साक्षी वर्मा की कविता

  
                          सो जाऊं क्या ?


 सो जाऊं क्या ?
 लंबे सफर में एक लंबे अरसे से चलती रही हूं मैं
बहुत दूर जाना है मुझे,इन रातों में जुगनुओं सी जलती रही हूं मैं
नींद कहीं पीछे किसी कूंचे पर रख छोड़ आई हूं
वापस ले आऊं क्या?
थोड़ी देर सो जाऊं क्या?
ये दर्द राहगीर बन साथ चले हैं मेरे, मानो इनकी हमसफ़र हुई हूं मैं
तनहाई रातों में स्याही बन पीछे पड़ी है, टूटने पर और तोड़ी गई हूं मैं
ये आंखें अब सूख चुकी है तुम पूछो हाल मेरा, मैं आंसू फिर से भर लाऊं क्या?
इन गलियों से गुजरते अपनी ही दास्तां के ज़िंदा किरदार देखती आ रही हूं मैं,
तुम इस फसाने से अंजान लगते हो
कहो तुम्हे भी सुनाऊं क्या?
क्या सुनाऊं तुम्हे भी मेरी ज़िन्दगी की चीखती खामोशी
उस खामोशी से कुछ कहती मेरी तनहाई
एक बेज़ुबां सी बोली सुनती मेरी परछाई
मेरे ही साथ न जाने कितने रिश्ते लिए चलती मेरी परछाई
कभी रोती तो कभी लडती,कभी गिरती और फिर खड़ी होती मेरी परछाई
हर रोज़ एक जंग,हर रोज़ एक सी जंग लडती मेरी परछाई
हर त्याग बडी आसानी से कर जाती मेरी परछाई
एक मां के सपनों को स्कूल तक ले जाती मेरी परछाई
एक भाई से अमूमन डर जाती मेरी परछाई
अपनी बहन को अपने जैसा बनाती मेरी परछाई
बुज़ुर्ग़ो के मुताबिक तन ढकती मेरी परछाई
वो दादी के तानों रोज़ सुनकर टालती मेरी परछाई
रोज़ दबे पांव घर जाती मेरी परछाई
वो नुक्कड़,किनारों,बंद मौहल्लों से बचकर निकलती मेरी परछाई
रातों को बाहर निकलती नहीं मेरी परछाई
के गलती उनकी थी ये कोई कहेगा नहीं, इसीलिए लड़कों से नहीं बतलाती मेरी परछाई
पर अब थक चुकी है मेरी परछाई
पूछो तो कुछ बताती नहीं मेरी परछाई
क्यूं अब उसी भाई से दूर रहती है वो
क्यूं अब अकेले चलने से डरती है वो
क्यूं वो अब हंसती,मुस्कराती नहीं
क्यूं अब दुपट्टे के बिना बाहर जाती नही
क्यूं अब दिल्ली की बसें उसे भाती नही
क्यूं अब वो किसी से हाथ मिलाती नही,
गर हाथ मिला भी ले तो बात आगे बढ़ाती नही
क्यूं वो बड़ों को सही और ग़लत समझती नही
क्यूं अपने सपनों को एक नया सपना दिखाती नही
क्यूं अब वो किताबों से नज़दीकी बढ़ाती नही
क्यूं अब चूड़ियां हाथों से उतारती नही
कि अब बेड़ियां भी मानो खनकने लगी है
ये कैद हवा ताज़ी सी लगने लगी है
कि इस काले गहरे अंधेरे में भी कयी रंग दिखते हैं
उन रंगों में श्रेष्ठ लाल लगने लगा है
कि पता है कि ये सफर बहुत लंबा है
और पता है कि थकना मना है
कि अब वो ज़्यादा बोलती नही
चीखने में ताकत गवाती नही
कि होंठों पर संयम के धागे से टांके भर लिये है
कि अब निगाहें सीधी रखना सीख गई है
कानों को इस तरह मज़बूत किए रखा है,
कि कोई दूसरी परछाई पुकार भी ले तो मुड़ती नही है
हां,घाव खुले छोड़ रखे हैं
मरहम सहानुभूति का लगाती नही है
अब कपड़े चटकीले पहनती नही है
रंगों से कोई दुश्मनी नहीं है,बस काले से मोहब्बत कर बैठी है
एक जंग लड़ने चली है
हार सकती नही है
कि लड़ना अब कर्म नही, धर्म समझ बैठी है
इसकी पूजा ना करे, तो खुदको खो बैठेगी वो
कि वो एक परछाई है,
सूरज उसके नाम का निकलने तो दो
कि उसकी आवाज़ भी सुनी जाएगी
ज़रा वक्त आने दो,उसे बोलने तो दो
कि जब वो चीखेगी तो रूह रो बैठेगी,
ज़रा देखो तो उसे, ज़रा बदन सिहरने तो दो
कि अब वो रोती नही है
हां बस आंखें लाल रखना सीख गई है
कि जो तुम्हारी नसों में बैठा अब पानी हो चुका है,
वो उसे फिर से खून बनाएगी
कि जिस आग पर तुम्हारी ताकत के बादल बरस चुके हैं
वो लकड़ी सूखने तो दो,वो आग फिर से जलाएगी
कि वो अपने ज़ख्मों को मशाल बनाकर चली है,
लपट थोड़ी सी उठने तो दो

क्यूं डर ग‌ए हो सिर्फ एक पुकार से,
के ज़रा हाथ खुलने तो दो
अब ये कलम चलने तो दो,
के पन्नों को थोड़ा सा खुरचने तो दो
इस स्याही को नीली से लाल होने तो दो
के कुछ फैसले लेने तो दो,
एक अदालत तेरी और उसकी बैठने तो दो
क्यूं डर ग‌ए हो सिर्फ एक आगाज़ से
बात गर न्याय की चली, तो गवाही देने तो दो
एक परछाई ही तो है,मगर इसकी सुबह होने तो दो
हां माना कि ये रात लंबी है,मगर एक रात ही तो है
रोशनी रौशनदान से छनकने तो दो
कि परछाई ही तो है,इसे अस्तित्व में आने तो दो
थोड़ा वक्त रुको, तुम्हारा वर्चस्व हिलाने तो दो
एक नया आसमां बनाने तो दो
हवा बराबरी की चलाने तो दो
कि कंधे से कंधा मिलाने तो दो,
तुम्हारी लिखी किताबें जलाने तो दो
एक नया इतिहास रचाने तो दो
कि फ़कत साहस आने तो दो
कि अभी थकी है वो,
सांस खुली हवा में लेने तो दो
वो फिर से लडने को तैयार होगी,
ज़रा इस रात के पहर बदलने तो दो

कि अभी मंज़िल बहुत दूर है,
बैठ किसी नुक्कड़ पर कदमों का हिसाब लगाऊं क्या?
नींद कहीं पीछे किसी कूंचे पर रख छोड आई हूं,
वापस ले आऊं क्या?
थोड़ी देर सो जाऊं क्या?
थोड़ी देर सो जाऊं क्या?
-साक्षी वर्मा




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कविता में गाँव की उपस्थिति

"कविता"

नींद गहरी है