आज के सन्दर्भ में कबीर : प्रो. अनिल राय

 

 

प्रो० अनिल राय (हिंदी विभाग,दिल्ली विश्वविद्यालय)से ‘आज के सन्दर्भ में कबीर’ पर सुशील द्विवेदी द्वारा लिया गया साक्षात्कार |

 प्रश्न-  आज सांप्रदायिकता के  माहौल को आप किस तरह से देखते हैं  ?

प्रो० अनिल राय  हमारे देश की जो संस्कृति है वह बहुलतावादी रही है ,गंगा-जमुनी संस्कृति है और इसकी जड़ें बहुत अंदर तक हैं । हमारे यहाँ हमेशा से ही साम्प्रदायिक सद्भाव रहा है,बसुधैव  कुटुम्बकम की भावना रही है । हमारे देश ने बहुत कुछ सहा है और आज भी जो कुछ हमारे देश ने अर्जित किया है या विश्व की संस्कृति में जो अपना स्थान बनाया है उसका सबसे बड़ा कारण ये है कि हम लोग समावेशी हैं। और ,यह जो समावेशी दृष्टि है हमारी, कश्मीर से कन्याकुमारी तक है|  भारतीय साहित्य में भी आप देखेंगे तो एक मूलभूत एकता का स्वर दिखाई पड़ेगा ; इसलिए मैं यह कहना चाहूंगा कि इस  देश की जो मनीषा है वह साम्प्रदायिकता को स्वीकार नहीं करेगी।

प्रश्न-  हमारे देश में सांप्रदायिकता को एक राजनीतिक रूप दिया जाता रहा है , तो क्या आज के समय में कबीर को फिर से देखा जाना चाहिए ?

प्रो० अनिल राय-   मुझे लगता है कबीर बहुत ज्यादा प्रासंगिक हैं | केवल कबीर ही नहीं सारे संतों का यही लक्ष्य था, उनकी कविता का लक्ष्य ही यही था। आपको शुक्ल जी की वह शब्दावली या वाक्य याद होंगे कि ‘मनुष्यत्वकी सामान्य भावना को आगे करके निम्न श्रेणी की जनता में उन्होंने आत्म गौरव का भाव जगाया ,...’राम –रहीम’ की एकता समझकर ह्रदय को शुद्ध और प्रेममय करने का उपदेश दिया’ ;  और यही पूरे भक्ति आंदोलन का मूल मंत्र था। और मैं समझता हूं कि कबीर आदि जो निर्गुण कवि हैं, उनकी जो रचनाशीलता है उसका मुख्य लक्ष्य ही यही है। वे चाहते हैं कि मनुष्य मात्र में किसी चीज को लेकर भेदभाव न हो। और कबीर आजीवन इसके खिलाफ लड़ते रहे। इसलिए आप देखेंगे कि कबीर ने स्वर दिया था , नारा दिया था कि ‘ना हिंदू ना मुसलमान’ । और कबीर की कविता में जो कशक है, जो वेदना है शायद  इसके पीछे यही भावना  थी। आप किसी समाज में रहें  और उस समाज में आपकी पहचान भी न बन पाए यह भी आपके लिए बहुत बड़ा दंश है। कहीं न कहीं लगता है कि कबीर में वह बहुत गहरा धंसा हुआ है। लेकिन आप देखेंगे कि बहुत सारे ऐसे संत हैं जो कहीं भी विद्रोह नहीं करते हैं। रैदास तो दलित थे। कबीर कम से कम वह तो नहीं थे। कबीर आक्रोश क्यों पैदा करते हैं, रैदास के यहां उतना नहीं है। है न ? तो मुझे लगता है कि कबीर बहुत सारी समस्याओं से टकराते हैं और उनके टकराने का सबसे बड़ा जो कारण है, मुझे लगता है वह यह कि अपने समय को लेकर वह अत्यंत सचेत संत कवि हैं। कभी-कभी उन पर समाज सुधारक का चस्पा भी लगा दिया जाता है। तो यह कोई बुरी बात नहीं है। किसी की कविता से समाज सुधार अगर हो रहा है तो उससे उसके काव्यत्व में क्षति नहीं होती है। ये और बात है कि उपदेशात्मक रचनाओं को उतना स्थान नहीं दिया गया है। इसलिए आप देखेंगे कि शुक्ल जी ने नाथों और सिद्धों की रचनाओं को बिल्कुल साइड लाइन कर दिया है  उसे धार्मिक काव्य कहा है|  देखा जाए, तो क्या कबीर के यहाँ धार्मिकता नहीं है ?  लेकिन धार्मिकता और साम्प्रदायिकता में हमें अंतर करना पड़ेगा।

प्रश्न-  आज जो हिंदू आईडेंटिटी और मुस्लिम आईडेंटिटी जो हम देख रहे हैं , क्या उस समय इस तरह से कुछ था?

प्रो० अनिल राय-  देखो , अस्मिताएँ आपस में टकराती हैं। समूचा भक्ति आंदोलन आप देखें और शुक्ल जी ने तो कहा ही है कि ‘अपने पौरुष से हताश हिंदू जाति के लिए और कोई रास्ता ही नहीं था’। तो अस्मिताओं का संकट तो वहां है ही और ये जरूर बात है कि बाहर से जो आक्रांता आये, कुछ तो ऐसे आये जो सिर्फ लूट-पाट करके चले गये। लेकिन जब ये लगा लोगों को कि ये अब अपना साम्राज्य स्थापित करेंगें, और साम्राज्य स्थापित करने के साथ -साथ ये जो यहाँ कि संस्कृति है उसमें वे अपना स्थान बनायेंगें और तोड़-फोड़ करेंगें। इसलिए टकराहट तो होती है। उसके गहरे निहितार्थ हैं और मैं किसी पार्टी का नाम नहीं लूँगा। सारी पार्टीयां , ऐसी कोई पार्टी नहीं है जो इस कार्ड को नहीं खेलती है। ये कोई बहुत अच्छी बात नहीं है इस देश में। सत्ता के लिए हमेशा से संघर्ष होता रहा है। और, एक दूसरे से टकराना और टकरवाना, ये तो अँगरेजों की भी नीति  थी , फूट डालो और राज करो, एक दूसरे को लड़वाओ और राज करो।  सत्ता का जो चरित्र है वो एक जैसा ही है। इसलिए कबीर जो है वो किसी चारदीवारी में नहीं रहते हैं, किसी हद में नहीं रहते हैं, वो इन सबों से ऊपर हैं। तो अस्मिताएँ टकराएंगी , तोड़-फोड़ तो होंगीं उसमें। और यह जो वर्चस्व की राजनीति है ये जो पोलराइजेशन है वह चाहे जो भी रूप ले ले। लेकिन एक स्वस्थ समाज में अच्छा नहीं माना जायेगा। हम लोग विकास की बात करते हैं |आप किसी को पीछे धकेल के विकास नहीं कर सकते हैं। ग्रोथ तो हो सकता है ! लेकिन जो ग्रोथ या बढ़ोतरी होती है वह एकतरफा होती है और विकास सर्वांगीण होता है। विकास तो समेकित होना चाहिये , सबका होना चाहिये। और सबका विकास तभी हो सकता है जब आप सबके लिए शुभेच्छु हों। इसलिए आप लोगों को लड़वाने नहीं बल्कि जोड़ने का काम करें। और यही कबीर करते हैं। अब इसके लिए उन्हें रास्ते अलग अपनाने पड़े। वो द्विवेदीजी ( हज़ारी प्रसाद द्विवेदी) कहते हैं न कि ‘हो गया  तो सीधे सीधे नहीं तो दरेरा देकर’। इसलिए जहाँ दरेरा देने की ज़रूरत है वहाँ कबीर ने दरेरा भी दिया है। और मैं समझता हूँ कि अगर हमारा  समाज दरेरा देने से बेहतर हो सकता है तो ऐसा दरेरा क्यों नहीं देना चाहिए !

प्रश्न- सर, मुझे लगता है कि आज के समय में उस समय का जो मध्यकालीन सम्प्रदायवाद था उसकी जरूरत महसूस हो रही है। क्या आपको भी ऐसा लगता है ? सम्प्रदायवाद से मेरा मतलब उस समय के विभिन्न प्रकार के स्कूलों से है।

प्रो० अनिल राय हाँ, अलग- अलग स्कूल थे उस समय भी, जैसे निर्गुनियों  में भी देखेंगें आप कि कई सम्प्रदाय थे; कई शाखाएँ थीं । और, जब हम कबीर के संदर्भ में बात कर रहे हैं, तो कबीर पंथ की ही बहुत सी शाखाएँ थीं । और ये अजीब दुर्भाग्य है कि जिस संप्रदायवाद का, जिस पंथवाद का कबीर ने स्वयं विरोध किया था, जिस पाखंडवाद का कबीर ने विरोध किया , वही सब चीजें उनके पंथ में नहीं है।और तभी दुःखी होकर कमाल का उदाहरण देते हैं कि वह उनके सोच पर पानी फेरता है। तो आज के संदर्भ में जो संप्रदायवाद की बात कर रहे हो, सम्प्रदाय होना बुरी बात नहीं है। सम्प्रदाय का जो अंग्रेजी अनुवाद है, वह स्कूल है। इसलिए डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल ने जो निर्गुण साहित्य पर रिसर्च किया, उस किताब का अंग्रेजी में नाम है  The Nirgun School of Hindi poetry’ । और बाद में ख़ुद डॉ० बड़थ्वाल ने उसका हिंदी में अनुवाद किया, आधा से अधिक वे कर चुके थे, फिर उनकी मृत्यु हो गयी और बाद में उसका अनुवाद संभवतः डॉ० भगीरथ मिश्र या परशुराम चतुर्वेदी  ने किया। और उसका ठीक हिंदी में अनुवाद है ‘हिंदी काव्य में निर्गुण संप्रदाय’। लेकिन  एक विद्वान हैं गोविंद चातक ;उन्होंने अब उस किताब का नाम बदलकर ‘हिंदी की निर्गुण धारा’ कर दिया है। वो जो एसेन्स है वह तो चला गया। धारा आप कर दीजिये , लेकिन जो स्कूल है उसकी वही अवधारणा तो नहीं है !  क्योंकि सम्प्रदाय का सिर्फ यह अर्थ नहीं है कि वह वहाँ बैठ कर वे संत सिर्फ़ अनर्गल , आडम्बर , और सिर्फ धर्म की ही बाते करते थे। सम्प्रदाय का मतलब स्कूल। उस स्कूल या सम्प्रदाय में बैठ कर लोग विमर्श कर सकते थे, चिंतन कर सकते थे। वह जो स्कूल था उसमे  समाज की चिंता है , जीव और जगत की जो चिंता है,  दर्शन की जो परेशानियाँ है, जो अबूझ पहेली है संसार को लेकर , उन सब पर बैठ कर वे डिस्कोर्स करते थे , विमर्श करते थे। तो मैं नहीं समझता हूं कि वह जो सम्प्रदाय है वह कोई खराब बात है। आज का जो संप्रदायवाद है उस पर हमें चिंता करने की जरूरत है।  क्योंकि जहाँ ‘वाद’ हो जाता है वहाँ की रूढ़िवादी चीजों को भी आप स्वीकार करने लगते हैं। वहाँ आपका एक दायरा बन जाता है और वहाँ से आप बाहर नहीं निकल पाते हैं।

प्रश्न- क्या इसे राजनीति और सत्ता के साथ भी जोड़ कर देख सकते हैं ?

प्रो० अनिल राय बिल्कुल , और उस समय जो राजनीति और सत्ता का गठजोड़ था, उसके ख़िलाफ़ तो संतों ने बहुत काम किया है। निर्गुण संतों को छोड़ भी दीजिये तो सगुण भक्तों ने भी आगे बढ़ कर उसमें हिस्सा लिया है। और आप देखिये कुम्भनदास ने कहा

‘संतन को कहा सीकरी सों काम ?

आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरि नाम।।

जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परी सलाम।।

कुभंनदास लाल गिरिधर बिनु और सबै बेकाम।।‘

अब इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि सत्ता प्रतिष्ठान को कवि लात मार रहा है। लेकिन लात मारने के पीछे कारण यह था कि उनका आचरण इस प्रकार का था उनका व्यवहार इस प्रकार का था। इसलिए आप देखेंगे कि कबीर जो है ‘कथनी और करनी’ की बात करते हैं। आज जो सबसे बड़ा फर्क है  वह यह कि आज का जो समाज है, वह झूठ भी ऐसे बोलता है मानो सत्य बोल रहा हो, यह कैसा पोस्ट ट्रुथ है जो झूठ पर आधारित है ! इसी के खिलाफ तो हमारा पूरा भक्ति साहित्य आवाज उठाता है और इसके खिलाफ संघर्ष करता है।

प्रश्न  भक्तिकाल में शैवों  और वैष्णवों के बीच एक द्वंद्व दिखाई देता है। तो क्या कबीर के यहाँ इसका जिक्र मिलता है?

प्रो० अनिल राय  जो दार्शनिक सरणियाँ हैं और उनका जो पाखंडवाद है ,उसको भी कबीर तार-तार करने की कोशिश करते हैं। कबीर का एक छंद है । उसमें जो षडदर्शन हैं और उनमें जो व्याप्त पाखंड है, उस पर कबीर चोट करते हैं-- .. छह  दरसन छियानबे पाखंड, आकुल किनहूं न जाना |

                      जप तप संजम पूजा अर्चा ,जोतिग जग बौराना | |  

प्रश्न-  कबीर लोक और शास्त्र में  लोक को एक ताकत के रूप में इस्तेमाल करते हैं। तो इसका क्या मतलब ?

प्रो० अनिल राय उसका कारण है, और यह बहुत पॉपुलर सवाल है। इसको लेकर बहुत चर्चा हुई है- कबीर के संदर्भ में। लोक और शास्त्र का जो द्वंद्व है वह कबीर के यहां बहुत ज्यादा है। उसका कारण क्या है ? उसका कारण यह है कि - अगर मैं अपने गुरुवर डॉ० विश्वनाथ त्रिपाठी के शब्दों को उधार लेकर कहूँ  ( उनकी एक किताब है -लोकवादी तुलसीदास । उसी से मैं लोकवादी शब्द ले रहा हूँ। ) -  तो  कबीर लोकवादी थे। और कबीर यह मानते थे कि शास्त्र बुरा तो नहीं पर जब वह किसी वर्ग विशेष का हथियार बन जाय तो उसका दुरुपयोग होता है | कई बार वह शोषण का औज़ार भी बन जाता है |

  जिस समाज में हम रह रहे हैं उस समाज में रहकर अगर हम कोई अच्छा काम नहीं करते;  तो कबीर कहते हैं कि ‘तुम यह कैसे सोचते हो कि तुम्हारा  सब अच्छा हो जाएगा’। तो कबीर कहते हैं कि अपने आप को सुधारो। आज  देखिये कि क्या हो रहा है? आज आप कब ठगे जाएँगे क्या यह निश्चित है ! आज जो आदमी आपके पास है और आप उसे अपना नजदीकी और शुभचिंतक मान रहें हैं, लेकिन फिर भी आप संशय में जी रहे हैं । आपको लगता है कि पता नहीं कौन कब आपको ठग ले! और कबीर ठीक इससे उल्टी बात करते हैं। वे कहते हैं कि आप ठगिये मत किसी को! उनका दोहा  है

 कबिरा आप ठगाइये और न ठगिए कोय।
आप ठगे सुख होत है और ठगे दुख होय।।’    बड़े गहरे निहितार्थ हैं इस दोहे के !

आप कितने समय तक यंत्र बने रहेंगे ? जब आपके भीतर मनुष्यता की भावना जगेगी। तब आपको लगेगा कि यार किसी को ठगना बुरी बात है, अच्छी बात नहीं है। और कभी यह महसूस कीजिए आप कि कोई आपको ठग लेता है तो थोड़ी देर के लिए कष्ट तो जरूर होता है। किन्तु  जब आप किसी को ठग लेते हैं, और कभी आपके अंदर की मनुष्यता जागेगी तो आपको आत्मग्लानि अवश्य होगी। यह भी तो एक दर्शन है।इसी को कहते हैं आत्म साक्षात करना। अपने भीतर झाँकना। बुद्ध ने तो कहा ही है- ‘ अप्प दीपो भव’-  अपना दीपक/ प्रकाश स्वयं बनो। कुछ ऐसा ही कबीर कहते हैं-

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय |

जो दिल खोजाँ आपना, मुझसा बुरा न कोय ||

 

हम सारी दुनिया को बुरा कहते हुए चलते हैं कि यह बुरा है वह बुरा है। लेकिन हमें यह देखना होगा कि जब हम दूसरे की तरफ अपनी एक उंगली उठाते हैं तो बाकी बची उंगलियाँ हमारी तरफ इशारा कर रही होती हैं। कबीर से हमें यही संदेश मिलता है कि अगर बुरा करोगे , तो उसका फल हमेशा बुरा ही मिलेगा, अच्छा कभी नहीं मिलेगा!

प्रश्न-  इन दिनों जातिगत संगठन नए-नए तैयार हुए हैं। और कबीर अनेक जातियों का जिक्र करते हैं। तो क्या वास्तव में वहां अलग- अलग संगठन जैसा कुछ था, या तमाम जातियों के बीच परस्पर प्रेम था?

प्रो० अनिल राय- देखिए दोनों चीजें मिलती हैं । प्रेम और सद्भाव भी था और टकराहट भी थी। टकराहट अगर नहीं होती , तो समूचे भक्ति आंदोलन का यह लक्ष्य नहीं होता कि ‘जाति न पूछो साधु की’। ‘जात पांत पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।’ जाति के बंधन तो थे ही ! वर्ण व्यवस्था इतनी जकड़ी हुई थी और भक्ति आंदोलन के पीछे का एक बहुत बड़ा कारण वर्ण व्यवस्था भी है। मैं समझता हूं कि आज  आप देखें , कि क्या जाति के बंधन आज ढ़ीले पड़े हैं ? और अगर ढ़ीले पड़े हैं तो उसका बहुत बड़ा कारण सामाजिक सोच में बदलाव है। और जो टेक्नोलॉजी है ,और मनुष्य की जो जरूरतें हैं, उन जरूरतों ने उन दोनों को साथ लाने की काफी कोशिश की है। आजकल घटनाएं सुनने में आ रही हैं  कि किसी  दलित  को प्रताड़ित किया गया.. इत्यादि,इत्यादि | वर्षों पहले ऐसी घटनाएँ न के बराबर मिलती थीं | मैं आपको उदाहरण देता हूँ ; मेरे गाँव में मेरे घर के पीछे दलितों की बस्ती है। उसे  हमारे पुरखों ने बसाई थी। मैं बचपन में कभी किसी को काका या किसी को दादा कहा करता था।आज तो ऐसी स्थितियां नहीं है। क्यों ऐसा हो रहा है ! इधर 50 सालों में एक दूसरे के प्रति इतना अविश्वास पैदा हो रहा है। इसका कारण यह है कि लोगों ने आइडेंटिटी से जोड़कर राजनी तिक  संगठन बना लिए हैं | मैं समझता हूं उसने बहुत नुकसान किया है । वो जो पारस्परिकता थी ,वह धीरे -धीरे खत्म हो रही है। ये और बात है कि पढ़े -लिखे समाज में इस तरह का नहीं है।  मेरे बहुत से मित्र हैं जो दलित हैं। वो मेरे साथ स्कूल में थे और आज भी उनसे मेरी दोस्ती है , उठना-बैठना है, घर में खाना -पीना होता है। तो इतनी भी ख़राब स्तिथि भी नहीं है। लेकिन जब संगठन के स्तर पर आप उसे ले जाते हैं तो वहाँ स्पेस नहीं मिलता है। 

प्रश्न  क्या इसके लिए मीडिया  को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं ?

प्रो० अनिल राय  आज का जो  मीडिया है वह इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है। मीडिया कैसी तस्वीर पेश कर रहा है ?जो पॉजिटिव चीजें हैं वह तो मीडिया नहीं दिखायेगा (और मैं आपको बता दूं कि जो पॉजिटिव चीजें हैं ,जो सकारात्मक चीजें हैं , उनका व्यापक असर समाज पर पड़ता है। ) चाहे आप प्रिंट मीडिया को ले लीजिये, या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ले लीजिये । दोनों ही जगह नकारात्मक चीज़ों को ज्यादा प्रोजेक्ट किया जा रहा है।  हो सकता है कि समाज में इस प्रकार की घटना हो भी रही हो, जैसे आप देखें कि छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं  की ख़बरें लगातार आ रही हैं । तो इससे हम ये नकार नहीं सकते हैं कि  समाज में सब कुछ ठीक ही हो रहा है। लेकिन मीडिया को  बिकाऊ नहीं होना चाहिए।

प्रश्न-  इधर जो स्त्री विमर्श या जेंडर समानता की बात की जा रही है, वह किस रूप में कबीर के यहाँ दिखाई देती है ?

प्रो०अनिल राय- कबीर को एक अजीब तरीके से पेश किया गया है खासकर जेंडर डिस्कोर्स को लेकर।  मेरा काम ही  कबीर पर है। ( मैंने एम्. फिल. कबीर पर किया था , और विषय जेंडर से संबंधित था। )आम  धारणा यह है कि कबीर नारी के निंदक हैं और नारियों को उन्होंने बहुत भला बुरा कहा है। । कबीर को पढ़ते समय मैंने सूर को भी पढ़ा और तुलसी को भी । सगुण काव्य का कोई भी  ऐसा प्रतिनिधि कवि नहीं है जिसके यहां नारी निंदा न मिलती हो। लेकिन अब देखें कि कबीर ने  नारी के जिस रूप की निंदा की है, उसकी तस्वीर कैसी है। उन्होंने वेश्यावृति की तो निंदा की है। लेकिन वेश्या की जो समस्या है , उससे भी कबीर जूझते हैं। जैसे, मैं कबीर का  एक उदाहरण देता हूं – ‘बेस्याँ  के घर बेटा जाया , पिता नाम कस कहिये।’ इसका अर्थ यह है कि वेश्या के घर में बेटा पैदा हुआ है, अब उसके पिता का नाम किसे दिया जाय ?।यह बहुत बड़ी समस्या है। तो कबीर इस तरह के प्रश्न खड़े करते हैं।

वह जो बेचारी वेश्या है वह तो स्त्री है न ! अब इसे आज के संदर्भ से जोड़ कर देखिए कि वह अगर आज स्कूल में  अपने बच्चे का नाम लिखवाने जाती है तो बच्चे के पिता का नाम क्या लिखवा येगी? तो क्या कबीर उसके प्रति सहानुभूति व्यक्त नहीं करते हैं ?  वह सवाल नहीं करते कि वह अपने पुत्र के  पिता का नाम क्या बतायेगी। उसको मालूम है कि यह किसका बच्चा है लेकिन वह बता नहीं सकती। वह कोई प्रभु वर्ग का भी हो सकता है  ,जिसका नाम नहीं लिया जा सकता । चूँकि वह तमाम लोगों से मिलती है, उसका वह पेशा है। आखिर किसी मज़बूरी बस ही उसने यह सब शुरु किया होगा ! तो वेश्यावृति की तो कबीर निंदा करते हैं लेकिन समाज में वेश्या की समस्याओं को एड्रेस करते हैं। और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कबीर भक्ति काल के  कवि हैं, और जहां भक्ति सबसे बड़ा मूल्य है। इसलिए भक्ति में जो भी बाधा आती है , कबीर उसकी निंदा करते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्होंने सिर्फ नारियों की निंदा की है। पुरुषों की भी  निंदा की है। वे कहते हैं – ‘जिहिं  नर राम भगति नहि साधी ॥ सो जनमत कस न मुओ अपराधी।‘ इससे भी बड़ी गाली हो सकती है ! वे  कहते हैं कि जिसने राम की ( अयोध्या वाले राम नहीं, कबीर के अनुसार राम मतलब परमात्मा ) आराधना नहीं कि वह जन्मते ही क्यों नहीं मर गया?तो ऐसा नहीं है कि कबीर सिर्फ नारियों की निंदा करते हैं। माँ को लेकर जो कबीर छवि व्यक्त करते हैं – ‘हरि जननी मैं बालिक तेरा, काहे न औगुण बकसहु मेरा॥’ पत्नी का जो स्वरूप प्रस्तुत करते हैं – ‘दुलहिनि  गावहु  मंगलचार। हम घरि आए  राजा राम भरतार।‘ जो आदमी अपने को खुद को स्त्री के रूप में प्रस्तुत कर रहा है ,स्त्री बन कर उस परम् प्रिय की साधना कर रहा है ,वह मुझे नहीं लगता कि वह स्त्री विरोधी हो सकता है! एक पद आपको मैं बताता हूँ, जिसमें कबीर ने अपना पेशा छोड़ रखा ( कबीर कपड़ा बुनने-सिलने का काम करते थे) है। तो कबीर की माँ ये सब देख कर काफी दुखी होती है। वह सोचती है कि कबीर का विवाह हो गया है, उसके बाल -बच्चे हैं और इसने अपना काम छोड़ दिया है। वह छुप छुप कर रोती है कि इसका निर्वाह कैसे होगा। माँ के ह्रदय में अपने बेटे के भविष्य को लेकर जो चिंता है , उसका कितनी गहरी संवेदना के साथ कबीर ने चित्रण किया है। (मुसि,मुसि रोवै कबीर की माई,ए लरिका क्यूँ जीवें खुदाइ ),क्या इससे कबीर स्त्री विरोधी लगते हैं ? मैं नहीं मानता कि कबीर स्त्री विरोधी हैं। हां, जहां- जहाँ स्त्री माया के रूप में आती है वहां कबीर उसकी आलोचना करते हैं।

प्रश्न कबीर के यहां जो बोध का यथार्थ है और यथार्थ के  बोध के बीच जो टकराहट है उसे आप किस प्रकार देखते हैं?

प्रो० अनिल राय -- यह बहुत जटिल सवाल है !  लेकिन मुझे लगता है कि कबीर  दोनों में संगति बैठाने की कोशिश करते हैं। जो यथार्थ है उससे सीधे-सीधे टकराते हैं। और उस यथार्थ के बोध को अपने निजी अनुभव और उसके भी आगे अभिव्यक्ति  के स्तर पर लाने की कोशिश करते हैं। तो कबीर का उद्देश्य था कि हमारा बोध (मतलब हमारी समझ) वैज्ञानिक होनी  चाहिए। इसलिए आप देखेंगें कि कबीर प्रश्नाकुलता  के रचनाकार हैं। इतने सारे  सवाल वे करते हैं। खुद से भी करते हैं और समाज से भी करते हैं। मैं समझता हूं कि जब कोई अपने समय को लेकर बहुत चिंताग्रस्त होगा, वही अपने आप से सवाल कर सकता है और अपने समाज से भी कर सकता है। कभी कभी लगता है कि कबीर किसी खोह में जा रहे हैं और वहां से कुछ निकाल कर लाना चाहते हैं। इस तरह आप देखेंगे तो कबीर की जो कविता है वह बहुत ज्यादा आधुनिक भावबोध से  लबरेज़ है। बहुत- सी ऐसी चीजों का-- जैसे रूढ़ियों का, आडंबर का,अनाचार का,पाखंड का, अनैतिकता का, वे विरोध करते हैं |इससे  ऐसा लगता है कि मध्यकाल में भी कोई आधुनिक बोध का रचनाकार है, जो अपने समय के समाज को बहुत आगे लेकर जाना चाहता  है। और, इसीलिए कबीर हमें आज भी कहीं न कहीं  प्रासंगिक लगते हैं। आज भी वे  कहीं न कहीं दिशा देते हैं और हमारे साहित्य की दशा और दिशा को बदलना चाहते हैं।   

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