''बहुत दिनों के बाद''

बहुत दिनों के बाद 
आज तुम मुझे अच्छी लगी।
अच्छी लगी तुम्हारी
धूल में लिपटी
दीवार के कोने में टंगी तस्वीर
जिसे देखकर मैं अक्सर
नये सपनों को गढ़ने लगता था
और तुम
धीरे से उन सपनों के बीच से गुजर जाती थी।
मेरा अंतहीन ह्रदय सुगंधित होने लगता
और टपकने लगता
तुम्हारी देह से मय,
मेरा मैं तुम्हारे मय में डूब जाता,
फिर तुम शून्य हो जाती
तुम्हारा शून्य
मेरे अंतहीन ह्रदय में खो जाता।
बहुत दिनों के बाद
मैने महसूस किया है
तुममें छिपा अपनेपन को
जो किसी समय दब गया था ।
बहुत दिनों के बाद
तुम्हारे बदन से टपका है
महुए का रस,
गेसुओं से सरसों की गंध
और होठों से तिलमिलाता अनुराग।
बहुत दिनों के बाद
मैने चूमें हैं
तुम्हारे हाथ,तुम्हारे गाल
और अंत में रख दिया हूं
तुम्हारे होंठों में अपने होंठ।
बहुत दिनों के बाद
तुम मुझे प्रतिमानों से अलग
अपनेपन में नज़र आयी हो।
"सुशील द्विवेदी "

टिप्पणियाँ

Komalbhartigupta ने कहा…
वो शून्य में डूबने के सिलसिला मुझे हमेशा से आकर्षित करता रहा है किसी में शून्य होने का एक अलग संतोष है। अच्छी कविता है। 👍👍

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