कविता कर्मकार की कवितायेँ


  [ कविता कर्मकार मूलतः असमिया भाषा की युवा कवयित्री हैं  ...]           


1 .  कैसे हैं हम                                                                                          
   
कैसे हैं हम  
कितने दिन अपनों से 
बिना झूठ बोले, कह पायें  
कि ठीक हैं हम 

भला कैसे हो सकते थे हम 
जो डूबे थे 
एक उम्मीद में सरापा 
अनबरसी बारिश की उस बूँद के लिए  

जो बस... बरसने-बरसने को थी 
उसी की प्रतीक्षा में तरसते हुए 
पपीहे की तरह आस धरे 
कैसे हो सकते थे हम...   

वसंत की पुरवाई से सुगन्धित पलों में  
या शरद की खुरदुरी साँसों 
से भरे समय 
की अनायास यादों में उलझे हुए 

सिसकते हुए, हिमखंड की तरह पिघलते हुए 
कैसे हो सकते थे हम... 

क्या कहें और कैसे  
जीवन की अमावस 
के विरह भरे अंधेरों में 
कुंवारे सपनों के लिए व्याकुल  
टूटते तारों के पीछे पीछे 
भागते हुए दर-ब-दर कपास के फूलों की तरह 

कैसे हो सकते थे भला हम...

यवनिका के नेपथ्य से निकल कर 
बिना अभिनय किए 
क्या दे पाये हैं कभी 
जीवन-लीला के 
छोटे बड़े सभी दुखों के हिसाब  
जिसकी सज्जा के लिए संजोए हैं 
शोकाकुल अरण्य ,
जहाँ से कब का चला गया बसंत 

क्या बयान कर सके हैं  
बिना झूठ बोले कभी  
उन अपनों से
मन की असल स्थिति 

खुद से भी कहाँ कह सके! 

ऐसे में भला 
कैसे हो सकते हैं हम 
जब मन के भीतर और बाहर के हालात हों 
एक जैसे! 

2. इतिहास 
           

शिरीष की जड़ों में  
दफ्न  है हमारा इतिहास 
दिल में  निचोड़  दी गयी है 
चाय-पत्तियों की सुगंध 
मुझे बधिर बनाते 
शोषित प्रताड़ित पूर्वजों  की आर्त आवाजें 

सम्भोग और निद्रा के हर पल 
भूख की ज्वाला में  जलकर राख हो जाते 
इतिहास में  
मार्क्स , लेनिन अथवा बुद्ध की ज्ञान दीक्षा  
दूर्बूद्य थी उस काल में 

उनमे प्रतिवाद के  पन्ने 
कोरे ही रह गये 
अथवा किसी ने भी नहीं  खाया 
ज्ञान वृक्ष का  कोई फल 

एक दिन ..
गंदी नालियों  के कीड़ों की तरह 
प्रतिबाहित जीवनयापन से 
अँधेरा मिटेगा 
पेड़ों में  रोशन होगा चिड़ियों का घोसला 
गीत गाये जायेँगे भोर के 
यातना और भूख से मिलेगी मुक्ति 
इतिहास के पन्ने भरे जायेँगे 
नयी कहानियों  से 
कुछ आप लिखोगे 
कुछ हम लिखेंगे 

 हम सबके खून का रंग एक है 
भूख की भी रहेगी एक ही  संज्ञा 
मेरी तरह हाहाकार नहीं  करेगा कोई 
पूर्वजों  की कब्र में  
लिखा गया उन मिथकों को याद करके 

3.जाड़े की रात 
              

 जाड़े की रात में 
हमारे छोटे -छोटे घरों में वे आग लगाते हैं 
उस आग से सेंकते हैं  अपना कलेजा  
हमारे अरण्य रोदन में 
ठहाके लगाकर हँसते  

आग पसरती  एक गॉंव से दूसरे गॉंव तक 
एक शहर से दूसरे शहर तक 
भौगोलिक सारी सीमाओ को पार कर 
आग फैलती है  
गलियों से गॉंव तक 
हर शहर तक 
सीधे - साधे लोगों के दिलो तक 
सोते बच्चे की तरह शांत 
चेहरे और आँखो तक 
खून से भीगे सूर्यमुखी फूलों तक 

खून के नशे में मदहोश हैं  सब 
प्रतिरोध और प्रतिवाद में 
प्रतिदिन जंगी होते हैं  
नशेड़ी रातें क्रोध में  हुंकारती  हैं   

कितनी बार कितने दिन कितनी रातें 
देखे हमने 
मुखौटे उतरते चेहरे 
मुखौटे के आड़ में  नये चेहरे 
सब देखा हमने 
परिचित चेहरे की आड़ में  अपरिचित चेहरे 

समझकर भी नहीं समझ सके  वह  गोपनीय कथा 
युध्दकालीन तत्परता में  
कैसे बदलते हैं सारे 
मेकअप रूम राजा को प्रजा बनाती
प्रजा को राजा 
और दुश्मनों  को दोस्त 
भोग और लालसा के लिये 
अपने बनते पराये  
अदृश्य इशारे सबको नचाती 
पुतले बनकर रह जाते सब 

छल से, कहाँ  से आते हैं 
हमारे हिस्सो के 
भोग के दाने 
प्यार के बोल 

कनाट से 
चमत्कारी इश्तहार उड़ते 
मोल भाव चलते हैं  
हमारे सपनों और सांसो के  

4: युद्ध के दिनों में अकेले रह जाते हैं  


युद्ध के दिनों में अकेले रह जाते हैं 
मौत के अखाड़े में हम 
हर रात आवारा फिरते हैं 

जलते शहर में   
यातना से दम घुटने पर 
हर साँस की पीड़ा असहनीय होती है 
एक एक कर आहिस्ता से खुलते हैं 
जहन्नुम के दरवाज़े 

अविश्वास 
रोजाना  हत्या करता है 
सम्बन्धों की 
हमें खुद से भी अलग कर देता  है 

यह ऐसा समय है 
जब कोई भी रोशनी 
अंधकार को चीर नहीं पा रही  
किसी ने मानो 
धकेल दिया है अनंत और कठोर अंधकार में हमें 
एक छायाहीन शरीर 
छटपटाता  है
बिखरी सी आस से 
रूठी हुई साँस से 
दोपहर की तेज  धूप 
आहिस्ता- आहिस्ता ओझल हो जाती है 
दूर कहीं  सूरज डूबता  है 
उस ओर 
जिधर अफ़वाहों की धुंध है, गहरी बहुत गहरी
आंसुओं का लबालब दरिया है   
युद्ध के दिनों में हर कोई अकेला रह जाता है
और 
धीरे-धीरे मिट जाता है अपने में ही अपना अस्तित्व !


5.पाप-पुण्य के फूल

पाप के दलदल में आपादमस्तक 
डूबते हुए  हम 
कामना करते 
जीवन में महकते पुण्य के फूल की

सुंदर सपने के लिये यह पाप 
पाप के फूल तोड़ कर
प्रेम प्रतिमा की वेदी पर सजाने की वासना

जिस मार्ग से जाने की बात नहीं थी 
उसी मार्ग से चलते हुए मंत्रमुग्ध

एक दिन ...
पायल पहनाया पाप ने 
दिन बीते 
रेंगते रहे पाप 
कमर से गले तक 
पलक झपकते अपादमस्तक पाप ने डुबो लिया

अपनी जंजीर में जकड़ी हुई मैं
मुक्ति की चाह ही नहीं रही  लेकिन

हर रात विषैली बनती गयी 
अँधेरे को प्रकाश मानकर 

अपने पाप को फूल बनाकर खिलने की 
आस रखने लगी

पाप की वासना में  सुख 
या पुण्य मुद्रा में  सुख 
सोचते-सोचते दिशाहीन घूमती रही


6 कुछ नहीं कहते वे

कुछ नहीं कहते वे 
खून सने जिस्म से 
प्रतिवाद और विरोध में  
धूप-छाँव में उलझते  हुए  भी

अपने ही शव को अपने कंधो पे ढोते ताउम्र 
अपनी परछाइयों के अलावा 
कोई साथ नहीं देता 
अंतिम समय में 

दीवारें भर जाती हैं  
उनकी भूख और अपूर्ण सपनों के नारे से 
कुछ नहीं  बोलते उनके होठ

कौन है जो बोलेगा 
लिखेगा मौन समय की अनकही कहानियाँ 
क्या कहेंगे  सदियों से सिल दिये गए होठ 
कौन समझायेगा सुसुप्त निगाहों की भाषा

जागते सपने सिरहाने में 
भूख निचोड़ती  जीवन को 
कौन देखेगा  मुड़ के हमें

जहाँ राजनीति होती 
वहाँ राजा होता है 
सरहदें होती हैं  
भोग और विलास होता है 
ऊँचे-ऊँचे राजभवन के नीचे कहीं दब जाती हैं गरीबों की  कुटिया 
राजा बदलता है राज बदलता है 
उनकी कहानी वहीं की वहीं रह जाती हैं 

भूख,अनिद्रा 
युद्ध ,निर्वासन और विस्थापन 
यही प्रजा भोगती है 
राजा की जयकार ही प्रजा की एकमात्र नियति है

सरहदें खून माँगती हैं  
वो सरहद कहाँ जहाँ फूल खिलते हैं

      [कविता मूलतः असमिया भाषा में है | अनुवाद स्वयं कवयित्री ने किया है ]

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