तालिब हुसैन 'रहबर' की पाँच कविताएँ


 [ तालिब हुसैन युवा रचनाकार  हैं l उनकी कविताओं को पढ़ते हुए कहीं भी यह महसूस नहीं होता कि वे हमें कविता की  किसी  ऐसी दुनिया में ले जाते हैं जहाँ से आम व्यक्ति का अनुभव कविता के  कलात्मक दरवाज़े के भीतर कहीं खो जाता है l वे आम जन जीवन के अनुभवों को, उसकी दिनचर्या को अपनी कविता का विषय बनाते हैं l वे प्रश्नाकूलता  के रचनाकार हैं l वे सत्ता से, उसकी व्यवस्था से सवाल करते हैं l और कहीं-कहीं वह स्वयं से ...]

तालिब हुसैन 'रहबर'

1
 रात को थक हार कर
जब जाता हूँ घर की ओर
तो मिलते हैं
आसमान की चादर ओढ़े
जमीन की गोद में
लेटे हुए 
कुछ कहे अनकहे किस्से
जिनकी फटी एड़ियाँ
 और
पनियाई आंखें करती है बयां 
उनकी आपबीती 
नहीं उनका अनुभव
वहीं थोड़ी दूर
मेट्रो की सीढ़ियों के नीचे
बैठा है 
नौ दस साल का "भविष्य"
ओढ़े किसी परोपकारी की उतरन
दो पल ठहर कर
सोचता हूँ
क्या नहीं आती इन्हें
पास की दीवार से पेशाब की बदबू
क्या नहीं खाती रात की सर्दी इन्हें
क्या नहीं लगता इन्हें डर
फुटपाथ पर सोने का
क्या नहीं खाता सन्नाटा इन्हें अंदर से
बन पाथेय
ये सवाल चले आते हैं मेरे साथ
मेरे अंदर
और देते रहते हैं
दस्तक़ 
करते रहते हैं सवाल
क्या करोगे वह वादे पूरे
जिनसे जलता है तुम्हारा चूल्हा????



    2
सड़क सन्नाटे की गोद में 
झूल रही है झूला;
चंद सवारियों को 
अपने आँचल में छिपा कर 
बस पहुँचा रही है उन्हें 
उनके गंतव्य तक,
सूरज भी ऊब रहा है 
पता नहीं किन गहन  विचारों में
डूब रहा है....
पास ही पेड़ पर
नम  आँखें भरे
सुस्त लेटे हैं बंदर
सुबह देर से उठकर 
बिस्तर पर ही 
आराम फरमा रहे हैं लोग
सवारी की तलाश में
माधव खाली रिक्शे को लेकर
लगा रहा है सड़कों के चक्कर
शायद देना होगा 
उसे रिक्शे का किराया
वहीं थोड़ी दूर 
एक चालीस-पैंतालीस साल का पकोड़ी वाला 
समेट रहा है बिन बोनी के ही अपना ठेला
न जाने क्या करेगा ?
वह इन पकौड़ियों और बेसन का
न चाय की दुकान पर
 लगा है जमावड़ा```````
हवाओं के साथ
मंद मंद बहती आ रही है
कहीं से 
देशभक्ति गीतों की आवाज़
ओह्ह....! 
आज आज़ादी का दिन है
नहीं
आज राष्टीय दिन है
नहीं
आज राष्ट्रीय अवकाश है।
        3
 आना होगा 
कविता को सड़कों पर!

तपती धूप और कड़कड़ाती  बारिशों  में
कभी किसी बच्चे की हठ में
तो किसी बुजुर्ग के अनुभव में
किसी जवान के लहू में
किसी नारी के अंगार भरते आँसुओ में
जंतर-मंतर की सड़कों पर
रामलीला मैदान में
संसद के घेराव में
माशूक़-माशूकाओं के किस्सों को छोड़कर
आमरण अनशन के लिए
आना होगा 
कविता को सड़कों पर!
बसंती फूलों को छोड़कर
भवरों-कलियों से मुंह मोड़कर
हृदय के सजीले बंधनो को तोड़कर
अपनी भूख के हिसाब के लिए
26 जनवरी की मोटी किताब के लिए
एक विराट सत्याग्रह के लिए
आना होगा
कविता को सड़कों पर
भिड़ना होगा सत्ता के षडयंत्रों से
खानी होगी निरापराध लाठियाँ
और हो सकता है
जाना भी पड़े जेल...
हो सकता है कहलाओ तुम
देशद्रोही 
या किये जाओ 
नज़रबंद
हो सकता है धर्म के नाम पर
तुम्हे दिए जाएं अल्टीमेटम
पर
तुम्हें डगमगाना नहीं है
तुम्हें लड़ना है अपने अस्तित्व के लिए
लगाने होंगे नारे
टूटती-बिखरती पुकारों को
जनाक्रोश में बदलने के लिए
एक बार पुनः
राजनीति के आगे
चलने वाली मशाल बनने के लिए
आना होगा 
कविता को सड़कों पर......

    4  
आज शब्द राजभक्त हैं
नीले- लाल और न जाने
कितने ही रंग के
 शब्द 
ढो रहे हैं अपना अनिर्वचनीय  सत्य
कुछ शब्द घायल है ; रुदन से भर कर
मौन  ; देख रहे हैं तमाशा''''
कुछ पहन सभ्य चोला
हाथ में लिए 
लोकतंत्र का चौथा खम्बा
कर रहे हैं वध सत्य का
वहीँ कुछ दूर शब्द मना रहे हैं मातम
फसल के मर जाने का
कुछ भेज रहे हैं शब्द मुआवजे का
कुछ शब्द कर रहे हैं सवाल 
पेड़ पर लटके रस्सी के फंदों में
कुछ ने चुप्पी तोड़ने की 
कि है हिम्मत
पर
अकस्मात् कुचले गये हैं कुछ शब्द
निरापराध
कुछ शब्द आसमान को ओढ़ 
धधकती धरती पर
रख कर बैठे हैं सपने
कुछ शब्द बन बसंत आने को तैयार है
मारीच की तरह 
कुछ शब्द बनने वाले हैं 
किसी नये लकड़ी के रावण के नारे
कुछ शब्द दे रहे  हैं दस्तक 
दोहरे रंग का खेल खेलने को ......
मैं सोचता हूँ
क्या शब्द भी होंगे कभी वाणी
क्या कहेंगे यह भी आक्रोश की भाषा
कुछ भी हो 
पर 
आज शब्द राजभक्त हैं..............

     5
 "भगवान तुम्हें खुश रखे"
बहूत सुकून मिलता है
जब अपनी भूख का खाना
किसी और के होठों की मुस्कुराहट बनता है
ऐसा लगता है मानो इंद्रधनुष के सातों रंग
उतर आए हों उसकी आँखों में
वो तीन रोटियां
बन जाती हैं उसके लिए
'ब्रह्मा -विष्णु-महेश'
रोटियों को अपने हाथों से मीस कर
देखता है
मन्दिर में विराजमान कृष्ण की प्रतिमा को
और फिर एकटक देखता है
मेरी दाढ़ी और कुर्ते को
अपने दोनों हाथों के संसार को फैलाते हुए
कहता है
भगवान तुम्हे खुश रखे
रोटियों को खाते हुए वह भूल जाता है इंसानी फितरत
नहीं देखता रोटियों में मुसलमानी हरा रंग
नहीं सेंकता वह धर्म के चूल्हे पर रोटियां
वह देखता है
भूख का, रोटी का और दया का
बस एक धर्म है
मनुष्यता-परोपकार और सद्भाव!

-       तालिब हुसैन रहबर
          हिंदी विभाग 
जामिया मिल्लिया इस्लामिया


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