सम्पूर्ण परिवर्तन की अभिव्यक्ति है: स्वीकारोक्ति(कॉन्फेशन)
[ संतोष पटेल हिन्दी-भोजपुरी भाषा के सशक्त साहित्यकार हैं साथ ही भोजपुरी जन जागरण अभियान के एक्टिविस्ट l ]
प्रो.शत्रुघ्न कुमार दलित साहित्य के ऐसे हस्ताक्षर हैं जो बिहार और शांति निकेतन की धरती से चलकर देश की राजधानी में आए और दलित साहित्य आंदोलन के केंद्र में रहकर इस आंदोलन को सुदृढ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अंदर कौम और वंचित समाज के प्रति जिस तरह की वचनबद्धता है,आजकल बहुत कम ही लोगों में दिखाई देती है। किसी भी संकट में विचलित न होना उनके व्यक्तित्व को विलक्षण बनाता है। मैंने पाया कि कौम या बहुजन आंदोलन के प्रति निष्ठा के साथ उन्होंने कभी समझौता नहीं किया।
प्रो कुमार दलित चेतना के चर्चित कहानीकार, कवि व आंदोलनकारी-साहित्यकार हैं जिन्होंने हिंदी और भोजपुरी दोनों भाषाओं में समान रूप से लेखन किया और देश-विदेश में प्रसिद्धि पायी है। उन्होनें विभिन्न भाषाओं में दलित विमर्श और चेतना की कहानियां लिखी है। उनकी हिंदी कहानी संग्रह 'हिस्से की रोटी',अंग्रेजी कहानी संग्रह 'The Snatched Bread व भोजपुरी कहानी संग्रह भ्रष्टाचार ', उन्हें दलित विमर्श के सशक्त कथाकार के रूप में स्थापित करते हैं। कहना ना होगा कि इसमें प्रो. कुमार भोजपुरी दलित चेतना के प्रथम कहानीकार हैं जिनकी कहानी संग्रह 'भ्रष्टाचार' भोजपुरी की पहली कहानी संग्रह है। एक दलित चिंतक के रूप में प्रो. कुमार की कहानियां दलित विमर्श को उच्चतम आयाम प्रदान करती हैं।
'कन्फेशन' कहानी प्रो. कुमार की नवीनतम कहानियों में से एक है । यह कहानी 'स्वीकारोक्ति' के नाम से दिल्ली से निकलने वाली पत्रिका 'उम्मीद' के अंक 3, जुलाई-सितम्बर,2014 के अंक में प्रकाशित हुई। इस कहानी का मुख्य उद्देश्य है वर्षों से चले आ रहे इस विवाद को विराम देना कि केवल दलित ही नहीं अदलित भी दलित साहित्य लिख सकता है।
कन्फेशन कहानी शुरुआत पढ़ते हुए सुरेखा भगत की एक कविता 'सन्मार्ग' की कुछ पंक्तियाँ अनायास याद आती हैं-
"सामाजिक बदलाव के मायने क्या होते हैं?
अपना सम्यक परिवर्तन करे इंसान यह उत्तर
प्रश्न का सटीक जबाब देते हैं।"
प्रस्तुत कहानी में कहानीकार ने दलित साहित्य में सवर्ण घुसपैठ पर करारा चोट किया है-
"सम्मेलन के तीसरे दिन आलेख पढ़ने के बाद प्रश्नोत्तरी के कार्यक्रम के दौरान इस बहस ने गरमागरम रूप धारण कर लिया। तिवारी जी, शर्मा जी, सिंह साहब, गुप्ताजी, श्रीवास्तव जी, झा जी, मुखर्जी बाबू एवं श्याम जोगेलकर, चुमकी पालीवाल, सतना राय आदि यह मनाने को तैयार ही नहीं थें कि दलितों की पीड़ा को वे नहीं महसूस करते हैं उनका तर्क है कि इस पीड़ा को महसूस करने के कारण ही वे चेन्नई से, कोलकत्ता, मुम्बई से राजकोट से, पूना से और पटना आदि स्थानों से इतनी बड़ी संख्या में सम्मेलन में यहां दलित साहित्य पर अपना पर्चा पढ़ने आए है।"
'स्वीकारोक्ति' कहानी दलित चेतना और साहित्य में प्रो. कुमार की महती हस्तक्षेप को रेखांकित करती है। उनकी सशक्त लेखन दलित आन्दोलन को उर्ध्वगामी बनाने में सहयोग देता है -'स्वीकारोक्ति' में प्रो. कुमार सवर्ण लेखकों के द्वारा छद्म दलित चिंता और दलित पिछड़े लेखकों के अवसर को हड़पने की नियत को बेपर्दा करते नज़र आते है - " उन्होंने (सवर्ण लेखकों ने ) यह जाहिर नहीं किया कि जिन जिन जगहों से वे हवाई यात्रा करके यहाँ (कांफ्रेंस) में पहुंचे उन जगहों पर दलित पिछड़े विद्वान भी तो थे जो स्वयं इसलिए जाति का दंश झेलते है क्योंकि उन्होंने दलित मुद्दों को लेख, कहानी, उपन्यास, आलेख लिखे और इनके द्वारा दलितों पर हो रहे अत्याचार को प्रकट किया है और जाति के नाम पर दलितों को प्रताड़ित करने वाले लोगों को बेनकाब किया है । "
'स्वीकारोक्ति' कहानी 'उम्मीद' पत्रिका में हिंदी में , भोजपुरी जिन्दगी में 'भोजपुरी' में और हेलो भोजपुरी पत्रिका में अंग्रेजी में प्रकाशित है । इस कहानी में 'दलित साहित्य' को ब्राहम्णवादी साहित्यकारों द्वारा हड़पने के कुप्रयास को दर्शाया गया है । तभी तो कहानीकार लिखता है - " जा के पैर ना फटे विवाई सो क्या जाने पीर पराई"। प्रो कुमार इस अवधारणा की पुष्टि सुप्रसिद्ध दलित चिंतक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने की है ।
कथाकार काशीनाथ सिंह की एक टिप्पणी - 'घोड़े पर लिखने के लिए घोड़ा होना जरुरी नहीं है' इसका प्रतियुत्तर वाल्मीकि ने कुछ यूँ दिया है - घोड़े को देख कर उसके बाह्य अंगों, उसकी दुलकी चाल, उसके पुठ्ठों, उसकी हिनहिनाहट पर ही लिख सकते हैं लेकिन दिन भर का थका हारा जब वह अस्तबल में भूखा प्यासा खूटें से बांधा होगा तब अपने मालिक के प्रति उसके मन में क्या भाव उठ रहे होंगे उसकी अंत:पीड़ा क्या होगी, इसे आप कैसे समझ पायेंगे ?
कथाकार की यह स्वानुभूति की कथा है जिसमें ' दलित साहित्य कौन लिख सकता' इस विषयक चिंतन पर विचार किया गया है अर्थात एक अदलित दलित साहित्य तो लिख सकता है किन्तु एक दलित की व्यथा और वेदना को ईमानदारीपूर्वक व्यक्त नहीं कर सकता है वस्तुतः' यह मात्र एक कथन ही नहीं एक नवीन चिंतन भी है ।
'स्वीकारोक्ति' कहानी के नायक 'रविप्रकाश' के अनुसार अदलित रचनाकारों को दलित लेखन की मनाही नहीं है किन्तु वह यह मानता है कि ब्राह्मणवादी विचार वाले लेखक यदि दलित लेखन करना ही चाहते हैं तो उन्होंने दलितों पर जो शारीरिक, मानसिक और आर्थिक अत्याचार किए हैं, दलितों पर जो जुल्म ढाए गए, यह भी सच्चाई से प्रकट करना चाहिए कि स्वयं उन्होंने दलितों के विकास में रोड़े अटकाए, इसकी भी स्वीकारोक्ति करनी है चाहिए ।
रवि प्रकाश दलित वर्ग के कुछ प्रतिभाओं का नाम भी गिनवाते है यथा- एकलव्य, फूले, बाबा साहेब, शैलेन्द्र, पीटी उषा आदि जो राष्ट्र को प्रगति और यश के मार्ग पर ले के गये । कथाकार जिस परिवर्तन की अपेक्षा करता है वह उसकी कहानी के अंतिम भाग में दृष्टिगोचर है। रवि प्रकाश के तर्कपूर्ण विचारों से रामखेलावन तिवारी नामक सवर्ण लेखक अत्यंत प्रभावित होता है और रामखेलावन एक लम्बी कहानी 'पश्चाताप' लिखता है जो 'उजाला' नामक पत्रिका में प्रकाशित होती है । इस कहानी में रामखेलावन तिवारी ने स्वयं इस सच्चाई के स्वयं उद्घाटित किया कि विश्वविद्यालय में कार्यरत एक दलित शिक्षक के कैरियर को चौपट करने के लिए बीस बर्षों से उनके द्वारा किस किस प्रकार के षड़यंत्र बने गए। उनके द्वारा बुने षड्यंत्र के कारण कई दलितों का गाँव जला दिए गए थे ।जाने कितने दलितों की जान गयी थी ।
कहानीकार के इस भावना को मुद्राराक्षस के शब्दों में समझा जाए कि -"सच यह है कि सवर्ण बुद्धिवादी की समूची करुणा में कहाँ सुराख रह जाता है और कहाँ वह अंततः करुणा से अधिक सामंती उदारता बन जाती है, यह सिर्फ दलित ही जान सकता है। यहां यह बात ज्यादा सही लगती है-उस घोड़े से पूछो लोहे का स्वाद जिसके मुँह में लगाम है। जो घोड़ा नहीं , घोड़े का सवार है और जो खुद लगाम थामता है, लगाम के बारे में उसका बयान अपनी सारी करुणा के बावजूद अधूरा रहता है। इसीलिए लगाम के स्वाद की पहचान जितनी कसैली और घाव करने वाली घोड़े को होती है, सवार को नहीं हो सकती है।
कथाकार ने रामखेलावन तिवारी की 'आत्महत्या' करने की बात को यहाँ दिखा कर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है की 'तिवारी जी' को अपने ही कुकृत्य से हीन इतनी शर्मिंदगी हो गई कि वे अपनी ही नज़र में गिर गये थे और दूसरे को अपना शर्मशार चेहरा दिखाने के बजाय अपनी जीवन के इहलीला को ही समाप्त करना ही उचित समझा। इस प्रकार उन्होंने 'आत्महत्या' का रास्ता चुना। रामखेलावन तिवारी की आत्महत्या पूर्णतया पाश्चपात से प्रेरित था इसलिए यह आत्महत्या समाजशास्त्री दुर्खीम की पुस्तक 'सुसाइड' में वर्णित चार आत्महत्याएँ यथा, अहंवादी, परार्थवादी, प्रतिमानवादी या भाग्यवादी आत्महत्या से सर्वथा इतर है। दरअसल इस आत्महत्या को कथाकार ने ब्राह्मणवाद की समाप्ति के प्रतीक के रूप में रखता है जो सामाजिक समानता के आवश्यक शर्त है।
यहाँ कथाकार दलितों के त्रासदीपूर्ण जीवन और बदहाली, उनके साथ अमानवीय व्यवहार, असमानता, छुआछूत और तमाम दुखों को रामखेलावन तिवारी के माध्यम से समस्त अदलित लेखकों को स्वीकार करने का आग्रह रखता है । कथाकार 'रामखेलावन तिवारी ' के अन्दर के ब्राह्मणवाद की हत्या का पक्षधर है वह चाहता है अदलित लेखक ब्राह्मणवाद के अभिजात्यपन से बाहर आकार मानववाद की धरातल पर चिंतन करे ।
कथाकार प्रो.कुमार के कहानियों की विशेषता है कि वे अपनी कहानियों में पात्रों के नाम का चुनाव व स्थान के नाम के चयन में बहुत ही सजग रहते हैं। उनके चरित्रों के नाम साधारण नहीं हैं वे प्रतीकात्मक होते है जो जाति, विचारधारा, व्यक्ति और उसकी मानसिकता को उजागर करते हैं। उदाहरणस्वरूप देखें- बमनपुरा में अम्बेडकर भवन, यानि इस देश में जातीय व्यवस्था से बने समाज में ब्राह्मणों की बस्ती में अम्बेडकर भवन की कल्पना सचमुच एक दलित कथाकार के समानतावादी समाज के परिकल्पना का द्योतक है।कहानीकार ने 'स्वीकारोक्ति' कहानी में पात्रों के नाम का चयन बड़ी ही सजीवता से की है। पूरी कहानी मानस पटल पर चलचित्र के भांति चलती रहती है।
दलित साहित्य सम्मेलन में भाग लेने आये लोगों के नाम के माध्यम से कहानीकार सामाजिक और राजनीतिक ताने बाने को समझाने का प्रयत्न किया है। जैसे, रामखेलावन तिवारी, रामखेलावन शब्द इतना मारक है कि देश इधर 30 वर्षों से राम का राजनीतिकरण किया जा रहा है। जैसे इस देश में पिछड़ों-वंचितों को मंडल आयोग के माध्यम से सरकारी नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था की गई उसे काटने के लिए कमंडल यानि राम जन्मभूमि के माध्यम से राम का राजनीतिकरण किया गया और बहुजन समाज को फिर बड़ी चालाकी से गुमराह किया गया। राम को खेलाने का काम अब भी बखूबी चल रहा है जिसके सूत्रधार ब्राह्मणवादी लोग ही है और यहां रामखेलावन उसी ब्राह्मणवादी समाज के प्रतीक के रूप में कहानी में उपस्थित है। कहानीकार ने लैम्पून का मारक प्रयोग किया है।
कुछ और भी चरित्र हैं जैसे, बजरंगी शर्मा, सतना राय, चुमकी पालीवाल ये सभी सवर्ण समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे है पर दलित चेतना सम्मेलन में दलित प्रतिनिधि का हकमारी करते है जैसा कि सामाजिक क्षेत्र में शुरू से होता आया है कि अवसर को अपने तक सीमित रखने के लिए तरह तरह के हथकंडे सवर्ण समाज करता है। इसी षड्यंत्र का खुलासा है कहानी स्वीकारोक्ति।
परन्तु कहानी का प्रोटागोनिस्ट 'रवि प्रकाश' का नाम दलित वैचारिकी की दिशा निश्चित करता है जिसमें बुद्ध, कबीर, रैदास, फुले और अंबडेकर की विचारधारा प्रवाहित है। रवि की प्रकाश की तरह तीक्ष्ण और व्यवहारिक व्यक्तित्व है रवि प्रकाश। कहानीकार ने रवि प्रकाश के चरित्र को उद्दात्त बनाया है जैसा कि अरस्तू भी नायक को परिभाषित करते है। रवि प्रकाश बुद्ध के मूल विचार'अत्त दीपो भव' यानि 'अपना प्रकाश स्वयं बनो' इस सूत्र को मानने वाला है।
यहां दो बातें उधृत करना आवश्यक है। इस कहानी में जैसे चरित्रों के नाम के पीछे एक सांकेतिक विचार है जो अन्यायपूर्ण व्यवस्था का प्रतिरोध करता है वैसे ही इस कहानी में 'पाश्चपात' कहानी की चर्चा है जो 'उजाला' नामक पत्रिका में छपती है। राम खेलावन तिवारी अपने विश्वविद्यालय के सहकर्मी दलित शिक्षक प्रकाश गौतम के कैरियर को खराब करने के लिए अनेक युक्तियों का प्रयोग किया है और उसे चौपट करने का पूरा षड्यंत्र किया जिसका उद्घाटन वह 'उजाला' में करता है। यहां कहानीकार एक स्याह मन को ज्ञानपुंज से आलोकित करता है और इस उजाले में रामखेलावन तिवारी अपनी समस्त बुराइयों को उल्लेखित करता है।
अत: स्वीकारोक्ति (कंफेशन) नामक इस कहानी में कहानीकार ने परम्परागत दलित साहित्य में अभिव्यक्त वेदना, अपमान और यातना सहने वाले समूह से व्यथा कथा नहीं कहलवाते वरन उस सवर्ण समाज से स्वीकार कराते हैं कि कैसे उन्होंने दलितों पर जुल्म किये और उनको सामाजिक षडयंत्रों के द्वारा हासिये पर धकेल दिया, उनकी बस्तियों को आग लगाया, सरे आम बेइज्जती की, लूट मचाई, बलात्कार जैसे जघन्य अपराध किये, साथ ही कोई दलित पढ़-लिख कर नौकरी या विश्वविद्यालय में अध्यापन हेतु आया तो उसे हरेक अवसर से वंचित रखने के लिए कौन कौन से हथकंडे अपनाए ।
'कंफेशन' शब्द यहां दोष स्वीकृति, पाप स्वीकृति या अपराध स्वीकारोक्ति के तौर पर प्रयुक्त है। जैसा कि रोमन कैथोलिक चर्च में एक संस्कार (sacrament) के अंर्तगत कोई व्यक्ति प्रीस्ट के सामने अपनी गुनाह की दोष भावना से मुक्ति हेतु कंफेशन करता है।
कहना ना होगा कि बहुत कठिन होता है अपनी गलतियों पर कंफेशन करना और वह भी जब जघन्य अपराध हो तो कंफेशन और भी कठिन होता है, किंतु हमारे यहां अँगुलीमाल उदाहरण है कंफेशन या स्वीकारोक्ति का, लेकिन सभी कोई अंगुलीमाल नहीं हो सकते।
प्रो कुमार की कहानी कंफेशन दुनिया में उस नाम से दूसरी कहनी है जो भारत में दो विचारधाराओं के संघर्ष की गाथा को प्रस्तुत करती है।
सचमुच (कॉन्फेशन) स्वीकारोक्ति दलित चेतना की एक सफल कहानी है जो मानवतावादी विचारों को सम्पोषित करती है और यह सदा के लिए इस बहस को समाप्त करने में सफल है कि दलित साहित्य की रचना दलित ही कर सकते हैं अदलित नहीं, जैसा कि मैनेजर पांडेय ठीक ही लिखते हैं कि राख ही जानती है जलने का दर्द, दलित होने की पीड़ा दलित ही जानता है।
समीक्षक -संतोष कुमार

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