तेज गति ने संबंधों को झकझोर दिया है । ऐसे में संवेदना नहीं जगती, जिससे पुराने और नए मूल्यों, संस्कारों के बीच दीवार खड़ी हो गई है ।
संयुक्त परिवार में प्रायः यह देखा जाता है कि बड़े भाई का छोटे भाई के साथ सहजता, अपनापन का रिश्ता होता है । भाई-भाई के पवित्र रिश्ता से प्यार परिपूर्ण होता है परन्तु वर्तमान में सम्पत्ति, स्वार्थ, द्वेष, महत्वकांक्षा, ईर्ष्या के कारण उनके बीच रिश्ते टूटने लगे है और वे एक-दूसरे के दुश्मन बन बैठे हैं । उदय प्रकाश ने इस समस्या को ‘अपराध’ कहानी में रेखांकित किया है, जहां छोटा भाई अपने बड़े भाई से बदला लेने के लिए माँ से झूठ में ही बड़े भाई का नाम बोल देता है ताकि भाई को मार पड़े । “भाई बार-बार कहते रहते कि मैंने इसे नहीं मारा, लेकिन पिताजी उन्हें पीटते जा रहे थे ।भाई रो रहे थे । वे सच बोल रहे थे, लेकिन उन्हें सजा मिल रही थी ।” तब से उसके मन में अपराध की भावना थी । जिसका प्रायश्चित करने के लिए उसने कई बार प्रयास किया ।
भारतीय समाज में भाई और बहन के रिश्ते को अत्यंत ही पवित्र माना जाता है । भाई अपनी जान पर खेल कर बहन को बचाने में अपना कर्तव्य समझता है । ‘... और अंत में प्रार्थना’ कहानी में इस रिश्ते के मर्म को उद्धरित किया गया है “जब मां की मृत्यु हुई मैं इस शून्य को सह पाने की स्थिति में नहीं था । दुबला पतला, चिड़चिड़ा था और बहुत अधिक संवेदनशील था, मैं उसी दिन मर जाना चाहता था लेकिन मैंने अपनी छः साल की छोटी बहन को देखा । वह इतनी छोटी थी कि मां की अर्थी ले जाते समय फेंके जाने वाले तांबे के सिक्के को बिन रही थी और बताशे खा रही थी । मुझे लगता है कि मैं कई वर्षों तक अपनी छोटी बहन को अकेला नहीं होने देने के लिए जीवित रहा ।”
सामान्यत: ग्रामीण परिवेश में अपनापन, एक दूसरे के बीच संवेदनापूर्ण संबंध दिखाई पड़ते है । ग्रामीण जीवन में संयुक्त परिवार के कारण जब परिवार के किसी एक के सामने कोई समस्या आती है तो उसका एहसास परिवार के सभी सदस्यों को होता है और सब लोग मिलकर उस समस्या का समाधान निकालते हैं । मानव को परिवार से ही संस्कार, शिक्षा, प्रेम, वात्सल्य, यौन संबंधों की पूर्ति, संतानोत्पत्ति, सामाजिक और व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त होते हैं परंतु वर्तमान में संयुक्त परिवार का भविष्य दरकता दिखाई पड़ रहा है । जिससे ग्रामीण परिवेश में भी रिश्तों का अपनापन ख़त्म हो रहा है ।
इसके इतर महानगर में पिता-पुत्र, माँ-बेटा, भाई-भाई, भाई-बहन के बीच संवेदना तो जैसे आजकल खत्म ही होती जा रही है । संयुक्त परिवार के विघटन के बाद एकल परिवार की संकल्पना सामने आई है । यहां तो एक आदमी दूसरे आदमी से सम्बन्ध बनाने के बजाय प्रोडक्ट से अधिक सम्बन्ध बना रहा है । इसी कारण एक नई संस्कृति का विकास हुआ जिसे हम उपभोक्तावादी संस्कृति कहते हैं । गाँवो में जहां आत्मीयता, अपनापन, परस्पर स्नेह, संवेदना और पहचान होती है वहीं महानगर में आने के बाद व्यक्ति इन सब चीज़ों को लगभग खो देता है । वह आत्मकेंद्री बन अजनबीपन का शिकार होता चला जाता है । वह महानगरीय यांत्रिकीकरण, नीरसता, भागदौड़, असंवेदनशील, असंतोष, निराशा, अव्यवस्था आदि का भी शिकार होता जा रहा है । वह अर्थ की अंधी दौड़ में मात्र भौतिक सुविधाओं की ओर ध्यान देता है । जिसके चलते संवेदना उसके लिए कोई मायने नहीं रखती ।
‘छप्पन तोले का करधन’ कहानी में ग्रामीण जीवन की असंवेदना दिखाई देती है । जहां लालच में ग्रस्त रिश्तों को भुलकर क्रूरता का सहारा लिया गया है । परिवार के सभी सदस्य दादी के साथ अमानवीयता का व्यवहार करते है क्योंकि सभी को यह लगता है कि दादी के पास करधन है जो दादी देना नहीं चाहती । “दादी को खाना देते समय एक बहुत पुराना तुचका-पुचका भगौने में दाल भात, चटनी, सूखी मिर्च डाल कर देते है । कभी-कभी वह भगौना वहां वैसे ही पड़ा रहता ।” तिरिछ कहानी संग्रह, छप्पन तोले का करधन’पेज संख्या 52 दादी के बाहर निकलते ही पूरे घर में अजीब सी तेजी और हलचल पैदा हो जाती । हर कोई व्यस्त बन जाता । बुआ, चाची और अम्मा की आवाजें तेज हो जाती । चाची लगातार कुछ-न-कुछ बड़बड़ाती रहती, बुआ दादी के बगल से धम-धम पैर पटकती हुई निकलती, अम्मा सारे घर में झाड़ू लगाने लगती । सब के मन में एक ही ख्याल आता है अगर दादी की नज़र कहीं किसी पर सीधी पड़ गयी तो समझ लो उसका दिन बुरा गुजरने वाला है लेकिन लेखक यह अच्छी तरह जानते हैं कि पूरा घर दादी के बाहर निकलने के कारण ही पानी भरे कटोरे की तरह भीतर से हिल रहा है । लेखक लिखते हैं कि, “ मैं जानता था यह सब कुछ गति नहीं है, बल्कि दादी के प्रति सबकी शत्रुता एवं घृणा का बदला हुआ रूप है । दादी के बाहर निकलते ही पूरा घर किसी नाव की तरह डगमगाने लगता और दादी के खिलाफ किसी सेना की तरह संगठित हो उठता है ।” उदय प्रकाश निजी संवेदना के चलते अमानवीय स्थितियों पर दृष्टिपात किया है और यह पता लगाने में सफल हुए कि उनकी इस अमानवीयता के पीछे मनुष्य की व्यावसायिक वृत्ति क्रियाशील है ।
‘हीरालाल के भूत’ कहानी में पति हीरालाल और पत्नी फुलिया दोनों हवेली में काम करते है । सुबह से लेकर शाम तक वे इस कदर व्यस्त रहते है कि उनके पास साथ समय बिताने के लिए वक्त ही नहीं मिलता फिर भी दोनों अच्छी तरह संबंधों को निभा रहे है । वहीं हवेली का ठाकुर और पटवारी दोनों मिलकर फुलिया के साथ जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाते है । उदय प्रकाश लिखते है कि वे “ हीरालाल की इज्ज़त का आखिरी कोना उसकी फुलिया की इज्जत लूटते हैं ।” असंवेदनशीलता हवेली की चहरदीवारी तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि इसके बाहर भी देखने को मिलती है जब हीरालाल को कुत्ता काटता है और उसके पास अस्पताल जाने के लिए पैसे नहीं हैं । वह कुत्ते की तरह भौंक रहा है और बीच-बीच में रो भी रहा है । उसके इलाज के लिए हवेली का कोई सदस्य आगे नहीं आता । “इतना खून-पसीना, जमीन-जायदाद, सेवा और बीबी की आबरु तक सोख लेने के बाद हीरालाल के लिए ममता का एक तिनका तक हवेली में नहीं था ।” हीरालाल को तड़प-तड़प कर मरते हुए हवेली से सभी सदस्यों ने देखा था परंतु किसी ने आगे बढ़कर उसकी मदद नहीं की । आखिर में एक बूढ़ा तिलकिया और रामचरण ने उसकी लाश को रस्सी से बांध कर खींचा था । हीरालाल के मरने के दो दिन बाद ही फुलिया की भी मृत्यु हो गई । इस सारी घटना को प्रत्यक्ष देखने वाले हवेली के लोगों का मन तनिक भी अस्वस्थ नहीं हुआ था । यहाँ उदय प्रकाश ग्रामीण असंवेदनशीलता का नग्न यथार्थ चित्रण करते है । डॉ. भगवानदास वर्मा कहते हैं कि, “ महानगर बोध वह बोध है, जो महानगरीय परिवेश के कारण वहां के रहने वाले लोगों की जिंदगी में और जीवन चर्या में ऐसा प्रभाव पैदा करे जिससे दृढ़ संकट और संत्रास पैदा हो । कुल मिलाकर एक ऐसी नैतिक उथल पुथल होती है जिससे मध्य जिंदगी का हर क्षण संघर्ष की यंत्रणा से गुजरता हो ।”
उदय प्रकाश का रचना संसार विविध संवेदनाओं से भरा है । उन्होंने ग्रामीण जीवन के साथ-साथ शहरी जीवन की जटिल यथार्थ को हमारे सामने प्रस्तुत किया है । समय और परिवेश में उपस्थित महानगरीय संस्कृति में कदम-कदम पर मनुष्य की असंवेदनशीलता और अमानवीयता का रूप दिखाई पड़ता है । महानगरीय सभ्यता एवं संस्कृति में सामान्य मनुष्य का जीवन-यापन करना अत्यंत ही दुर्लभ हो गया है । लेखक समाज के आम व्यक्ति के जीवन की समस्या से चिंतित है ।
- विवेक पाण्डेय

टिप्पणियाँ