ज्वालामुखी के मुहाने : संस्थानीकरण पर एक बहस
ज्वालामुखी के मुहाने : संस्थानीकरण पर
एक बहस
सुशील द्विवेदी
शोध-छात्र (जामिया मिल्लिया इस्लामिया)
केन्द्रीय विश्वविद्यालय
मलखान सिंह सहज संवादी रचनाकार हैं। वह अपने समय और समाज से संवाद करते चलते हैं।
संवाद के समय वह विवेकशून्य नहीं होते और न किसी गढ़ी गई परिपाटी पर चलना पसन्द करते
हैं। इस नाते मलखान सिंह अपनी ओर अधिक आकर्षित करते हैं। इनका ‘‘ज्वालामुखी के मुहाने’’ (2016) कविता संग्रह संस्थाओं के पुनर्विचार का संग्रह है। इस संग्रह
में मलखान सिंह संस्थानीकरण के दुर्ग को ढहाते चलते हैं। फिर एक नया दुर्ग बनाते हैं।
इसी संग्रह में ‘ज्वालामुखी के ‘‘मुहाने’’ एक छोटी कविता है। कविता संस्थान-निर्माताओं के मदमयता को तोड़ती
है। कविता का अंतिम बंद महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें ‘‘ज्वालामुखी’’ विधि अधीनस्थ लोगों की आत्मबल और ऊर्जा का प्रतीक है जबकि ‘‘मुहाना’’ संस्थानों से बाहर निकलने वाला द्वार है। जहाँ स्वच्छदता है,
आज़ादी है, बंधुत्व है, समानता है, आनन्द है। विधि निर्माता अपने बनाय गये नियमों से इस मुहाने
को रोकता है। इस प्रक्रिया से गुजरते समय कई बार उसके अहं पर धक्का लगता है। वह विवेक
शून्य हो जाता है। मलखान सिंह इस समूची प्रक्रिया के पारखी हैं।
मदान्त ब्राह्मण
धरती को नरक बनाने से पहले
यह तो सोच लिया होता
कि ज्वालामुखी के मुहाने
कोई पाट सका है
जाति कोई संरचना नहीं है। यह कुछ लोगों द्वारा चलायी गई एक संस्था है;
जिसमें एक विशेष वर्ग द्वारा शेष वर्गों के लिये एक कानून बनाया
जाता है। जिस समुदाय के लिये यह कानून बनाया जाता है;
वह समुदाय विधि निर्माताओं के अधीन रहकर जीविकोपार्जन करता है।
जीवन जीने के लिए यह विधि अधीन समुदाय लगातार संघर्ष करता है;
परन्तु वह जीवन जीता नहीं, जीवन का भार वहन करता है। विधि निर्माता जीवन का भोक्ता है।
वह जीवन का आनन्द लेता है। इस प्रकार से यह संस्था जीवन में भी दो टाइप पैदा करती है।
एक वह टाइप जो जीवन का भार वहन करता है, जीवन का दास बनता है। इस स्थिति में जीवन का भार वहन करने वाले
समुदाय विधि निर्माताओ का भी दास बन जाता है और उसकी स्थिति ‘‘दासों के दास’’ के अनुरूप हो जाती है। ‘‘मलखान सिंह’’ की कविता विधि अधीन समुदाय के अस्तित्त्व के संकट की पहचान करती
है। ‘‘आखिर कब तक’’ कविता अस्तित्त्व के संकट की कविता है। विधिनिर्माताओं द्वारा
प्रयुक्त शब्दावली की कविता है। इस शब्दावली का ज्ञान विधिनिर्माताओं को जन्मजात होता
है। दूसरे शब्दों मे कहें- अपमान सूचक तथा अस्तित्त्व के संकट को सृजित करने वाली शब्दावली
का ज्ञान विधि निर्माता को जन्मजात मिलता है। जिसे वह जीवन भर प्रयोग में लाता है।
‘‘आखिर कब तक’’ कविता मे दो बंद है।
दूसरा बंद इस सन्दर्भ में अधिक महत्वपूर्ण है। वहाँ चमार,
धोबी, खटिक, जुलाहा, नाउ, लोध, तेली कोई जाति नहीं हैं। बल्कि जाति नामक संस्था में काम करने
वाले समुदाय हैं। इन समुदायों को विधि निर्माता उनके पेशे से जोड़कर अपमान सूचक- शब्दावली
के माध्यम से संबोधित करता है और उनके अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। ‘‘मलखान सिंह’’ इस समुदाय के अस्तित्त्व की पहचान करते हैं-
ओ! चमट्टे
ओ! चूहड़े
धोबड़े- खटीकरे,
जुलहट्टे
लोधड़े कछट्टे,
मलहट्टे
तेली,
तमोली, भिस्ती, सक्के
बजूद को हिला देने वाले स्वर
दूर तक पीछा करते हैं
और हम-
नाक की सीध में
सधे पाँव
सधी सांस
ऐसे बढ़े चलते हैं
जैसे टोपी हमारी नहीं
दूसरे की उछाली जा रही है।[2]
इसके अतिरिक्त ‘‘मलखान सिंह की एक अन्य कविता है ‘‘विषवृक्ष’’। विषवृक्ष का अगर हम मतलब खोजें तो हमें वनस्पति विज्ञान के
सहारे धतूरा, भटकटैया इत्यादि पौधों तक पहुँचना होगा। इन पौधों के खाने से किसी की भी मृत्यु
हो सकती है। इसी तरह का ‘‘विषवृक्ष’’ सामाजिक संरचनाओं के निर्मिति के समय उत्पन्न हुआ जो अब तक विद्यमान
है। यह सामाजिक- विषवृक्ष स्त्री, दलित, आदिवासी समुदायों को तोड़कर उसमें हीनता,
कटुता, दुर्बलता, दरिद्रता जैसे मनोविकारों को भरता है। इन मनोविकारों की वज़ह
इन समुदायों में शक्तिशाली सत्ता से लड़ने की इच्छा शक्ति (will power) कम हो जाती है। 'बंकिचन्द्र चटर्जी' (विषवृक्ष : उपन्यास) तथा सावरकर
बन्धु (विषवृक्ष : इतिहास) को छोड़कर ‘‘मलखान सिंह’ हिन्दी साहित्य के एक मात्र रचनाकार हैं जिन्होंने इस शब्द पर
ध्यान दिया है। ‘‘विषवृक्ष’’ कविता में मूलतः तीन बंद है। पहला बंद उस समुदाय से संबंधित
है जो ‘‘विषवृ़क्ष’’ के कारण विकसित नहीं हो पाता। इस बंद में कुल चार महत्वपूर्ण
वाक्य हैं- दृढ़ इच्छाशक्ति का विकसित होना, भाग्य का मरना/अंधेरों का मारना,
गलियों का पहाड़ होना तथा गलियों का घुटनों तक सिमट आना। अंधेरा
मरता नहीं है, व्यक्ति मरता है, इच्छा शक्ति मरती है। अंधेरा छटता है। गली अपने-आप में पहाड़
नहीं होती। मन में दुर्बल शक्तियाँ ही किसी वस्तु को भी कठिन बना देती हैं तथा गलियों
के घुटने तक सिमटने का आशय दुर्बलशक्तियों के विरूद्ध खड़ी दृढ़ इच्छाशक्ति से है जो
समूची विषवृक्ष परम्परा को चुनौती देती है। शेष दो बंद पहले बंद के सहारे समझे जा सकते
हैं-
जिस दिन हम
समर्पित होते हैं संकल्प के प्रति
भाग्य मर जाता है
मर जाते हैं अंधेरे
जंजीरें टूटनी ही थी
टूटती हैं बिखर जाती हैं
गाँव की कुलीन गलियाँ
जे पहाड़ लगा करती थीं
घुटनों तक सिमत आती हैं[3]
मूर्तिमान ईश्वर का निर्माण सामाजिक संस्थाओं के साथ हुआ है। कल्पना कीजिये
प्राक् ऐतिहासिक काल में मनुष्य जब प्राकृतिक आपदाओं से घिरा हुआ था तब उसने क्या किया
होगा? कन्दराओं में छिपने की कोशिश की होगी, कई दिनों तक भूखा रहा होगा और अंततः उसी प्रकृति के सामने गिड़गिड़ाया
होगा। उसके मन में एक अदृश्य सत्ता का भय सताता रहा होगा। मूर्तिमान ईश्वर के साथ ऐसा
कुछ भी नहीं है। सामान्य व्यक्ति की तरह उसके पास भी उतनी ही शक्ति है जितनी शक्ति
सामान्य व्यक्ति के पास है। लेकिन वह एक विशेष वर्ग के साथ रहता है। उसका मुखिया होता
है। सामाजिक संस्थाओं के विधि निर्माता ने इस ईश्वर का प्रशस्तिगान कर समूचे समाज में
भय को सृजित किया और इस ईश्वर का भय लगातार सामान्य व्यक्ति को सताता रहा। सुरा-सुन्दरी
का सेवन करने वाले को "सुर" कहा गया तथा सुरा-सुन्दरी का सेवन न करने वाले
को ‘‘असुर’’। इस प्रकार से समाज दो वर्गों में बाँट गया। विधि निर्माताओं
का वर्ग और विधि अधीनस्थ वर्ग। एक था ‘सुर’ दूसरा ‘‘असुर’’। ‘‘सुर-’’और ‘‘असुर’’ के संघर्ष की गाथा धर्मग्रन्थों में खूब पसरी पड़ी है और टीकाकारों
ने अपने-अपने तरह खूब व्याख्याएँ की है और ‘‘असुरों’’ को खूब गालियाँ दी गई । इन्हीं टीकाकारों को पढ़कर समाज का नया
ढ़र्रा बनता चला गया।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अस्तित्त्ववदियों (विशेषकर नीत्से) इसकी जाँच पड़ताल
करना शुरू किया और पाया कि जिस ईश्वर ही हम चर्चा करते हैं,
वह वास्तव में है ही नहीं। ‘‘मलखान सिंह’’ ‘‘अज्ञेय के बाद अकेले ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने यह घोषित किया
कि ‘‘ईश्वर नहीं हैं’’। इस सन्दर्भ में ‘‘ईश्वर उसी दिन मर गया था’’ इनकी महत्वपूर्ण कविता है। इस कविता में ‘ईश्वर नहीं है’। इस सन्दर्भ में ‘‘ईश्वर उसी दिन मार गया था’’ इनकी महत्त्पूर्ण कविता है। इस कविता में ‘ईश्वर’ और ‘आदम’ एक ही माँ से उत्पन्न दो संताने हैं। प्रारम्भ में ईश्वर और
आदम एक दूसरे के प्रति सहिष्णु दिखाई देते हैं। बाद मे ईश्वर आदम पर अधिकार जताना शुरू
करता है और धीरे-धीरे उसे दास बना लेता है। पूरी कविता प्रतीकात्मक है। अगर हम ईश्वर
को गुण और आदम को अवगुण मान लें तो पूरी कविता मेटाफ़िजिकल (तत्त्वमीमांसी) नजर आयेगी।
लेकिन ईश्वर को विधि निर्माता वर्ग तथा आदम को विधि अधीनस्थ वर्ग मान ले,
तो पूरी कविता जातिगत संरचना पर टिक जाती है। बहरहाल कविता अपनी
संरचना में परिवेश के तनाव के साथ-साथ सहृदयता के अभाव का खण्डन कर प्रकृति के सतत
परिवर्तन के नियम का निर्वाहन करती है-
ईश्वर उसी दिन मर गया था
जिस दिन आदम ने
यह जान लिया था
सृष्टि का जनक,
पालक, संहारक
ईश्वर नामधारी कोई
पुरूष या स्त्री नहीं
धरती के गर्भ में छुपा
सतत परिवर्तन का नियम है
जो कार्य- कारण की अटूट
श्रृंखला में गुँथी
अतुल ऊर्जा से संचालित है
यही सत्य है,
नित्य है
‘नियतिवाद’ का सिद्धान्त’ कर्म के सिद्धान्त’ होने का भ्रम पैदा करता है। ‘प्रारब्ध, संचित’ और ‘क्रियमाण’ इस भ्रम को सुजित करने का हथियार है। यह वास्तव में मनुष्य के
मनोविज्ञान को कमजोर करने की जड़ है। इससे व्यक्ति के मनोभावों का क्षरण होता है। और
"ऐसा भाग्य में लिखा है" या "हम जैसे कर्म करेंगे वैसे ही होंगे" को उत्पन्न
कर हमें कमजोर करता है। सामाजिक संस्थाओं के निर्माण के साथ ही विविध निर्माता ने विधि
अधीनस्थ व्यक्तिओं को नियंत्रित करने के लिये’ नियतिवाद’’ और ‘‘पुरूषार्थ’’ नामक दो महत्त्वपूर्ण नियम बनाया और मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर
करने की भरपूर कोशिश की। ‘‘मलखान सिंह’’ की कविता शास्त्रों नियतिवाद के सिध्दान्त का विरोध करती है।
‘‘यह कैसा महाआख्यान’’ नियतिवाद के विरोध की एक लम्बी कविता है। पूरी कविता में तीन
महत्त्वपूर्ण आयाम हैं। ‘ताऊ की ग्रामीण बजबजाती स्थिति’
‘नियतिवादी सिद्धान्तकारों की
स्थिति’
और महात्मा गाँधी के सतसंग के समय गाया जाने वाला ‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिये’’ गीत। ये तीनों स्थितियाँ भारत निर्माण (1947 ई.) से जोड़ने का भी काम करती हैं। ताऊ का होश में आना आज़ादी
के बाद की स्थिति है। जिसमें आज़ादी का सपना दिखाकर विधि अधीनस्थ जनता को भरमाया गया।
उदाहरण-
आत्मा अजर है- अमर है
न जन्म लेती है न मरती है
इस मिथ्या संसार में
तू कर्म करता चल
मुझे अर्पित करना चला
कैसा महाआख्यान?
मुक्ति के नाम पर जो
बनाता विवेक-शून्य
कैसेट बदलती है
बदलते हैं स्वर भोंपू के
वैष्णव जन तो तेने कहिये
होश आते ही ताऊ
उठता है धरती से
-------------
उठाता है फावड़ा
नई स्फूर्ति
मलखान सिंह की कविता राष्ट्रवाद का भी विरोध करती है। परन्तु इनके यहाँ राष्ट्रवाद
सिद्धान्त के रूप में न दिखाई देकर व्यवहार के रूप में दिखाई देता है। इस स्थिति में
‘‘मलखान सिंह’’ महात्मा गाँधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर के राष्ट्रवादी अवधारणा
के काफी नजदीक पहुँचते हैं। ‘‘कैसा उदारवाद" यह कविता में इसी राष्ट्रवाद की अवहेलना
की गई है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के ‘‘गोरा’’ उपन्यास की तरह सामाजिक संस्थाओं और पिछड़ेपन की कटु आलोचना इस
कविता में है। शिक्षा, चिकित्सा, बाजार ये तीनों ही शक्तिशाली सत्ता के हाथ में होने के कारण
उनके मन मुताविक चल रहा है। कविता दो अर्थी है- पहला अगर हम राष्ट्रवाद के नजरिये से
देखें तो इसमें राष्ट्रवाद की आलोचना है। दूसरा
अगर हम मार्क्सवादी सिद्धान्त के नजरिये से देखें तो पूरी कविता दो वर्गों में
विभक्त दिखाई देती है।
उदाहरण-
आज!
देश की शिक्षा
देश की चिकित्सा
देश के बाजार
आकाश-पाताल
धरती की कोख तक
नगर के चैराहे पर
बिकने वालों की
इतनी भीड़ है कि
पाँव रखने की जगह नहीं
गाँव बंजर हो गये हैं।
हम सिमान पर खड़े
अब प्रश्न उठता है कि क्या ‘‘मलखान सिंह’’ की कविता केवल विरोध की कविता है। परन्तु ‘‘ज्वालामुखी के मुहाने’’ खँगालने के बाद हम पाते हैं कि केवल विरोध की कविता समाधान के
बजाए समस्याओं को जटिल बनाती है। ‘मलखान सिंह’ की चेतना संस्थानीकरण को तोड़कर एक नये समाज का निर्माण करती
है जिसमें समता, समानता, बन्धुत्व और न्याय है। वह देश की सीमा से परे विश्व-मानव की कल्पना करती है। ‘‘नहीं चाहिए-2’’ मलखान सिहं की इसी तरह की कविता है। जिसमें दो बंद हैं। पहला बंद संस्थानीकरण का विरोध करता
है तो दूसरा बंद समाधान का निर्माण करता है। दूसरे बंद का उदाहरण-
गढेंगे नया सूरज हम
नीले आसमान में
ओढ़ेगा हमारे दुख दर्द
पटेहाल जो
हमारी टूटी खाट पर
संग-संग सोयेगा।
तोड़ेगा पहाड़
जाति,
धर्म, राज्य,
भाषा के
नये राग- नये फाग
वस्तुतः मलखान सिंह की कविता सामाजिक संरचना पर प्रहार करते हुए नये समाज का निर्माण
करती है। एक रचनाकार के लिये यह अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि उसका समय और समाज
कितना बदल रहा है और वह रचनाकार कितना तटस्थ है। जिस समय समाज संकट की स्थिति में हो
और उसका साहित्यकार बैठकर ख्याली वायवीय साहित्य का निर्माण करे,
वह समय साहित्य और समाज के लिये सबसे पतन का समय होगा। मलखान
सिंह अपने समय और समाज की नब्ज़ पकड़ते हैं। इसी कारण वह हमारे लिये अधिक महत्त्वपूर्ण
हो जाते हैं।
ADDRESS-
211] 3rd FOOR, NEHRU VIHAR
NEW
DELHI, 54,
Mobile No. 9015603769
टिप्पणियाँ