अन्तरजातीय विवाह के उजले एवं काले पक्ष को उद्घाटित करती हैं प्रो शत्रुघ्न कुमार की तीन महत्वपूर्ण कहानियाँ

संतोष कुमार 

       सम्यक भारत पत्रिका विगत कई दशकों से अति महत्वपूर्ण सामाजिक विषयों को लेकर विशेषांक निकालती रही है। इसके पीछे इस पत्रिका का महती उद्देश्य यही रहा है कि भारतीय समाज विभिन्न प्रकार के सामाजिक समस्या से निकल कर एक समतामूलक समाज  बन सके। यह विशेषांक भी इसी महती उद्देश्य के लिए समर्पित है।

 विगत दिनों दो की तीन घटनाओं ने मुझे विचलित कर दिया घटनाएं  तीनों अंतरजातीय शादियों से जुड़े हैं। पहली घटना उत्तरप्रदेश के कानपुर की है जिसमें एक आईपीएस स्तर का अधिकारी सुरेन्द्रदास के आत्महत्या से जुड़ीं है जिसकी वजह सुरेंद्र दास का अपनी पत्नी डॉ रवीना सिंह से घरेलू कलह बताई गई  परन्तु इस मामले के सामाजिक पक्ष पर चिंतन करें तो इसका सीधा सम्बन्धकिया जाए तो  अन्तरजातीय प्रतिलोम विवाह  है। दूसरी घटना तेलंगाना के मिरियालागुड़ा टाउन थाने के नालगोंडा में पेरुमल्ला प्रवण कुमार की नृशंस हत्या का है। प्रवण भी सुरेन्द्रदास की तरह ही प्रेम विवाह के कारण मारे गए। प्रवण की शादी अमरुथा से हुई थी। अमुरथा वैश्य वर्ग से है। प्रवण और अमरुथा के प्रेमविवाह से अमुरथा के पिता श्री मूर्ति रेड्डी इतने नाखुश हुए कि उन्होंने भाड़े के हत्यारों से प्रणव की दर्दनाक हत्या करवा दी। जबकि प्रणव की पत्नी अमरुथा पांच महीने के गर्भ से है। तीसरी घटना  बाला संदीप व माधवी की  हैदराबाद में हुए अंतरजातीय विवाह से जुड़ी है जिसमें इनदोनों के प्रेम विवाह  के सात दिन बाद ही इस नवदम्पती पर जानलेवा हमला माधवी के पिता ने करवाया।जिसके कारण दोनों अब तक अस्पताल में मौत से जूझ रहे हैं। 

ध्यान देने की बात है कि इन तीनों मामलों में तीनों पुरुष क्रमशः संदीप, प्रणव एवं बाला संदीप अनुसूचित वर्ग से है और तीनों की पत्नियां क्रमशः सवर्ण व ओबीसी जातियों से हैं।

आइये  अन्तरजातीय विवाह के उजले एवं काले पक्ष को लेकर प्रो शत्रुघ्न कुमार की तीन कहानियों का विश्लेषण करें उससे पहले भारतीय सामाजिक व्यवस्था में देखे कि अंतरजातीय शादी की व्यवस्था का स्वरूप क्या है?

 

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में अन्तः विवाह( Endogamay) व्यवस्था है जो प्रकार का है-


1 अनुलोम विवाह (Hypegamy)
2 प्रतिलोम विवाह (Hypogamy)

अनुलोम विवाह  में एक निम्न सामाजिक प्रस्थिति(जाति) की कन्या उच्च सामाजिक प्रस्थिति के वर के साथ विवाह करती है। जैसे शुद्र वर्ण की कन्या का ब्राह्मण वर्ण के वर के साथ शादी हो। जैसे- राणव के पिता विश्रवा ने असुर कन्या कैकेसी से शादी की थी। धर्मग्रन्थकारों ने द्विजातियों के अंतर्गत अनुलोम विवाह को स्वीकार नहीं किया।

मनुस्मृति के अध्याय तीन के श्लोक 12  व 13 में देखा जा सकता है-

सवर्णाग्रे द्विजातीनां प्रशस्ता दारकर्मणि।
कामतस्तु प्रवृत्तानामिमा: स्यु: क्रमशो वरा:।। 

शुद्रेव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विश: स्मृते।
ते च स्वा चैव राज्ञश्च ताश्च स्वा चाग्रजन्मन:।। 1

यानी  द्विजाति को प्रथम सवर्ण से विवाह करना ही उचित है। यदि केवल काम वासना शांत करनी हो तो क्रमशः निम्न जाति की स्त्रियां भी ग्राह है। साथ ही मनुस्मृति कहती है कि शुद्र की स्त्री एक शुद्रा  ही हो, वैश्य की वैश्या और शुद्र हों, क्षत्री की शुद्रा, वैश्य और क्षत्रिया हों और ब्राह्मण की ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या तथा शुद्रा कही गई है। स्पष्ट तौर मनुस्मृति ने अनुलोम विवाह को वैधता प्रदान की है। प्रतिलोम विवाह में निम्न प्रस्थिति के वर से अगर सवर्ण की कन्या विवाह करे तो यह प्रतिलोम शादी कहलाता है अर्थात प्रतिलोम विवाह अनुलोम विवाह के विपरीत प्रकार है। यही  कारण है कि इस  विवाह को धार्मिक स्वीकृति नहीं मिली है। धर्म शास्त्रों में प्रतिलोम विवाह का घोर विरोध किया गया है। "गौतम ऋषि ने सभी प्रकार के प्रतिलोम विवाहों को धर्महीन कहा और इनसे उत्पन्न संतान को निकृष्ट माना गया।"2 विष्णु और मनु ने भी प्रतिलोम विवाह को नियम के विरुद्ध मानते हुए इसकी भर्त्सना की। प्रतिलोम शादी के ऊपर एक नाटक है 'रानी रेशमा चुहड़मल का खेला' यानि नाटक जो बिहार के भोजपुरी और मगध क्षेत्र में नाटक मंडली द्वारा किया जाता है। इस नाटक में एक सवर्ण जाति की महिला रानी रेशमा एक दलित चूहड़मल से शादी करती है। इस नाटक से नाराज़ सवर्ण समाज के लोगों ने पूरी नाटक टीम की हत्या कर दी।यह घटना बिहार के औरंगाबाद के दाऊदपुर के एकौनी गांव में 19 जून, 1978 में घटित हुई। जिसे एकौनी कांड कहा जाता है। देखा जाए तो एक नाटक के तौर  प्रतिलोम विवाह सवर्ण समाज नहीं स्वीकार कर सकता है तो वास्तविकता में यह विवाह कितना स्वीकार है? प्रतिलोम विवाह में स्त्रियों की स्थिति के बारे में समाजशास्री अश्विनी देशपांडे अपनी पुस्तक The Grammar of Caste में लिखती हैं- " Sociologists have also argued that the Caste system not only determines the social division of labour, but it's sexual division as well..... the concept of 'Purity' and 'Pollution' segregate groups and also regulate the mobility of women. Indeed, the prescribed social sanctions against Anulom marriage ( Upper caste men marrying women of lower caste), are not as censorious as those against Pratiloma marriage (the reverse) since the 'Purity' of the upper caste women is not violated in the former. 3 भारतीय समाज की जाति व्यवस्था के भयावह रूप को जनाने के बाद उपरोक्त विषय पर दलित चिंतक कथाकार प्रो शत्रुघ्न कुमार की तीन कहानियों का अवलोकन आवश्यक हो जाता है। कहना ना होगा कि प्रो कुमार दलित चिंतन धारा के एक ऐसे रचनाकार है जो अपनी रचना को प्रयोग में आने वाली वस्तु बना देते हैं जो दलित आंदोलन का हिस्सा बन जाता है।  प्रो कुमार दलित रचनाकारों के उस श्रृंखला के प्रमुख हस्ताक्षर हैं  जिन दलित लेखकों के बारे में सुप्रसिद्ध आलोचक अजय तिवारी एक लेख में लिखते है -"दलितों में एक ऐसा बुद्धिजीवी वर्ग विकसित हुआ जिसमें  ऐतिहासिकता, यातना के स्त्रोतों पर आक्रमण करना, सामाजिक सम्बन्धों में विषमता खत्म करना और दलितों की श्रमिक स्थिति को पहचानकर उसकी मुक्ति से पूरे समाज की मुक्ति को जोड़कर शुरू किया है।" 4 अंतरजातीय विवाह और अंतरजातीय प्रेम से जुड़ी प्रो कुमार की तीन कहानियां क्रमशः सबक, मिलन और स्वामीनाथन हैं जो आज से तकरीबन 25 वर्ष पहले विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं जबकि 2001 में प्रो शत्रुघ्न कुमार के कहानी संग्रह 'हिस्से की रोटी' में संकलित है।  हिन्दू धर्म ग्रँथों में प्रतिलोम विवाह की भर्त्सना की गई परन्तु इस व्यवस्था को एक समाधान देने का प्रयास हमें प्रो कुमार की दो कहानियों में देखने को मिलती है। ये कहानियों है 'सबक' और 'मिलन'। तीसरी कहानी सवर्ण कन्याओं के झुठे प्रेम जाल में फंस कर एक होनहार दलित कलाकार छात्र की है जो सवर्ण कन्या के प्रेम आसक्ति में मानसिक संतुलन खो देता है और अंततोगत्वा विक्षिप्त अवस्था में पहुँच कर एक जिंदा लाश बन कर रह जाता है। प्रो शत्रुघ्न कुमार की  'सबक' एक लंबी कहानी है जिसमें प्लॉट के अंदर अनेक  सबप्लॉट हैं ।एक शांतचित्त दलित कर्मचारी वेणी प्रसाद अपनी पत्नी सुमंगली व चार पुत्रों यथा सुमंत, सुधाकर, दया और बलवंत के साथ बिजली विभाग की कॉलोनी में रहने आते हैं। उनकी पत्नी सुमंगली का ब्राह्मणवादी व्यवस्था के प्रति अरुचि है वह ब्राह्मणी औरतों द्वारा गाये जा रहे कीर्त्तन और उनके द्वारा आयोजित भगवती जागरण जैसे आयोजनों से दूर रहना चाहती है। वह भगवती जागरण का प्रतिकार करते हुए कॉलोनी में रहने वाली सीता मिश्रा और उसके नालायक बेटे मोहन चोटी द्वारा चलाये जा रहे धर्म के धंधे का पोल खोल कर देती है। सुमंगली सीता मिश्रा के नाटक का पर्दाफ़ाश अपनी पड़ोसन रंजीता शर्मा के आंखों के सामने करती है -"..दोनों महिलाएं उठकर पंडाल के पीछे से बाहर निकलना चाहीं।उसी समय उन्होंने देखा इस भगवती जागरण के लिए जिस विशेष भजन गायक को वहां बुलाया गया था, उसने एक हाथ मवन शराब की बोतल ले रखी थी तथा दूसरे हाथ में एक पन्द्रह साल की लड़की को दबोच रखा था तथा अभद्र हरकत कर रहा था।"( सबक, पृष्ठ 133, हिस्से की रोटी) भगवती जागरण के मंच के पीछे कलाकारों द्वारा शराब सेवन करते देख रंजीता शर्मा की आंखे खुल जाती है। सीता मिश्रा सुमंगली से नाराज होती है और उसे सरेराह बेइज्जत करने का षड्यंत्र करती है। इसके लिए कॉलोनी में आए नए दक्षिण भारतीय कर्मचारी नंदशरण रेड्डी जिसकी पत्नी सुबयम्मा है, उसको चुनती है। सुबयम्मा और नंद शरण रेड्डी की तीन जवान पुत्रियां है  वेल्ली, जयलक्ष्मी और विजयलक्ष्मी। सुबयम्मा सीता मिश्रा की पड़ोसन थी और सबसे बड़ी बात दोनों ब्राह्मण थे इसलिए इनकी आपस में खूब छनने लोगी। सीता मिश्रा के बहकावे में आ कर एक दिन सुबयम्मा सुमंगली के दरवाजे पर आकर उसकी जाति पूछकर नीचा दिखाने की चेष्टा करने लगी- " ...तभी सुबयम्मा के चिल्लाने की आवाज़ आई। सुमंगली, सुमंगली तुम किधर है?, इदर आओ अम तुमसे पूछता कि तुम ऐसा क्यों करता। हमारा धर्म को भस्सत करता।...ओ तुम जात छुपाता? हमारा बेटी का बात बोलता। बोलो बोलो अपना जात बोलो?
सुमंगली को आज अपना अवसर मिल गया था। आज वह करके दिखाएगी कि जाति के ढोने वालों की आंखे खुल जाएंगी। वह अंदर गई और चौकी के नीचे पड़ा हुआ मोटा तिल्ली का झाड़ू निकाला, यह झाड़ू काफी सख्त, मोटा तथा तार से बंधा हुआ था।... सुमंगली ने कूदकर सुबयम्मा का बाल पकड़ लिया और मोटे तिल्ली के झाड़ू से तड़ातड़ प्रहार करने लगी। मैं तुझे बताती हूँ मेरी जात क्या है। हम हैं चमार, भंगी, हम हैं खटीक, डोम, हम हैं शुद्र, हम हैं दलित, बोल तैयार है तू और कस कर झाड़ू लगाया ।
...सुमंगली का झाड़ू ठूंठ बन गया था।" (सबक, पृष्ठ, 134-135, हिस्से की रोटी) कॉलोनी का माहौल में वैमनस्य पैदा करने के नियत से मोहन चोटी ने अफ़वाह फैला दिया ताकि कॉलोनी में दंगा हो जाए  पर सुमंगली के तंदरूस्त बेटों ने सबकी शामत ला दी। सुमंगली ने अपने चारों पुत्रों को शिक्षित और हिम्मती बनाया था। वे हीनभावना, दब्बूपन या जाति के नाम पर झुक कर रहने वाले नहीं थे-"सुमंगली और उसके चारों लड़कों ने आज जिस बहादुरी का परिचय दिया था उसकी चर्चा पूरे कॉलोनी में हो रही थी।"( सबक, पृष्ठ 136) 'सबक' कहानी की परिणीति अंतरजातीय विवाह से होती है जब सुबयम्मा की बड़ी पुत्री वेल्ली और सुमंगली की बड़े बेटे सुमंत में  प्रेम होता है और वह विवाह में तब्दील हो जाता है। कहानीकार की चिंतनधारा समतामूलक, मनावतावादी समाज की स्थापना है जहाँ जाति का उच्छेदन हो जाता है। विशेष तौर पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि वेल्ली की सुमंत से अंतरजातीय शादी कोई मामूली  घटना नहीं है क्योंकि जैसे ही सुबयम्मा और उसके पति नारायण रेड्डी को  अपनी बेटी के प्रेम प्रसंग की भनक लगती है वे दोनों परेशान और हताश से हो जाते हैं। परेशानी की वजह जाति भेद की समस्या। यानि दलित वर से ब्राह्मण कन्या की शादी 'प्रतिलोम विवाह' के अंतर्गत आता है और ब्राह्मण धर्म में यह कदाचित अनुचित और प्रतिकूल है जैसा कि हिन्दू धर्मग्रन्थ भी इसकी मनाही करता है। परिणामतः नारायण अपनी ब्राह्मण बिरादरी में पुत्री की शादी हेतु मदद मांगने जाता है।
दोनों (सुबयम्मा और  उसका पति नंद शरण रेड्डी) मुहल्ले के ब्राह्मण शर्मा, जोगेलकर, चटर्जी, तिवारी, पांडा तथा अपने ही एक रेड्डी भाई के यहां जाते रहे ताकि सुमंत और वेल्ली के शादी कैसे भी टूट जाए। परन्तु कोई भी उसे एक सुयोग्य वर बतलाने में असमर्थ है उलट कोई यज्ञ कराने का सुझाव देता है तो कोई  बेटी को जहर देकर मौत के नींद सुला देने की सलाह देता हैं क्योंकि उसकी पुत्री ने एक दलित से प्रेम कर महापाप किया है।  "पांडा ने कहा-देखो, देवी देवता का प्रकोप से यह हो रहा है। कोई महा-पंडित को बुलाकर यज्ञ कराओ रेड्डी।
शर्मा ने  उसकी बात में हां में हां मिलाई। जोगेलकर ने कहा, हमारी लड़की होती तो जहर दे देता।" (सबक, पृष्ठ 140) जैसे ही नन्द शरण  रेड्डी अपनी पत्नी सुबयम्मा को  सारी बातें बतलाता है कि शर्मा, जोगलेकर, चटर्जी, तिवारी, पांडा और रेड्डी भाई आदि ब्राह्मण  बिरादरी के भाइयों ने उसे क्या मशविरा दिया तो नंद शरण बतलाते हैं कि "खाक कहते सब बकवास करते हैं कोई कहता है यज्ञ कराओ, कोई कहता है जहर दे दो। क्या ऐसा कमीना लोग है? सुबयम्मा ने कहा।
हां! हमारे सारे के सारे ब्राह्मण भाई ऐसे ही हैं। देखो क्या होता है।
नंद शरण को पात चल गया था कि समाज में जाति का क्या पाखंड रच गया है। सब स्वार्थी हैं। इससे तो कुजात होना अच्छा।"  ( सबक, पृष्ठ 141) इस स्थिति से दोनों का ह्रदय परिवर्तन होता है और अंत में सुबयम्मा और नंद शरण रेड्डी  अपनी पुत्री की पसंद दलित युवक सुमंत  सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। 
इधर वेणी प्रसाद और सुमंगली भी बाते कर रहे है , वह पूछती है-" तुम बच्चों के अन्तरजातीय विवाह के लिए राजी हो। देखो सुमंगली, हम यह जात-पात खत्म करना चाहते हैं तो हमें अन्तरजातीय विवाह भी नहीं कहना होगा, केवल विवाह नाम देना होगा।" ( सबक, पृष्ठ 141) कथाकार सुमंत को शादी के लिए 'नीले सूट' में दिखा रहा है। नीला रंग दलित आंदोलन का प्रतीक है। वेणी प्रसाद के बेटे को नीले रंग का सूट पहनना बाबा साहेब के आंदोलन को दर्शाता है जिसे हम हाल के चर्चित फिल्म " काला" के अंतिम दृश्य में देख सकते हैं । इस प्रकार कहानीकार ने घटनाओं के माध्यम से बड़ी बारीकी से और कथनोपथन के द्वारा परिवर्तन को दर्शाया है। प्रो कुमार की कहानी 'सबक' दलित चेतना की एक जीवंत कहानी है जिसमें ब्राह्मणी व्यवस्था का पूर्ण प्रतिकार है । उस अन्यायपूर्ण व्यवस्था में मानवता का कोई स्थान नहीं है। इस कहानी में आक्रोश है,  परिवर्तन का संकल्प है।' सबक' कहानी मानवीय मूल्यों के क्षरण को रोकता है और यह कहानी अन्तरजातीय विवाह- एक प्रयोग को सार्थक और समाज सापेक्ष सिद्ध करता है।  प्रो शत्रुघ्न कुमार की दूसरी कहानी 'मिलन' अन्तरजातीय विवाह के प्रयोग में मिल का पत्थर है। यह एक आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहानी है। इस कहानी को एक उपन्यासिका के रुप में पढ़ा जा सकता है। इन कहानी में 12 खण्ड हैं। इस कहानी को भी प्रकाशित हुए करीब 25 वर्ष हो गए। इस कहानी की पृष्ठभूमि बिहार के नालंदा का गिरनार गांव है। शीलदत्त के चरित्र के माध्यम से कहानीकार ने अन्तरजातीय विवाह में बुद्ध के वचनों का सदुपयोग किया गया। यहीं नहीं बुद्ध ने जिस तरह प्रज्ञा की बात की है वह इस कहानी का मेरुदण्ड है। शीलदत्त  गाँव के एक दलित हरिया का पुत्र है। पहली पीढ़ी विद्यालय में नामांकित होता है यह उस विद्यालय के मानवतावादी शिक्षक राजीव वर्मा के अथक प्रयास के कारण सम्भव हो पाता है। राजीव वर्मा बुद्ध वचन 'अत्त दीपो भव' से प्रभावित हैं। कहानीकार ने  अपने देश के दूसरे प्रान्तों की तरह बिहार में व्याप्त क्रमानुगत जातीय व्यवस्था से संचालित ग्रामीण जीवन की एक जीवंत तस्वीर( vivid visual) प्रस्तुत किया है जिसे गिरनार गांव में देखा जा सकता है-
"गिरनार गांव स्व सहार कोस दूरी पर ब्राह्मणों, ठाकुरों का घर था। बिस्वा नामक गाँव मवन दो घर भूमिहारों के थे। ... इन तीनों जातियों की जमीन पर 'गिरनार' गांव दलित परिवार मजदूरी खेती करता था।" मिलन , पृष्ठ 155, हिस्से की रोटी) हरिया यानि शीलदत्त के पिता का घर गांव के दक्षिण टोले में है जो अमूमन हर गाँव की तस्वीर है जिसे बाबासाहेब घेटो कहते थे। शीलदत्त पढ़ने में होशियार और विनम्र है। उसे डॉक्टर बनने का जुनून है । हरिया अपने बेटे शीलदत्त को लेकर पाठशाला के गेट पर पहुँचा ही था कि स्कूल में जैसे एक खलबली मच गई। इस स्कूल के सभी शिक्षक ब्राह्मण और भूमिहार थे। केवल राजीव वर्मा ही कायस्थ जाति के थे। राजीव आंग्रेजी के शिक्षके थे। सियाराम शर्मा ने देखते ही दूर से चिल्लाया-आज यह चमरकटा यहां का करने आया है।" (मिलन, पृष्ठ 157) अध्यापक राजीव वर्मा  पाठशाला के आदर्श शिक्षक हैं।  वे कलकत्ता में शिक्षण ग्रहण करने के दौरान कई धर्मों किस सम्पर्क में आते है और काफी मंथन के बाद बुद्ध के मार्ग को श्रेष्ठ मार्ग मानते हैं। और कारण है कि राजीव वर्मा हरिया के बेटे शीलदत्त का विद्यालय में दाखिला दिलाते हैं। वे 'संविधान द्वारा सबको अमान अधिकार , समान शिक्षा की बात' में विश्वास रखते हैं। "काफी मंथन के बाद उन्होंने पाया था कि बुद्ध दर्शन ही दुनिया का श्रेष्ठ दर्शन है जिसमें मानवता को ही सबसे बड़ी चीज मानी गई है।" (वही, पृष्ठ 159) शीलदत्त का नामांकन हो जाता है । हरिया दुगुने उत्साह से काम में लग जाता है। एक दिन पास के जंगल में हरिया को भन्ते करुणाकर मिलते हैं । वे जंगल के इस हिस्से को धम्म के प्रचार के लिए उपयुक्त मानते हैं। हरिया उनसे बात करता है और याद करते हुए बतलाता है कि कैसे मास्टर राजीव वर्मा भगवान बुद्ध के बारे में बतलाते हैं-" उन्होंने हमें एक बार यह भी कहा था कि गौतम की विचारधारा दुनिया की सबसे महान विचारधारा है तथा दलितों के यही बौद्ध धर्म उपयुक्त है। जो दलित अपने को हिन्दू मानते हैं वो भ्रम में हैं। (वही, पृष्ठ 163)
हरिया अब भन्ते करुणाकर के पास प्रतिदिन आता है । धीरे धीरे गांव के समस्त दलित परिवार भन्ते के पास आने लगते हैं। राजीव वर्मा को जब भन्ते करुणाकर के बारे मवन पता चला तो वे भी उनके पास आने लगे और मेहनत से उन्होंने 'एक छोटा सा बुद्ध विहार भी बना दिया।'
इधर बुद्ध विहार बढ़ता गया और दूसरी तरफ शीलदत्त की शिक्षा बढ़ती गई। बारहवीं कक्षा शीलदत्त ने फस्ट डिवीजन में पास किया। शीलदत्त को डॉक्टर बनने में मास्टर राजीव वर्मा का अनुपम योगदान है। वे अपनी दोनों पुत्रियों यथा अलका और संध्या के साथ शीलदत्त को अपने बहन के घर कलकत्ता पढ़ने भेजते हैं। इधर में दलित बस्ती शीलदत्त के डॉक्टरी की पढ़ाई का जश्न मना रहा है तो उधर  ईर्ष्या व्यक्त कर रहे थे -"चमरवा डॉक्टर बनी।"
..तभी जगदा शर्मा उसके घर आ धमके। 
अरे विष्णु तुमने सुना? 
क्यों क्या बात है कुछ अनहोनी घट गई?
और नहीं तो क्या यह तो अनहोनी घटना ही है न ।
पहेली मत बुझाओ जगदा।
अरे हरिया चमरा का बेटा डॉक्टरी पढ़ने जा रहा है।" (मिलन, पृष्ठ 168)
कहानीकार ने इस  कहानी का परिवेश सुलझा हुआ रखा है परंतु वह सामाजिक व्यवस्था और सड़ी-गली परंपरा जिसमें सवर्ण दलितों के प्रति जिस तरह का अमानवीय व्यवहार रखते है उसे खोल कर रख दिया है। मास्टर राजीव वर्मा की बेटी अलका की मामी  जिसके घर शील रह कर पढ़ता है वह बहुत इसे भला बुरा कहती थी। एक दिन  शील ऊबकर वहां से भाग गया और पुरी रात सड़को पर बिताया। डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर एक दिन शीलदत्त गंगा के किनारे बैठा कुछ सोच रहा था कि पानी की लहरों से जूझते हुए एक बछड़े को देखता है जो लहरों से लड़कर किनारे पहुंच जाता है। शीलदत्त सोचता है कि "भारतीय समाज मानो किसी उफनी हुई नदी की लहरें हों और वह तथा उसका दलित समाज मानो  बछड़ा। जब भी कोई दलित सामाजिक थपेड़ों के साथ संघर्ष करने का प्रयत्न करता है तब बार बार के धक्के से उसे मझधार में ही आना पड़ता है।" (वही, पृष्ठ 173) जैसे - जब एक दिन शीलदत्त अपने एक शिक्षक सनकी पाठक को बतलाता है कि वह कलकत्ता से डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर आ गया, सुनते यह "सनकी पाठक सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया।" शीलदत्त का विष्णु शर्मा की पुत्री रश्मि से बचपन से प्यार है। शीलदत्त डॉक्टरी की पढ़ाई कर रश्मि से  बुद्ध विहार में शादी कर लेता है। मास्टर राजीव वर्मा एक महती भूमिका निभाते हैं। वे हरिया और विष्णु शर्मा को एक दूसरे का समधी बना देते हैं और उसी रात चर्चा करते वे लोग निष्कर्ष पर पहुँचते है कि...अब समय आ गया है जब भारतीय समाज के वर्तमान स्वरूप को एकदम बदल दिया जाए। जाति का कोई भेद न रहे। सभी एक जाति के कहलाएं और वह जाति हो भारतीय।" (वही, पृष्ठ 183) नालंदा के गिरनार गाँव व विस्वा गांव में एक बुद्ध विहार की स्थापना कहानीकार का बौद्ध धर्म के समतामूलक स्थापनाओं को प्रतिष्ठित करना है। यह परिवर्तन का संकेत है और पुर्नस्थापना की आवश्यकता।  हम देखते हैं बौद्ध धर्म रश्मि के पिता पंडित विष्णु शर्मा के ह्रदय में परिवर्तन लाता है परिणामतः वे अपनी पुत्री रश्मि का शीलदत्त से विवाह हेतु राजी होते हैं। प्रतिलोम अन्तरजातीय विवाह को कितनी सुगमता से स्वीकार्य हेतु बनाया गया है उसका मूल मंत्र बुद्ध वाणी में है उनके आष्टांगिक मार्ग में है। पंडित विष्णु शर्मा समाज की सड़ी गली रूढ़िवादी विचारों की तिलांजलि देकर बौद्ध धर्म अपनाते है और चीवर धारण करते हैं।
   वस्तुतः कहानीकार बुद्ध के बतलाए मार्ग पर चलकर मानव मानव में विलगाव नहीं अपितु प्रेम करने की बात करता है और यही मार्ग अन्तरजातीय शादी के प्रयोग को सफल बनाने में कारगर होता है। प्रो कुमार की तीसरी और एक महत्वपूर्ण कहानी है- 'स्वामीनाथ' जो उनके कहानी संग्रह 'हिस्से की रोटी' (2001) में संकलित है। प्रो कुमार ने स्वामीनाथन के चरित्र को उद्दात्त बनाया है जैसा कि अरस्तू एक त्रासद नायक की परिभाषा देते है। स्वमीनाथन एक होनहार कलाकार है जो अपनी विलक्षण चित्रकला से सबको अचंभित कर देता है। परंतु उसका एक सवर्ण लड़की से प्रेम करना उसके जीवन पर ही भारी पड़ जाता है क्योंकि उसका कसूर है उसका जन्म दलित समाज में होना। वह इस लड़की के प्रेम में इस कदर पागल हो जाता है कि लड़की की उपेक्षा और उसके घर वालों द्वारा किये गए मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से उसके मन मस्तिष्क पर ऐसा असर होता है कि अंततोगत्वा वह मानसिक विक्षिप्त हो जाता है और एक जिंदा लाश हो कर रह जाता है इस तरह नायकत्व की यह परिणति पाठक के मन में दया, सम्वेदना और घृणा का भाव भरता है। कहानीकार इस कहानी के माध्यम से बहुजन समाज के प्रतिभावान विद्यार्थियों, कलाकारों, चित्रकारों और अन्य सृजनात्मक व रचनात्मक कलाओं से जुड़े लोगों को सचेत और सावधान करते हैं। अपनी प्रतिभा का सदुपयोग कर दलित समाज का उत्थान करें ना कि किसी सवर्ण लड़की के प्रेम में पागल हो जाए। कहानीकार ने सवर्ण समाज की सोच को सामने रखा है जहाँ उनकी महिलाएं भी गुलाम मानसिकता की होती है। कहानीकार बतलाता है कि सवर्ण समाज में महिलाओं की स्थिति शूद्रों की भांति है तभी तो तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' के सुंदर कांड में लिखा-"ढोल गवार शुद्र पशु नारी। सब ताड़न के अधिकारी।।" 5
इस कहानी के परिणाम को हम ज्वलन्त उदाहरण के रूप में  उत्तर प्रदेश के कानपुर के एक आईपीएस सुरेन्द्रदास द्वारा किये आत्महत्या के कारणों का पड़ताल किया सकता है। विदित हो कि सुरेन्द्रदास एक दलित परिवार से थे और उनकी पत्नी एक सवर्ण महिला हैं। अन्तरजातीय  प्रतिलोम विवाह हेतु प्रो शत्रुघ्न कुमार की दो कहानियां क्रमशः 'सबक' और 'मिलन' समाज को एक सौहार्दपुर्ण मार्ग दिखालते जिसकी धारा बुद्ध कबीर ज्योतिबाफुले व बाबासाहब के चिंतन धारा से जुड़ता है। इसलिए प्रो कुमार का आदर्शोन्मुख प्रेमचंद आदर्शोन्मुख से इतर है क्योंकि प्रेमचंद के कहानियों में आदर्शोन्मुख में बुद्ध फुले आम्बेडकर की विचारधारा अंतसलिला नहीं है। विदित हो ज्योतिबाफुले और सावित्रीबा फूले के बेटे यशवंत की अन्तरजातीय विवाह 4 फ़रवरी 1889 को ज्ञानू बा और कृष्ण ससानी की पुत्री राधा से हुई थी। यह पहली अन्तरजातीय शादी था। जबकि देश की आज़ादी के बाद भारतीय संविधान द्वारा अनुलोम और प्रतिलोम विवाह को कानूनी वैधता मिली। हिन्दू विवाह अधिनियम 1949 और हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के द्वारा इसकी स्वीकृति प्रदान की गई परन्तु पर्याप्त कानून होने के बावजूद भी लोगों में जातीय भेदभावपूर्ण रवैया कम नहीं हुआ जिसका परिणाम आज भी हमें देखने को मिलता है। समाजिक चिंतक प्रो कांचा आइलैया ' हिन्दुत्वमुक्त भारत' कहते है कि "वैज्ञानिक नवोन्मेष के लिहाज से देखें तो हिन्दू दुनिया का सबसे पिछड़ा धर्म है और बीसवीं सदी के अंत तक भी इसकी अग्रणी जातियों की अपनी आध्यामिक दृष्टि इतनी रूढ़िवादी हैं कि हिन्दू धर्म के भीतर किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की गुंजाइश दिखाई नहीं देती। 6 पश्चिमी देशों में विवाह के संबंध में सबसे प्रचलित विचार यह है कि विवाह स्त्री पुरूष के बीच का संयोग है जबकि लॉवी, मर्डाक तथा वेस्टरमार्क जैसे मानवशास्त्रियों ने इस संयोग में सामाजिक स्वीकृति पर बल देते हैं। परन्तु पोपनों (Popeneo) के अनुसार विवाह के पांच उद्देश्य है -"यौन इच्छा, श्रम विभाजन, घर और बच्चों की इच्छा, मित्रता और आर्थिक सुरक्षा आदि।" 7
परन्तु भारत जैसे देश में  समाज में जातीय व्यवस्था ऐसी है जहाँ  सजातीय विवाह में जाति ही नहीं उसकी उप जाति व गौत्र का भी ध्यान रखा जाता वैसे में अन्तरजातीय शादी की स्वीकृति असम्भव सा लगता है पर ऐसा भी नहीं है इन 70 वर्षों में मानसिकता में बदलाव देखा जा रहा जबकि स्वीकृति और अस्वीकृति के बीच का द्वंद जारी है। भारतरत्न बाबासाहेब अम्बेडकर ने भी अपनी पुस्तक 'जाति भेद का उच्छेद'(1936) में 20 वें अध्याय -जातिवाद का किला कैसे टूटे' में अन्तर्जातीय विवाह के बारे में  लिखते है-" मुझे भरोसा है कि अन्तर्जातीय विवाह ही इसका वास्तविक उपचार है। रक्त के एकीकरण से ही आपसी भाईचारे की भावना पैदा की जा सकती है, और जब तक बन्धुत्व की यह भावना नहीं होगी, सम्बंधी होने, जुड़े होने की भावना सर्वपरि नहीं होगी तथा जाति द्वारा पैदा की गई अलगाव की भावना, भिन्न होने की भावना समाप्त नहीं होगी।क अन्य धर्मों की अपेक्षा हिंदुओं के सामाजिक जीवन में तो अन्तर्जातीय विवाह अत्याधिक महत्त्वपूर्ण प्रभावशाली सिद्ध होंगे।" 8 उपरोक्त विचारों की कसौटी पर प्रो. शत्रुघ्न कुमार की तीनों कहानियां खरी उतरती हैं  और हम देख सकते हैं कि अन्तरजातीय विवाह के प्रयोग में प्रो शत्रुघ्न कुमार की कहानी 'सबक' और 'मिलन' सार्थक है तो  वहीं उनकी कहानी 'स्वामीनाथन'  अन्तर्जातीय प्रेम के दुश्कर परिणाम से सचेत भी करती है।

सन्दर्भ :-

1.भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था, डॉ मदन मोहन सिंह, जानकी प्रकाशन, नई दिल्ली,2016, पृष्ठ 108
2. मनुस्मृति, टीकाकार -, पंडित रामेश्वर भट्ट,सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015 
3. The Grammar of Caste,Women and the caste hierarchy; Overlapping Identities, caste and gender, oxford university press, P-107, 2011
4. साहित्य की सीमान्तता एवं सीमांत पर साहित्य, ममता कालिया, साहित्य और समय, अतः सम्बन्धों पर पुनर्विचार, पृष्ठ 71, वाणी प्रकाशन,2010
5.तुलसीदास कृत रामचरितमानस, सुंदर काण्ड पद संख्या- 
6.हिंदुत्व मुक्त भारत,पृष्ठ xv, भूमिका, saga-bhasha पब्लिकेशन, 2017
7. समाजशास्त्र, धर्मेंद्र कुमार टाटामाइग्रोहिल्स, पृष्ठ-62, 2011
8. जातिभेद का उच्छेद, डॉ आंबेडकर, हिंदी अनुवाद -अनिल कुमार, गौतम बुक सेंटर, पृष्ठ 64, 2010

 

           मूल ग्रन्थ -

हिस्से की रोटी, प्रो शत्रुघ्न कुमार, साहित्यिक संस्थान, लोनी, गाज़ियाबाद,उ प्र, 2001

 

 (संतोष कुमार भोजपुरी जनजागरण के एक्टिविस्ट, कवि एवं विमर्शकार हैं) 



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कविता में गाँव की उपस्थिति

"कविता"

नींद गहरी है