चंदना तथा अन्य कविताएँ

 

चन्दना

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(बुद्ध से विकर्षण चन्दना को जैन-भिक्षुणी बना देता है)

(दृश्य -एक)

किलन्हाई के दक्षिणी घाट पर

बारिश से

भीगी चन्दना

अपनी सफेद धोती के उर्ध्व भाग को

हवा में झटकते हुए

दूसरे घाट पर

सद्यस्नात बुद्ध को देखती है

जैसे सीय ने राम को

जैसे चाँदनी ने चकोर को

जैसे मैंने तुम्हें पहली बार देखा है

(दृश्य-दो)

वृद्ध चाँदनी में लिपटे रवि शिशु की तरह

किलन्हाई की जलधारा में

सद्यस्नात बुद्ध

दीपदान करते हुए अजपा जप रहे हैं

जैसे अपने अन्तर्मन में किसी को आमंत्रण दिया हो



(दृश्य-तीन)

कौशाम्बी के अंतिम छोर तक

फैले, फूले कास, कुश, सरपत, गारण

तुलसी, धान-मंजरी

भंवरों और तितलियों का केलि-रव

किलन्हाई से शशि- डाह करने के लिए पर्याप्त है


(दृश्य- चार)

चंदना

धान के बीचोबीच मेड़ पर

गिरती,सम्भलती

सरपट नंगे पाँव भागती है

जैसे सद्यस्नात बुद्ध ने उसे छूना चाहा हो



(दृश्य-पांच)

किलन्हाई के दक्षिणी तट पर

धान- मंजरियों से

भीगी, भागती चंदना

बुद्ध के ऊपर

कभी कास, कभी सरपत के फूल फेंक रही है

जैसे उनसे बचने का जतन कर रही हो



(दृश्य- छः)

नदी के बीचोबीच

खड़ी,सिहरती,अनुरक्त चन्दना को

पूर्वा ने छुआ

जैसे उसे बुद्ध ने छुआ

जैसे चकोर ने शशि को

जैसे तुमने मुझे...



(दृश्य - सात)

बुद्ध

एक नहीं दो बार आये कौशाम्बी

दो बार मिले चन्दना से

दो बार आँखें अनयन हुईं



( दृश्य - आठ)

दूसरी बार जाने के बाद

बुद्ध फिर कौशाम्बी नहीं लौटे

जैसे जाना उनके लिए महज क्रिया हो

चन्दना के लिए - गायब हुई आत्मा

किसी का जाना

गायब हो जाने से ज्यादा दुखदाई नहीं होता



(दृश्य - नौ)

जीवन आसमान सा बड़ा कैनवास है

उसमें स्मृतियाँ मेघों की तरह आती हैं,

रंग बदलती हैं, मिट जाती हैं

इस बार महावीर कौशाम्बी आये

चन्दना से मिले

किन्तु बुद्ध की तरह लौटे नहीं...



 

 

 गोझी

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(दृश्य : पूर्वदीप्ति)

कोहबर की स्मृति गनगौर को सुहागिन बना देती है।।

( दृश्य : एक)

होलिका के दूसरे दिन

कौशाम्बी की शापित नगरी

'पुरुब-पच्छू' के लोग

गोफना, गुलेल लिए

एक दूसरे पर

कंकड़ -पत्थरों से प्रहार करते

कि अब गिरा, अब गिरा

जैसे शिकारी कोई गिद्ध ‌।।


(दृश्य दो)

घर के भीतर

शोकाशोक

सुहागिन स्त्रियाँ

कोहबर की स्मृतियों में डूबी

पियरी, सिंधौरा को ताकती

जैसे उनके भीतर

कोई काली साया बार-बार

उन्हें विधवा कर रही हो ।।



(दृश्य-तीन)



बबूल, कीकर, नीम से घिरे

ऊंचे-ऊंचे टीलों के उस पार

सदिच्छ क्रीड़ित समर से

गिरती लाशें

टूटकर हवाओं में तैरते क्षत-विक्षत दंत

पत्थरों की टंकार में खोई

रुदन और अट्टहास की प्रतिध्वनि

नवोढ़ा स्त्रियों के लाल- लाल सिन्दूर सा

प्रतियोगी पुरुषों के पोर-पोर से

अनवरत बहता रक्त

हा वीभत्स! हा वीभत्स! हा वीभत्स!



(दृश्य - चार)



चौपाल में बैठे वृद्ध पुरुष

अतिथि, पुरोहित, वामकर्मी

गोझी की चर्चा करते बार-बार । उसी सभा से,

एक वृद्ध वामकर्मी ने कहा -

बहुत समय पहले

उत्तरफाल्गुनी के किसी दिवसावसान में

कामातुर क्षत्रिय कुमारों ने

सघन वन के बीच

पालकी आरूढ़ नवोढ़ा स्त्री का शिकार किया था

उस रक्त- संपृक्त बलात्कृता ने

इस नगरी को शाप दिया था

तब से

चैत्र कृष्ण पक्ष में

गोझी का यह शापित खेल होता आया है

फिर चौपाल ने समवेत स्वर में कहा -

घृणीत ! हा दु:ख ! हतभाग्य!



(दृश्य - पाँच)



नवोढ़ा स्त्रियों के रक्तिम सिन्दूर सी

सांझ के आकाश में फैली-सिमटती हुई

सूर्य की लाल-लाल कणिकाएं

स्वेत कणिकाओं में परिवर्तित होती हुई

कुछ प्रतियोगी पुरुषों की आत्मा को

बर्फानी गुफा में छिपा देती है

उनकी घायल मृत देह उनके घरों में भेजे जा रहे हैं

कुछ नवोढ़ाएं घंटियां बजाते हुए

दीप प्रज्वलन कर रही हैं, वे शिव की आरती गा रही हैं

कुछ शोकाकुल नवोढ़ाएं रोती-बिलखती

छाती पीटती

कभी गोझी को गाली देती

कभी अपने पिता को

कि उनका ब्याह इस शापित नगरी में क्यों किया



(दृश्य - छः)



फाल्गुन पूर्णिमा के बाद

पंचदश दिन

शापित नगरी की शाम विधवा हुई

बच्चे अनाथ हुए

तुलसी चौरा अदीप्त हुई

शंख मूक विधवा विलाप करते रहे

पंचदश दिन

बुजुर्गों की आँखें

उबलते, गर्म आँसुओं में डूबी रहीं



(दृश्य - सात)



दृश्य

मानस में

तिल-तिल खिसकते, तांडव करते,सिमट जाते हैं

तिथियाँ आती हैं, रोती-बिलखती हुई चली जाती हैं

क्रीड़ा में जो मारे गये

वे लौटेंगे नहीं क्योंकि उन्हें अब लौटना नहीं

केवल उनकी स्मृतियाँ

नेपथ्य में

बची हैं, कुछ दिन बची रहेंगी, दुख देंगी।।



(दृश्य - आठ)

एक चक्र के बाद

फिर लौटी चैत्र की शुक्ल तृतीया

जैसे गोझी में शाम लौटी

और सुहागिनों के दिन

वे निर्जला व्रत रखती,

मिट्टी की शिव मूर्तियाँ बनाती, पूजन-वंदन करती

गौरा गीत गाती -

"गौर रे, गनगौर माता खोल ये किवाड़ी

बाहर उबी तेरी पूजन वाली"

फिर ....।।


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* गोझी एक प्रकार का खेल है। यह कौशाम्बी जिले के पूरब शरीरा और पश्चिम शरीरा नामक गाँवों (अब नगर) के बीच सन् 1990 ई. तक खेला जाता रहा है। इस खेल में गाँव के युवा भाग लेते थे। वे गोफना,गुलेल के माध्यम से एक दूसरे पर पत्थर मारते। यह प्रक्रिया होलिका दहन के दूसरे दिन से गणगौर तक (यानी पन्द्रह दिन) चलती रहती थी। इसमें कई युवाओं की मृत्यु हो जाती तो कई घायल हो जाते थे। कुछ घायल व्यक्ति जो उस समय हुए थे, आज भी दोनों नगरों में मौजूद हैं। वे इसे शाप कहते हैं।

 

 

कुकरौंधा

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(यह धरती एक रेलगाड़ी है और हम उसके यात्री)

लाकड़ाउन में

रेलगाड़ियां मेघपथ पर दौड़ेंगी

कुछ यात्री ताराओं की जगह लेंगे

कुछ दूसरे पसन्दीदा ग्रह में चले जायेंगे

गार्ड गाड़ी को लाल और सफेद बल्ब दिखायेगा

लाल बल्ब का मतलब ठहरना नहीं

बल्कि इस बार तीव्र गति से दौड़ना होगा

और सफेद का अर्थ

काला धुंआ उफनते मंथर गति से भागना ।

गाड़ी के कोच

या तो गर्म लोहे की तरह मुलायम होंगे

या बर्फ की तरह कठोर

वे यात्रा अनुकूलित नहीं होंगे

धरती के इस प्लेटफार्म से

रेलगाड़ियां दूसरे ग्रहों में पलायन कर जायेंगी

और बची रह जायेगी

दूर तक फैली कुकरौंधे की गंध..

 गद्य-कविता

बालकनी में बैठा हूँ। 'आत्मानंद' की फोटोग्राफी देख रहा हूँ । उसे देखते- देखते एक फोटोग्राफी पर रुक गया हूँ । तुम्हारी याद आ गयी है। मेरे पार्श्व से कबूतरों ने म्यूजिक की 'कमांड' दी है और हवाओं ने वायलिन बजाई है। फिर धीरे-धीरे पीपल ने अपने पत्तों को  गिटार बना दिया है। उनके 'विगनिंग सांग' को सुनते ही आत्मा में कोई मछली उदुक गयी है। अब "आत्मानंद" की फोटोग्राफी मेरे सामने नहीं है। बल्कि नीले प्रकाश के साथ वह धीरे-धीरे मेरी आत्मा में उतर रही है । कुछ बोलती नहीं , बस 'मीम' करती है और करती हुई आत्मा के दूसरे विंग में  चली जाती है। दाहिने विंग से लाल-लाल प्रकाश तुमको झूला झूलाते हुए आ रहा है, तुम कुछ कहना चाहती हो। मैं सुन नहीं पा रहा हूँ । बस मैं तुम्हें बड़ी तल्लीनता से देखता जा रहा हूँ ।  किसी खिलंदड ने लाइट की स्विचर बदल दी है । अब केवल दूर तक पीला प्रकाश पसरा है, जहाँ अब भी तुम्हारा इंतजार करता हुआ रुद्राक्ष की अंतिम गुरिया मध्यमा पर टिका रखी है...


- सुशील द्विवेदी 


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