''जहाँ धूप आकार लेती हैः प्रकृति, संगीत और देश की ऐंद्रीय एकता''
दुर्गा प्रसाद गुप्त के कविता संग्रह ‘जहाँ धूप आकर लेती है’ में सामान्यतः तीन शब्द ‘प्रकृति’, ‘सगीत’, और ‘देश’ अधिक बार प्रयुक्त हुए हैं। ये तीनों शब्द एक दूसरे से संबंधित हैं। इन्हीं शब्दों के माध्यम से कई तरह के पाठ किये जा सकते हैं। यदि हम ‘प्रकृति’ को ‘स्त्री’ ‘संगीत’ को ‘कविता’ और देश को काव्य सृजन का स्थान मान लें तो पूरी कविता स्त्री, परम्परा, संस्कृति तथा वैचारिकी के रूप में दिखाई देगी। इसके अलावा महानगरी समस्या, सांस्कृतिक समस्या, पर्यावरणीय समस्या से संबंधित समस्यामूलक पाठ भी हो सकता है। समस्या मूलक पाठ वैचारिकी का पाठ है। ‘कविता’ में भाव या इच्छाशक्ति ;ूपसस चवूमतद्ध अधिक दिखाई देती है। यही इच्छा शक्ति या भाव उन्हें बंधन से निकालकर उन्मुक्त कर देते हैं। समाज से परे एक नई दुनिया का सृजन करने लगते हैं। इस सृजन के दौरान वह उन्मुक्त के संसाधनों की सृष्टि करने लगते हैं। ‘निर्जन में संगीत’ इनकी ‘‘बंधन से उन्मुक्तता’’ की कविता है जिसमें कलाकार अपने यंत्रों के माध्यम से संसारिकता से परे एक नये जगत का निर्माण करता है। इस सृजन के दौरान वह संगीत की बनी बनाई परिपाटी से अलग हटकर अंतिम जन के संगीत बनने की कोशिश करता है। कविता में प्रयुक्त ‘फूटा मटका का’ तथा ‘रबड़’ दो अनुपयोगी वस्तुएँ हैं। कलाकार इन्हीं अनुपयोगी चीजों के माध्यम से संगीत जैसा उपयोगी शाश्वत मूल्य का सृजन करता है। इसके अतिरिक्त ‘‘निर्जन’’ और ‘‘लोगों का आना’’ दो विरोधी चीजे हैं। गुप्त जी ने इन विरोधी चीजों के बीच ऐन्द्रिय एकता का सृजन किया है-
‘‘किसी निर्जन में भी संगीत की सृष्टि कर लेते हैं
वे बना लेते हैं वाद्ययंत्र
किसी फूटे मटके के मुँह पर रबड़ बाँध थाप दे लेते हैं वे,
और संगीत की सृष्टि हुआ जान
न जाने कहाँ से सुनने चले आते हैं लोग’’
प्रकृति मानव में इच्छा में इच्छाशक्ति के साथ-साथ माधुर्यता का निर्माण करती है। माधुर्यभाव प्रातिभ तत्त्व हैं। मनुष्य में यह सुप्तावस्था में विद्यमान रहते हैं। अपने तात्त्विक संयोग से यह किसी के हृदय में जागृत हो जाते हैं। गुप्त जी की कविता में यह माधुर्य भाव जाति, धर्म तथा देश से परे मानवता का सृजन करता है। जब यह माधुर्यभाव किसी स्त्री से जुड़ जाता है तो अपने तात्त्विक विलयन के माध्यम से द्वैतभाव को छोड़कर एकाकार हो जाता है। यहाँ शंकर के अद्वैत की स्थिति दिखाई देती है। परन्तु यह भाव समाज के अन्य लोगों पर लागू होता है तो देश के बंधन से मुक्त होकर, राष्ट्र या राष्ट्रीयता की भौगोलिक सीमा को लॉघते हुए विश्व बंधुत्व की भावना का सृजन करती है। गुप्त जी माधुर्य से पहले आकर्षण की स्थिति को ‘तुम’ कविता में चिन्हित करते हैं।
धुली हुई प्रकृति लगती है जैसी बारिश
के बाद उनका
वैसी ही लगो तुम
जैसें करती हैं बातें
बारिश और हवा
पेड़, पौधे और पत्तियों से
वैसे ही करो तुम
जैसे बारिश और हवा मिलकर
छेड़ते हैं कोई धुन
कोई संगती
वैसे ही कुछ छेड़ो तुम।
वियोग से संबंधित कविताओं में प्रेयसी से बिछुड़ने की बेचैनी या छटपटाहट परिवेश के तनाव के कारण अधिक मुखरित नहीं हो पाती। फैज़ अहम़द फैज़ के शब्दों में कहें-
‘‘और भी ग़म हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा।
राहते औ भी हैं वस्त की राहत के सिवाा।।’’
इस तरह से देखें गुप्त जी की कविता में वियोग परिवेश का तनाव लिये हुए है। ‘‘याद’’ कविता में गुप्त जी इसी वियोग और परिवेश के तनाव से गुजरते हैं। ‘पत्तों का टूट कर गिर जाना’ और ‘‘प्रेयसी से अलग होना’’ दोनो दो अलग चीज़े है। रचनाकार को अपनी अनुभूति प्रकृति तक महसूस होने लगती है। वस्तुतः ‘पत्तों का टूटना’ केवल प्रकृति का ही नहीं बल्कि पूरे परिवेश के टूटने और बिखरने जैसा है। यही अपने परिवेश का तनाव है जिसमें रचनाकार प्रकृति के माध्यम से जनता के दुख दर्द को दर्शाते हुए अपने वियोग से तुलना करता है-
टूट कर गिरे हुए पत्तों के दर्द, और
तुम्हारी याद में करने लगता हूँ अन्तर
दोनो एक दूसरे में घुल मिल जाते हैं, लेकिन
अंदर कहीं कोई उदास पतझड़ है
जो झड़ता है लगातार।
छायावादी प्रतिमान से आगे निकलकर नव उदारीकरण के दौर में नये प्रतिमानों को गढ़ा गया। यहाँ स्त्री प्रकृति के नजदीक न होकर प्रकृति के रूप में अभिक्त हुई है। नौवें दशक के बाद स्त्री को कुछक प्राकृतिक उपमानों से तुलना न करके उसका रूप दिया गया है जिसमें प्रकृति की रम्यता/सुन्दरता के साथ-साथ प्रकृति के गीत यथा-नदियों के कल कल की ध्वनि, चिडि़यों की चह चहाहट, या वन प्रान्त से दूर तक चलती हुई हवाओं के ध्वनियों का संगीत, का रूप दिया गया है। जहाँ प्रकृति से कटाव है, वहीं प्रकृति का जुड़ाव भी है। इस तरह से देखा जाये यह समय प्रकृति-संबंधी कविताओं में मूर्त के अमूर्तीकरण का समय है।
गुप्त जी की कविता में इसी मूर्त के अमूर्तिकरण के प्रतिमान को गढ़ती है। यह अमूर्तिकरण का भाव नौंवे दशक के बाद की कुछ कविताओं पर लागू होता है। चाहे वह ‘अशोक वाजयेपी’ या ‘आलोक धन्वा’ की कविता हो या नये कवियों में ‘आलोक श्रीवास्तव’, कैलाश नारायण तिवारी (हटो हटो कुछ कहने दो) या मृत्युंजय हों। प्रकृति और स्त्री संबंधी इनकी कविताओं में मूर्त के अमूर्तिकरण का भाव दिखाई देता है। गुप्त जी की कविताएँ कहीं कहीं इसका पर्याय बन जाती है। ‘तुम’ कविता इसी मूर्त के अमूर्तिकरण का उदाहरण है-
धूली हुई प्रकृति लगती है जैसी बारिश
के बाद
वैसी ही लगो तुम
जैसी करती हैं बातें
बारिश और हवा
पेड़ पौधे और पत्तियों से
वैसे ही करो तुम
प्रकृति और संगीत का संबंध अन्योन्याश्रित संबंध है। जहाँ प्रकृति मनुष्य में इच्छाशक्ति और अनुभूति देती है, वहीं संगीत उसके जीवन में रम्यता, सुगमता तथा अनवरता को बनाये रखता है। वह संगीत चाहे प्रकृति प्रदत्त हो अथवा मानव सृजित हो। दोनों ही संगीत प्रकृति के अधूरेपन में नया रंग भर देते हैं। गुप्त जी की कविताओं में कई जगह प्रकृति, स्त्री के रूप में अभिक्त हुई है तथा स्त्री प्रकृति के रूप में। प्रकृति का स्त्री होना या स्त्री का प्रकृति होना दोनो ही महत्त्वपूर्ण हैं। जहाँ स्त्री प्रकृति के रूप में अभिव्यक्त हुई है वहाँ ‘अमूर्तन की प्रक्रिया’ है लेकिन जहाँ प्रकृति स्त्री के रूप में है, वहाँ ‘मूर्तन की प्रक्रिया’ है। ‘मूर्त का अमूर्तिकरण’ और ‘अमूर्त का मूर्तिकरण’ गुप्त जी की कविताओं की एक अपनी विशेषता है जो हर युग के रचनाकारों से उन्हें अलग कर देती है। ‘तुम्हें देखता हूँ मैं,’ मौसम के साथ हो जाते हैं लोग’, ‘पूरी एक धरती’ इसी तरह की कविताएँ हैं। इन कविताओं को पढ़कर कोई भी सैलानी किसी पर्वत शृंखला को आसानी से समझ सकता है कि यह कविता किस वन्य क्षेत्र या प्रान्त की है। इन कविताओं में भौगोलिकता की अपन अलग पहचान है। ‘‘तुम्हें देखता हूँ’’ कविता का उदाहरण-
किसी वन प्रान्तर की जलधारा-सी गिरती
स्वप्नों में हरियाली सी उतरती
चिडि़यों की चहचहाहट-सी गूँजती
धप और बारिश-सी दौड़ती
तुम्हें देखता हूँ मैं
अपने उस पहाड़ी घर की छत से
जहाँ धूप आकार लेती है
हवाएँ रूकती हैं
बारिश स्वयं को मुक्त करती है
ठंड शुरू होती है, और
तुमसे जुड़ी स्मृतियाँ जन्म लेती हैं।
देश तीसरा महत्त्वपूर्ण शब्द है। इस देश से बाकी दो शब्द ‘प्रकृति’ और ‘संगीत’ भी जुड़े हुए हैं। प्रत्येक देश या स्थान की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। इन्हीं विशेषताओं के माध्यम से हम एक देश से दूसरे देश की प्रकृति, और संगीत को बिल्कुल अलग पाते हैं। प्रकृति अपने स्वभाव के अनुरूप किसी भी देश या स्थान की संस्कृति, भाषा और संगीत को समाहित कर लेती है। मानव स्वभाव इसी संस्कृति के विशेषों को ग्रहण करता है। इसीलिये जब अन्य देश या स्थान में हम जाते हैं तो अपनी ही संस्कृति, प्रकृति और व्यक्ति जैसे की तलाश करता है। गुप्त जी की लंदन संबंधी कविताएँ इसी तरह की हैं जिससे अनको अपने शहर और मौसम की तलाश रहती है-
पराये शहरों में भी
अपने शहर की तलाश रहती है
अपने लोगों और मौसम की तलाश।
इसके अलावा देश के अन्दर निहित समस्याएँ भी हैं जो अपने जड़त्व के कारण गतिशीलता में बाँधा पहुँचाती हैं, गरीबी और बदहाली प्राथमिक समस्याएँ हैं। ये समस्याएँ ही अपने साथ अन्य जड़ीभूत समस्याओं को जन्म देती हैं। बलात्कार, शोषण और कत्ले आम इन समस्याओं की अपररूप हैं। गुप्ता जी की कविताओं में प्राथमिक समस्याओं से लेकर द्वितीयक समस्याएँ एक चक्रवात की तरह आती हैं जहाँ एक समस्याओं के साथ कई अन्य समस्याएँ भी जन्म लेने लगती हैं। ‘देश जो कि बाजार है’ ‘शन्ति’, ‘उनके पास’ ‘बाजार कहाँ है’, हमारा देश’, ‘प्रार्थना’, इसी तरह की महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं।
‘प्रार्थना’ कविता में प्रत्येक ‘बंद’ अलग-अलग हैं। इसमें प्रत्येक बंद स्वतन्त्र अर्थ रखने में समर्थ है। पूरी कविता चित्रों में चलती है। यह कविता की अपनी विशेषता है। इस कविता में कुल चार चित्र हैं। पहला कालाहांडी बेचने वाले लड़के का है जो कि गरीबी और बदहाली से मुक्ति पाने के लिये एक व्यक्तिगत रोजगार चला रहा है। परन्तु रोजगार कहना भी उसके साथ अन्याय हो सकता है। बहरहाल लड़के के पास गरीबी की प्राथमिक समस्याएँ हैं जो जिससे वह मुक्ति पाना चाहता है। दूसरा बंद धर्म के ठेकेदारों से संबधित है। तीसरा सत्ताधारियों से संबंधित है जो अपनी सत्ता को बचाये रखने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं। हिंसा अथवा नरसंहार इनके लिये आम बात है। चौथा बंद स्वयं रचनाकार का है जो-दूसरे और तीसरे बंद की समस्याओं को देखकर पीडि़त पहले बंद को बचाने के लिये प्रार्थना करने से संबंधित है। इस बंद में महत्त्वपूर्ण यह है कि ‘अनीश्वर’ और ‘प्रार्थना’ दो विरोधी चीजें़ होकर सामंजस्य बनाये हुए हैं। प्रार्थना ‘आस्था और मूर्तिं पद है। परन्तु गुप्त जी ने इस प्रार्थना को मूर्ति विहीन रखते हुए आस्था प्रकट की है। इस बंद में रचनाकार की पूरी मनोवृत्ति, कसकता दुःख और दुःख से मुक्ति की छटपटाहट एक साथ दिखाई देती हैं। चारो दृश्य महत्त्वपूर्ण हैं। उदाहरण-
जब भी भूख से मुक्तिपाने के लिये
कोई कालाहांडी बेचता है अपना बेटा
जब भी कोई धार्मिक उन्माद लेता है
किसी का बलिदान
जब भी सत्ता की भूख जन्म लेती है
किसी हिंसक संस्कृति को
तब अनीश्वरवादी मैं
सोचने लगता हूँ तथागत के बारे में और
करने लगता हूँ प्रार्थना
इन तीनों शब्दों के अतिरिक्त ‘संस्कृति’ और ‘परम्परा’ भी गुप्त जी की कविताओं में महत्त्वपूर्ण हैं। ‘संस्कृति’ और ‘परम्परा’ किसी भी सजग और चितेरे रचनाकार के लिये उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना उसका अपना संस्कृति को बचाये रखने की जद्दोजह्द तलाश है। इस प्रक्रिया में साहित्यकार-संस्कृति चिन्तकों की परम्परा को आगे बढ़ाते हैं। कविताकारों अथवा कथाकारों में नदी और माँ को संस्कृति और परम्परा के प्रतीक के रूप में नई पीढ़ी से जोड़ने वाले कारक के रूप में चिन्हित किया गया है।
गुप्त जी ने भी इसी नदी और माँ को संस्कृति और परम्परा के निर्वाहक के रूप में माना है। नदी चाहे वह भारत को छोड़कर किसी भी देश की हो अपनी कई परम्पराओं और इतिहास को वर्तमान से जोड़ने का काम करती है। ‘सूखना नदी का’ तथा टेम्स नदी से संबंधित इनकी कविता इसी का प्रतिनिधित्व करती हैं।
इन कविताओं के अतिरिक्त ‘कैंसर’ कविता भी महत्त्वपूर्ण है। इस कविता में कैंसरग्रस्त माँ घर की छोटी-बड़ी समस्याओें को निपटाने के लिये अपने कैंसरपन को भूल जाती है। पूरी कविता प्रतीकात्मक है। ‘माँ’ परम्परा की प्रतीक है और ‘बच्चे’ आधुनिकता के। जबकि कैंसर पूरानी परम्परा के टूटने और बिखरने का प्रतीक है। ऐसा हर युग में होता है। कैंसर की तरह लाइलाज़ होना इसकी अपनी विशेषता है। इस तरह से देखें पूरी कविता परम्परा और आधुनिकता के बीच ठहरती है-
माई दुखी थीं
इस कारण नहंीं, कि
कैंसर से जर्जर दुखता था उनका शरीर
कहीं न कहीं दुखी थीं
शाश्वत-सी घर की समस्याएँ
कुछ बड़ी थीं।
गुप्त जी की कई कविताएँ ‘अनुमान प्रमाण की तरह तर्कवाक्य का सहारा लेते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुँचती हैं। तर्कवाक्य अपने आधारवाक्यों के माध्यम से निष्कर्ष तक पहुँचता है।
उदाहरण-
जहाँ धूम है वहाँ आग है (आधार वाक्य)
पर्वत में धूम है (आधार वाक्य)
अतः पर्वत में आग है (निष्कर्ष)
इसी तरह से गुप्त जी की एक कविता-
महानगर की आत्मा है गतिशीलता-
आत्मा अजर और अमर है
मरता महानागर है (आधार वाक्य)
आत्मा नहीं
और आत्मा है कि गतिशील है (निष्कर्ष)
यह कविता भी ऊपर के उदाहरण की तरह तर्कवाक्यों पर आधारित है। परन्तु यह तर्क तर्कशास्त्र ;स्वहपबद्ध का तर्क न होकर कविता का अपना तर्क है। यह गुप्त जी की अपनी विशेषता है।
वस्तुतः गुप्त जी की कविताएँ संस्कृति और परम्परा, मुक्तता और बंधन के बीच रची गई हैं। जो अपने परिवेश की कसमसाहट व बेचैनी लिये हुए नये दिशा की तलाश में है।
जामिया मिल्लाया इस्लामिया
जामिया नगर, 25
पता- सी - 211 तीसरी मंजिल,
नेहरू विहार, 110054
मो.- 9015603769
दुर्गा प्रसाद गुप्त के कविता संग्रह ‘जहाँ धूप आकर लेती है’ में सामान्यतः तीन शब्द ‘प्रकृति’, ‘सगीत’, और ‘देश’ अधिक बार प्रयुक्त हुए हैं। ये तीनों शब्द एक दूसरे से संबंधित हैं। इन्हीं शब्दों के माध्यम से कई तरह के पाठ किये जा सकते हैं। यदि हम ‘प्रकृति’ को ‘स्त्री’ ‘संगीत’ को ‘कविता’ और देश को काव्य सृजन का स्थान मान लें तो पूरी कविता स्त्री, परम्परा, संस्कृति तथा वैचारिकी के रूप में दिखाई देगी। इसके अलावा महानगरी समस्या, सांस्कृतिक समस्या, पर्यावरणीय समस्या से संबंधित समस्यामूलक पाठ भी हो सकता है। समस्या मूलक पाठ वैचारिकी का पाठ है। ‘कविता’ में भाव या इच्छाशक्ति ;ूपसस चवूमतद्ध अधिक दिखाई देती है। यही इच्छा शक्ति या भाव उन्हें बंधन से निकालकर उन्मुक्त कर देते हैं। समाज से परे एक नई दुनिया का सृजन करने लगते हैं। इस सृजन के दौरान वह उन्मुक्त के संसाधनों की सृष्टि करने लगते हैं। ‘निर्जन में संगीत’ इनकी ‘‘बंधन से उन्मुक्तता’’ की कविता है जिसमें कलाकार अपने यंत्रों के माध्यम से संसारिकता से परे एक नये जगत का निर्माण करता है। इस सृजन के दौरान वह संगीत की बनी बनाई परिपाटी से अलग हटकर अंतिम जन के संगीत बनने की कोशिश करता है। कविता में प्रयुक्त ‘फूटा मटका का’ तथा ‘रबड़’ दो अनुपयोगी वस्तुएँ हैं। कलाकार इन्हीं अनुपयोगी चीजों के माध्यम से संगीत जैसा उपयोगी शाश्वत मूल्य का सृजन करता है। इसके अतिरिक्त ‘‘निर्जन’’ और ‘‘लोगों का आना’’ दो विरोधी चीजे हैं। गुप्त जी ने इन विरोधी चीजों के बीच ऐन्द्रिय एकता का सृजन किया है-
‘‘किसी निर्जन में भी संगीत की सृष्टि कर लेते हैं
वे बना लेते हैं वाद्ययंत्र
किसी फूटे मटके के मुँह पर रबड़ बाँध थाप दे लेते हैं वे,
और संगीत की सृष्टि हुआ जान
न जाने कहाँ से सुनने चले आते हैं लोग’’
प्रकृति मानव में इच्छा में इच्छाशक्ति के साथ-साथ माधुर्यता का निर्माण करती है। माधुर्यभाव प्रातिभ तत्त्व हैं। मनुष्य में यह सुप्तावस्था में विद्यमान रहते हैं। अपने तात्त्विक संयोग से यह किसी के हृदय में जागृत हो जाते हैं। गुप्त जी की कविता में यह माधुर्य भाव जाति, धर्म तथा देश से परे मानवता का सृजन करता है। जब यह माधुर्यभाव किसी स्त्री से जुड़ जाता है तो अपने तात्त्विक विलयन के माध्यम से द्वैतभाव को छोड़कर एकाकार हो जाता है। यहाँ शंकर के अद्वैत की स्थिति दिखाई देती है। परन्तु यह भाव समाज के अन्य लोगों पर लागू होता है तो देश के बंधन से मुक्त होकर, राष्ट्र या राष्ट्रीयता की भौगोलिक सीमा को लॉघते हुए विश्व बंधुत्व की भावना का सृजन करती है। गुप्त जी माधुर्य से पहले आकर्षण की स्थिति को ‘तुम’ कविता में चिन्हित करते हैं।
धुली हुई प्रकृति लगती है जैसी बारिश
के बाद उनका
वैसी ही लगो तुम
जैसें करती हैं बातें
बारिश और हवा
पेड़, पौधे और पत्तियों से
वैसे ही करो तुम
जैसे बारिश और हवा मिलकर
छेड़ते हैं कोई धुन
कोई संगती
वैसे ही कुछ छेड़ो तुम।
वियोग से संबंधित कविताओं में प्रेयसी से बिछुड़ने की बेचैनी या छटपटाहट परिवेश के तनाव के कारण अधिक मुखरित नहीं हो पाती। फैज़ अहम़द फैज़ के शब्दों में कहें-
‘‘और भी ग़म हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा।
राहते औ भी हैं वस्त की राहत के सिवाा।।’’
इस तरह से देखें गुप्त जी की कविता में वियोग परिवेश का तनाव लिये हुए है। ‘‘याद’’ कविता में गुप्त जी इसी वियोग और परिवेश के तनाव से गुजरते हैं। ‘पत्तों का टूट कर गिर जाना’ और ‘‘प्रेयसी से अलग होना’’ दोनो दो अलग चीज़े है। रचनाकार को अपनी अनुभूति प्रकृति तक महसूस होने लगती है। वस्तुतः ‘पत्तों का टूटना’ केवल प्रकृति का ही नहीं बल्कि पूरे परिवेश के टूटने और बिखरने जैसा है। यही अपने परिवेश का तनाव है जिसमें रचनाकार प्रकृति के माध्यम से जनता के दुख दर्द को दर्शाते हुए अपने वियोग से तुलना करता है-
टूट कर गिरे हुए पत्तों के दर्द, और
तुम्हारी याद में करने लगता हूँ अन्तर
दोनो एक दूसरे में घुल मिल जाते हैं, लेकिन
अंदर कहीं कोई उदास पतझड़ है
जो झड़ता है लगातार।
छायावादी प्रतिमान से आगे निकलकर नव उदारीकरण के दौर में नये प्रतिमानों को गढ़ा गया। यहाँ स्त्री प्रकृति के नजदीक न होकर प्रकृति के रूप में अभिक्त हुई है। नौवें दशक के बाद स्त्री को कुछक प्राकृतिक उपमानों से तुलना न करके उसका रूप दिया गया है जिसमें प्रकृति की रम्यता/सुन्दरता के साथ-साथ प्रकृति के गीत यथा-नदियों के कल कल की ध्वनि, चिडि़यों की चह चहाहट, या वन प्रान्त से दूर तक चलती हुई हवाओं के ध्वनियों का संगीत, का रूप दिया गया है। जहाँ प्रकृति से कटाव है, वहीं प्रकृति का जुड़ाव भी है। इस तरह से देखा जाये यह समय प्रकृति-संबंधी कविताओं में मूर्त के अमूर्तीकरण का समय है।
गुप्त जी की कविता में इसी मूर्त के अमूर्तिकरण के प्रतिमान को गढ़ती है। यह अमूर्तिकरण का भाव नौंवे दशक के बाद की कुछ कविताओं पर लागू होता है। चाहे वह ‘अशोक वाजयेपी’ या ‘आलोक धन्वा’ की कविता हो या नये कवियों में ‘आलोक श्रीवास्तव’, कैलाश नारायण तिवारी (हटो हटो कुछ कहने दो) या मृत्युंजय हों। प्रकृति और स्त्री संबंधी इनकी कविताओं में मूर्त के अमूर्तिकरण का भाव दिखाई देता है। गुप्त जी की कविताएँ कहीं कहीं इसका पर्याय बन जाती है। ‘तुम’ कविता इसी मूर्त के अमूर्तिकरण का उदाहरण है-
धूली हुई प्रकृति लगती है जैसी बारिश
के बाद
वैसी ही लगो तुम
जैसी करती हैं बातें
बारिश और हवा
पेड़ पौधे और पत्तियों से
वैसे ही करो तुम
प्रकृति और संगीत का संबंध अन्योन्याश्रित संबंध है। जहाँ प्रकृति मनुष्य में इच्छाशक्ति और अनुभूति देती है, वहीं संगीत उसके जीवन में रम्यता, सुगमता तथा अनवरता को बनाये रखता है। वह संगीत चाहे प्रकृति प्रदत्त हो अथवा मानव सृजित हो। दोनों ही संगीत प्रकृति के अधूरेपन में नया रंग भर देते हैं। गुप्त जी की कविताओं में कई जगह प्रकृति, स्त्री के रूप में अभिक्त हुई है तथा स्त्री प्रकृति के रूप में। प्रकृति का स्त्री होना या स्त्री का प्रकृति होना दोनो ही महत्त्वपूर्ण हैं। जहाँ स्त्री प्रकृति के रूप में अभिव्यक्त हुई है वहाँ ‘अमूर्तन की प्रक्रिया’ है लेकिन जहाँ प्रकृति स्त्री के रूप में है, वहाँ ‘मूर्तन की प्रक्रिया’ है। ‘मूर्त का अमूर्तिकरण’ और ‘अमूर्त का मूर्तिकरण’ गुप्त जी की कविताओं की एक अपनी विशेषता है जो हर युग के रचनाकारों से उन्हें अलग कर देती है। ‘तुम्हें देखता हूँ मैं,’ मौसम के साथ हो जाते हैं लोग’, ‘पूरी एक धरती’ इसी तरह की कविताएँ हैं। इन कविताओं को पढ़कर कोई भी सैलानी किसी पर्वत शृंखला को आसानी से समझ सकता है कि यह कविता किस वन्य क्षेत्र या प्रान्त की है। इन कविताओं में भौगोलिकता की अपन अलग पहचान है। ‘‘तुम्हें देखता हूँ’’ कविता का उदाहरण-
किसी वन प्रान्तर की जलधारा-सी गिरती
स्वप्नों में हरियाली सी उतरती
चिडि़यों की चहचहाहट-सी गूँजती
धप और बारिश-सी दौड़ती
तुम्हें देखता हूँ मैं
अपने उस पहाड़ी घर की छत से
जहाँ धूप आकार लेती है
हवाएँ रूकती हैं
बारिश स्वयं को मुक्त करती है
ठंड शुरू होती है, और
तुमसे जुड़ी स्मृतियाँ जन्म लेती हैं।
देश तीसरा महत्त्वपूर्ण शब्द है। इस देश से बाकी दो शब्द ‘प्रकृति’ और ‘संगीत’ भी जुड़े हुए हैं। प्रत्येक देश या स्थान की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। इन्हीं विशेषताओं के माध्यम से हम एक देश से दूसरे देश की प्रकृति, और संगीत को बिल्कुल अलग पाते हैं। प्रकृति अपने स्वभाव के अनुरूप किसी भी देश या स्थान की संस्कृति, भाषा और संगीत को समाहित कर लेती है। मानव स्वभाव इसी संस्कृति के विशेषों को ग्रहण करता है। इसीलिये जब अन्य देश या स्थान में हम जाते हैं तो अपनी ही संस्कृति, प्रकृति और व्यक्ति जैसे की तलाश करता है। गुप्त जी की लंदन संबंधी कविताएँ इसी तरह की हैं जिससे अनको अपने शहर और मौसम की तलाश रहती है-
पराये शहरों में भी
अपने शहर की तलाश रहती है
अपने लोगों और मौसम की तलाश।
इसके अलावा देश के अन्दर निहित समस्याएँ भी हैं जो अपने जड़त्व के कारण गतिशीलता में बाँधा पहुँचाती हैं, गरीबी और बदहाली प्राथमिक समस्याएँ हैं। ये समस्याएँ ही अपने साथ अन्य जड़ीभूत समस्याओं को जन्म देती हैं। बलात्कार, शोषण और कत्ले आम इन समस्याओं की अपररूप हैं। गुप्ता जी की कविताओं में प्राथमिक समस्याओं से लेकर द्वितीयक समस्याएँ एक चक्रवात की तरह आती हैं जहाँ एक समस्याओं के साथ कई अन्य समस्याएँ भी जन्म लेने लगती हैं। ‘देश जो कि बाजार है’ ‘शन्ति’, ‘उनके पास’ ‘बाजार कहाँ है’, हमारा देश’, ‘प्रार्थना’, इसी तरह की महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं।
‘प्रार्थना’ कविता में प्रत्येक ‘बंद’ अलग-अलग हैं। इसमें प्रत्येक बंद स्वतन्त्र अर्थ रखने में समर्थ है। पूरी कविता चित्रों में चलती है। यह कविता की अपनी विशेषता है। इस कविता में कुल चार चित्र हैं। पहला कालाहांडी बेचने वाले लड़के का है जो कि गरीबी और बदहाली से मुक्ति पाने के लिये एक व्यक्तिगत रोजगार चला रहा है। परन्तु रोजगार कहना भी उसके साथ अन्याय हो सकता है। बहरहाल लड़के के पास गरीबी की प्राथमिक समस्याएँ हैं जो जिससे वह मुक्ति पाना चाहता है। दूसरा बंद धर्म के ठेकेदारों से संबधित है। तीसरा सत्ताधारियों से संबंधित है जो अपनी सत्ता को बचाये रखने के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं। हिंसा अथवा नरसंहार इनके लिये आम बात है। चौथा बंद स्वयं रचनाकार का है जो-दूसरे और तीसरे बंद की समस्याओं को देखकर पीडि़त पहले बंद को बचाने के लिये प्रार्थना करने से संबंधित है। इस बंद में महत्त्वपूर्ण यह है कि ‘अनीश्वर’ और ‘प्रार्थना’ दो विरोधी चीजें़ होकर सामंजस्य बनाये हुए हैं। प्रार्थना ‘आस्था और मूर्तिं पद है। परन्तु गुप्त जी ने इस प्रार्थना को मूर्ति विहीन रखते हुए आस्था प्रकट की है। इस बंद में रचनाकार की पूरी मनोवृत्ति, कसकता दुःख और दुःख से मुक्ति की छटपटाहट एक साथ दिखाई देती हैं। चारो दृश्य महत्त्वपूर्ण हैं। उदाहरण-
जब भी भूख से मुक्तिपाने के लिये
कोई कालाहांडी बेचता है अपना बेटा
जब भी कोई धार्मिक उन्माद लेता है
किसी का बलिदान
जब भी सत्ता की भूख जन्म लेती है
किसी हिंसक संस्कृति को
तब अनीश्वरवादी मैं
सोचने लगता हूँ तथागत के बारे में और
करने लगता हूँ प्रार्थना
इन तीनों शब्दों के अतिरिक्त ‘संस्कृति’ और ‘परम्परा’ भी गुप्त जी की कविताओं में महत्त्वपूर्ण हैं। ‘संस्कृति’ और ‘परम्परा’ किसी भी सजग और चितेरे रचनाकार के लिये उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना उसका अपना संस्कृति को बचाये रखने की जद्दोजह्द तलाश है। इस प्रक्रिया में साहित्यकार-संस्कृति चिन्तकों की परम्परा को आगे बढ़ाते हैं। कविताकारों अथवा कथाकारों में नदी और माँ को संस्कृति और परम्परा के प्रतीक के रूप में नई पीढ़ी से जोड़ने वाले कारक के रूप में चिन्हित किया गया है।
गुप्त जी ने भी इसी नदी और माँ को संस्कृति और परम्परा के निर्वाहक के रूप में माना है। नदी चाहे वह भारत को छोड़कर किसी भी देश की हो अपनी कई परम्पराओं और इतिहास को वर्तमान से जोड़ने का काम करती है। ‘सूखना नदी का’ तथा टेम्स नदी से संबंधित इनकी कविता इसी का प्रतिनिधित्व करती हैं।
इन कविताओं के अतिरिक्त ‘कैंसर’ कविता भी महत्त्वपूर्ण है। इस कविता में कैंसरग्रस्त माँ घर की छोटी-बड़ी समस्याओें को निपटाने के लिये अपने कैंसरपन को भूल जाती है। पूरी कविता प्रतीकात्मक है। ‘माँ’ परम्परा की प्रतीक है और ‘बच्चे’ आधुनिकता के। जबकि कैंसर पूरानी परम्परा के टूटने और बिखरने का प्रतीक है। ऐसा हर युग में होता है। कैंसर की तरह लाइलाज़ होना इसकी अपनी विशेषता है। इस तरह से देखें पूरी कविता परम्परा और आधुनिकता के बीच ठहरती है-
माई दुखी थीं
इस कारण नहंीं, कि
कैंसर से जर्जर दुखता था उनका शरीर
कहीं न कहीं दुखी थीं
शाश्वत-सी घर की समस्याएँ
कुछ बड़ी थीं।
गुप्त जी की कई कविताएँ ‘अनुमान प्रमाण की तरह तर्कवाक्य का सहारा लेते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुँचती हैं। तर्कवाक्य अपने आधारवाक्यों के माध्यम से निष्कर्ष तक पहुँचता है।
उदाहरण-
जहाँ धूम है वहाँ आग है (आधार वाक्य)
पर्वत में धूम है (आधार वाक्य)
अतः पर्वत में आग है (निष्कर्ष)
इसी तरह से गुप्त जी की एक कविता-
महानगर की आत्मा है गतिशीलता-
आत्मा अजर और अमर है
मरता महानागर है (आधार वाक्य)
आत्मा नहीं
और आत्मा है कि गतिशील है (निष्कर्ष)
यह कविता भी ऊपर के उदाहरण की तरह तर्कवाक्यों पर आधारित है। परन्तु यह तर्क तर्कशास्त्र ;स्वहपबद्ध का तर्क न होकर कविता का अपना तर्क है। यह गुप्त जी की अपनी विशेषता है।
वस्तुतः गुप्त जी की कविताएँ संस्कृति और परम्परा, मुक्तता और बंधन के बीच रची गई हैं। जो अपने परिवेश की कसमसाहट व बेचैनी लिये हुए नये दिशा की तलाश में है।
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