कोमल भारती गुप्ता की पाँच कविताएँ

[कोमल भारती  गुप्ता] 



 [ कोमल की कविताएँ सृजन के तलाश की कविताएँ हैं l वे प्रति क्षण सृजन की आग्रही हैं l उनके यहाँ सृजन के साथ कस्मसाहट जिस आवेग  के साथ आता है ,वह अधिक देर तक नहीं रह पाता l  अकेलापन, निराशा ,जीवन की तीक्ष्ण छटपटाहट और बाज़ार उन पर हावी नहीं होता l बल्कि अपनी कविताओं से उसका क्रिटीक रचती हैं और सघन जीवन के अनुभवों को नए सन्दर्भ में खोलने का प्रयास करती हैं l  वे समानता की पक्षधर हैं l लैंगिकभेद की पूर्वाग्रही नहीं...]



        1.


तुम चले तो गए
पर
ये होंठों पर तुम्हारी
गरमाहट का एहसास रह गया
ये मेरी बाहों में बैठा तुम्हारा सुकून रह गया
ये मेरी गोद में तुम्हारे रखे सर का हल्कापन रह गया
ये मेरी जुल्फों का बिखरने पर तुम्हारे समेटने का निशान रह गया,
ये मेरी उंगलियों में तुम्हारी उंगलियों का स्पर्श रह गया
ये हथेलियों में हमारे साथ का भविष्य रह गया
ये मेरे पैरों में चुभ आया कंकड़,
तुम्हारे हाथों से निकालना रह गया
ये तुम्हारे पास चल के आने का एहसास रह गया
तुमसे मिलने की कसक रह गई
ये चादर पर हमारी पड़ती सिलवटें रह गई
ये मेरी बालियों का तुम्हारी उंगलियों से छूने का एहसास रह गया,
तुम्हारे देखने पर मेरी आँखों का झुकना रह गया
ये मेरे चिल्लाने पर तुम्हारा झुकना रह गया
यूं तुम्हारे डाँटने पर मेरा रोना रह गया
ये तुम्हारे साथ निभाने का वादा रह गया
ये हमारे साथ होने का एहसास रह गया।

       

         2.


हमारे बीच
अल्फ़ाज़ नही है
शायद
ये एक-दूसरे की
साँसें सुन लेने के लिए
बातें करते है हम
कई दफ़ा
अल्फ़ाज़
उतने जरूरी भी हो
मुझे महसूस ही नही होता
लेकिन तुम्हारे होंठो से
अपने लिए
कुछ अल्फ़ाज़ सुन लेने के लिए
बैचैन हो जाती हूँ
हमारे दरमियाँ
ये जो सांसों और धड़कनों की डोर है न
बस यही है
हमारे बीच के गहरे अल्फ़ाज़
जिनमें शब्द नही
एक कसक
बैचैनी
और
मोहब्बत है।


            3 .


बाज़ार, जो हमें आज़ाद नहीं होने देता।
आ-जा-दी
अगर आ-जा-ती
तो कैसे और किस रूप में
कहते है आजादी हम सबकी होती है
पर
जो आजादी बिक रही है
बाज़ार में
वो किस की है
कौन बंधा है इससे
और
कितने अपने ही लोग बंधे है इससे
आजादी है क्या
किन मायनों में ये आज़ाद है
आजादी अब वो
तीन रंगों में सिमटा
तिरंगे का रंग है
जो रह-रह कर याद कराता है
तुम आजाद नही हों
खुद से,
बाज़ार से,
भौतिक सुखों से,
रिश्तों में,
राजनैतिक विचारों से,
तुम बंध गए हों
सिमट गए हों
वो आजादी के तीन रंगों के झंडों में
जो लहराता है
२६जनवरी और १५अगस्त पर
तेज चलती बाइकों पर,
किसी के ऑटो पर,
किसी की तेज रफ़्तार कार में,
पर देखों, तुम वहाँ भी बंधे हों
आज़ाद नहीं हों
आज़ादी अगर आ-जा-ती
तो तुम आज़ाद दिखाई देते
पर अफ़सोस तुम बंधे हों
हर रूप में,
हर बाज़ार में,
तिरंगे के तीन रंगों में,
पतंगों में,
लोगो की बातों में,
आज़ादी अपनी थी
पर वो बाज़ार की है
जो तुम्हें बांधती है
बाज़ार के बड़े ब्रांडों में
उन पर लगी आकर्षक सेलों में
तुम बंधे हों बेहतर सोचने के लिए,
बेहतर कर लेने के लिए
आ-ज़ा-दी अगर आ-जा-ती
तो हम भी आज़ाद होते इस भीड़ में।

        

            4 . 


पुरुष का पौरुषत्व
उसे दृढ़ बने रहने देना चाहता हैं
वो रोना चाहता हैं फूट कर
बहुत बार हारता हैं
पर उसका पौरुषत्व
उसे दृढ़ बनाता हैं
वो झुकना चाहता हैं
कई बार
मांगना चाहता हैं
माफियां
कई स्त्रियों से
पर उसका
पौरुषत्व आड़े आता हैं उसके
जो उसे झुकने नहीं देता
टूटने नहीं देता
पिघलने नहीं देता
रोने नहीं देता
वो अपनी बनी बनावट पर
कई बार धिक्कारना चाहता हैं
पर फिर थक हार कर
अपनी बनी बनावट से संतोष पाता हैं
और न जाने कितनी ही बार वो रोता होगा
अंधेरे में
ताकि देख न ले
कोई उसके पौरुषत्व
का ये फीका चेहरा
अगर देखेगा कोई तो
उसके पौरुषत्व का उड़ेगा मज़ाक
इसलिए
एक मर्द के आँसू महज आंसू नहीं होते है
उनके पीछे छुपी कई वर्षों की
वेदना का गहन भण्डार होता है
जिसे वो आंसुओ के सहारे
निकाल लेने की असफल कोशिश करता है
पुरुष ने अपने हृदय को हल्का कर लेने का सुख
नहीं पाया
वो क्रूर  हैं हिंसात्मक हैं
पर वो
पुरुष हैं
जो रोना चाहता हैं।
हम स्त्रियों ने मर्दो से आंसू बहाने का सबसे बड़ा सुख छीन लिया है
जिसके रहते वो सिर्फ और सिर्फ घुटता है पर रोता नही है

रोना सबसे बेहतर इलाज है
मनुष्य की घुटन का
    
     

      5.


[कुछ बिखरे,कुछ उदास ]

ये जो है उदास
ये जो ग़मगीन है
टूट कर बरसे है
उदास ही नही, कुछ खुश भी है
कुछ उलझे है, कुछ सुलझे है
कुछ है मस्त, कुछ है परस्त
कुछ है खोए, कुछ जागे है
कुछ ठिठक कर भागे है,
कुछ जाने क्या खोज रहे
कुछ जाने क्या पाएं है,
ये जो टूट कर गिरे है
कुछ भागे है कुछ ठहरे है
कुछ है ख्यालों में ग़ुम से
कुछ बस अभी ख्वाब से जागे है,
कुछ मग्न है धुनों में अपनी
कुछ है ग़म की परछाई में,
कुछ है बेबाक
कुछ है बिखरें
कुछ है सिमटे
कुछ है बावले
कुछ ग़ुम से है
कुछ चुप से है
ये सब जो यहाँ पड़े हुए
कुछ है उदास
टूट कर बरसे है।

-कोमल भारती गुप्ता युवा कवयित्री हैं l हाल ही में इनका कविता संग्रह ''मेरा स्त्री विमर्श '' प्रकाशित हुआ है l 

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