सुघोष मिश्र की कवितायेँ
[सुघोष मिश्र हिन्दी के चर्चित युवा कवि हैं ]
1. होना
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| [सुघोष मिश्र ] |
होने को कुछ भी हो सकती थी वह
बारिश भी
कहीं भी बरस पड़ती बेपरवाह,
पर उसने नदी होना चुना
और मुझे पुकारती समुद्र तक गई।
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2. प्रेम कविता
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प्रेम था
आख़िरी सादा पन्ना
स्याही थीं आँसू की कुछ बूँदें
स्मृतियाँ
शब्द होने का संघर्ष करते
धुँधले अक्षरों की मृत्यु थीं
कविता थीं वे पंक्तियाँ
जो लिखी नहीं गईं।
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3. जाऊँगा
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हर वसंत फूल आएँगे इन लताओं में
मैं दुबारा नहीं आऊँगा
तुम्हारी अनुपस्थिति के अंधकार में खो जाऊँगा
स्मृतियों में प्रथम स्पर्श-सा चुभूँगा
हर
वसंत
जब
फूल
आएँगे
इन
लताओं
में
मैं सीढ़ियों से अपना उतरना याद करूँगा
तुम्हें भूल जाऊँगा
कहीं फूल बन खिल उठूँगा
धूल
में
मिल
जाऊँगा
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4.प्रतीक्षा
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प्रेम
जो होता है असीम
उसे सीमित करता है साथ—
हो सकता है वह किसी प्रेमी के दिल जितना छोटा
या किसी अँगूठी के वलय जितना संकीर्ण,
सौंदर्य
जो होता है निराकार
क़द्रदान उसे सजा सकते हैं दीवाल पर किसी फ़्रेम में
क्रय-विक्रय कर सकते हैं उस पर बोलियाँ लगा कर।
तुम जो किसी तितली की तरह सुंदर हो
मेरा दिल फूल-सा सिहरता है तुम्हें छू कर
जब तुम चली जाती हो हर बार
वह तुम्हारे लौट आने का करता है इंतज़ार।
अपनी संपूर्णता में व्याकुल—
पुकारता है चारों दिशाओं में तुम्हें नि:शब्द
एक-एक पंखुड़ी संग
तुम्हारी स्मृति की धूल में सो जाता है।
कोई महक तुम्हें खींचेगी कभी
तो फिर आओगी तुम,
चुन लेना यहाँ कोई फूल ज़रूर
वे तुम्हारी कामना में खिलते हैं
महक सँजोए हुए मुरझाते हैं।
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5.क्या सचमुच प्रेम से रिक्त हो चुका हूँ मैं!
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एक
पिल्ले मेरे पाँव चूमकर मुँह फेर लेते हैं
चिड़ियाँ मेरे चुमकारने पर चली जाती हैं दूर
बिल्लियाँ हैं जो सर्द रातों में दरवाज़ों पर
दस्तक देती हैं और
दीनता से पूछती हैं—आऊँ?
कभी पास आकर पूँछ फेरती हैं, मना करने पर
शैतानी आँखों से डरा
सोचती हैं मैं उन्हें सचमुच कर बैठूँगा प्रेम
जो जितना भरा है दैन्य से उसमें छिपी है उतनी हिंसा
यह मुझे बिल्लियाँ बताती हैं।
दो
सबसे अनमोल रत्न खो देने के बाद जब अकिंचन था
मैंने बंद कर दिया दरवाज़ों पर ताले लगाना
खिड़कियों पर चटकनियाँ
उन दिनों आने लगीं थीं बिल्लियाँ
बेरोकटोक… अनायास…
मेरे दुःख पर आँसू बहाने,
अपना रोना भूल मैं उन्हें बँधाने लगता ढाँढस
यह सोचकर ग्लानि में होता
कि रोने से हो सकती है हिंसा
जो किसी बिल्ली के दुःख का कारण बन सकती है
वे करुणा की प्रतिमूर्तियाँ थीं
या संभवत: कुशल अभिनेत्रियाँ।
तीन
बिल्लियों के साथ होने से होता है लोकापवाद
बिल्लियाँ भी होती हैं अफ़वाहबाज़
यह मुझे मुर्ग़ियों ने बताया
जिन्हें ईश्वर ने बनाया ही इसलिए था
कि वे तंदूर में भूनी जाएँ
या मय के साथ गटका ली जाएँ ईश्वरपुत्रों द्वारा
जिन्होंने एक ही अपराध किया था अपनी नियति स्वीकार कर लेना
जिन्होंने एक ही प्रतिरोध किया था बिल्लियों से असहमति दर्ज करना
मुझे नशे में देख उन्होंने खेद प्रकट करते हुए कहा :
बिल्लियाँ बताती हैं स्त्रियाँ इसलिए दूर हुईं तुमसे
कि तुम्हारे पास अनेक थीं स्त्रियाँ
कि तुम थे हिंसक कि तुम थे नपुंसक कि तुम थे…
कि मैंने याद किया जब भगौने में रखा दूध
चट कर पेट न भरता वे चाट डालती थीं
कामदग्ध देह से निकलता स्वेद
विछोह में झरते अश्रु
प्रथमांतिम प्रेयसी की कामना में बहता हुआ वीर्य तक चाट डालती थीं—
बिल्लियों ने बताई मुझे कृतघ्नता की परिभाषा।
चार
बिल्लियाँ कुशल योजनाकार थीं
वे बिल्लों, कुत्तों, चूहों सबसे गाँठ जोड़कर चलतीं
कबूतरों पर वात्सल्य लुटातीं
मनुष्यों से जुड़ते हुए रहतीं सतर्क
जुटातीं सारे नक़्शे दस्तावेज़
तलाशतीं कोई चोर दरवाज़ा,
शाकाहारियों के समक्ष वे ऐसे बैठतीं चुप
कि आज तक मुँह ही न खुला हो जैसे
मांसाहारियों के सामने ख़ून सनी ठिठोलियों बीच
सुखमग्न पलटियाँ खाने में तनिक देर न करतीं
जब मैंने उन्हें गालियाँ देने के लिए मुँह खोला
तभी मौक़ा देख मुर्ग़ियाँ चली आईं मुँह में
और गालियाँ लिए पेट में पच गईं—
बिल्लियाँ जाते-जाते मुझे मुर्ग़ियाँ खाना सिखा गईं।
पाँच
एक बार एक व्यक्ति ने एक बिल्ली पाली
निसदिन उसे ही निहारता
उसकी आँखें बिल्ली-सी हो गईं
उसकी पत्नी उसे छोड़ चली गई
लोगों ने दोषी क़रार दिया बेचारी बिल्ली को
किसी ने नहीं कहा कि जब वह
एक हाथ से बिल्ली की पीठ रगड़ता
दूसरे से सहलाता अपना शिश्न
कि वह किसी कुतिया के साथ यही करता था
और एक गाय के साथ भी
सब ने बस यही कहा—
बिल्लियाँ बर्बाद कर सकती हैं।
छह
बिल्लियाँ
आँसू की बूँद-सी नि:शब्द
टपक कर गालों पर ढुलकती दबे पाँव
चिबुक चूम कर अदृश्य हो जाती हैं
अँधेरों में
उनकी आँखें तारों-सी चमकती हैं
उनकी पीड़ाएँ आकाशगंगाओं से उतरती हैं
और खटिए पर कविता की तरह पसर जाती हैं
उनका रोना मृत्युशोक-सा कारुणिक है
उनके थके हुए पंजे भटकते हैं दरवाज़ों पर
उनके निर्दोष चेहरे से झाँकता है विचित्र सम्मोहन।
सात
सौंदर्य और हिंसा का अद्भुत संयोग हैं बिल्लियाँ
हमारे सबसे कमज़ोर पलों की साथी
हमारे अकेलेपन की राज़दार
हमारे नशे के लिए ज्यों ज़रूरी कोई शराब
और हम हताशाएँ अपनी मढ़ देते हैं
उनके नरम और ख़ूबसूरत माथे पर,
मैं जितना दूर स्त्रियों से था कभी उतना बिल्लियों से हूँ अभी
वे मेरी स्मृति का अंश हैं या मेरी कविता का
मेरी आत्मा पर उनके पंजों के दिए घाव हैं
मेरी पलकों पर है उनकी अधूरी नींदों का भार
रात-बिरात आज भी दबे पाँव चली आती हैं वे
दु:स्वप्न-सी… अचानक…
इन दिनों मैं एक स्त्री के प्रेम में हूँ जिसे बिल्लियाँ पसंद हैं।
6.अँधेरे में -1
अँधेरे में दीखते हैं
हम सब भाई बहन
एक साथ
घर लौटे पिता को घेरे हुए
अँधेरे में
आंचल से ढिबरी बुझाती
दीखती है माँ
अँधेरे में
दौड़ते हुए
खुदवा के रेहार में
लग जाती है ठेस
अँधेरे में महसूस करता हूँ
अपने हाथों में
ग्रामीण प्रेयसी का खुरदुरा हाथ
इस तरह
सघन अँधेरे में
आँखें बंद किए जी लेता हूँ
अँधेरे में गुम कुछ सुनहले पल
अँधेरे में -2
अँधेरे में
साफ सुनते हैं हम
घड़ी में बीत रहे वक़्त को
एक-एक सेकेण्ड
अँधेरे में
सीढ़ियाँ उतरते हुए
लेते हैं हम सहारा
रेलिंग या दीवार का
अँधेरे में
छू जाती कोई छिपकली
और जोर से चौंक पड़ते हैं हम
हमें हो जाता आभास
ज़िन्दा होने का
अँधेरा
बेशक लाता है ठहराव
लेकिन हमें जीना सिखा जाता है
और सिखा जाता है संभल-संभल कर चलना
7.ईश्वर
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अंतिम बार देखा गया उसे
सूखे वटवृक्ष के तले
अपराजेय का विशेषण खो चुके
किसी महान योद्धा की तरह
घुटनों पर बैठे
किसी अकिंचन की भाँति दीन
चिंतातुर और शोकग्रस्त
जैसे कोई असफल रचनाकार
अपनी किसी कल्पना से पराजित
अपनी ही आत्मा से निर्वासित.
चाँदनी नदी में सेवार-से बिखरे
केश श्वेत सर्प-मंडली-से दिखते
चिंता की श्रेणियों-सी उलझी दाढ़ी
बरोहों-सी लटकती भू छूती
जिसमें झूलती थीं मकड़ियाँ और मृत तितलियाँ
वटवृक्ष के जड़ों-सी बेडौल अंगुलियाँ—
किसी साधक के निश्चय-सी दृढ़
प्रिय के कटुवचन-सी नुकीली
धरती को ऐसे जकड़ती थीं
जैसे प्रेम छूटने से पहले गहता है हृदय
कवि पकड़ता है अपनी अस्वीकृत कृति
मृत्यु से पूर्व थामता है कोई चारपाई के पाट.
निर्बल बाहु काँपती थी परोपकारों के भार से
गर्दन झुक गई थी स्तुतियों की मार से
मुख अनवरत दैवीय स्मित से दुखता था
वह अपनी ही धूप में जलता
अपनी ही बारिश में भीगता
अपनी ही शीत में ठिठुरता था
उसके दिल के कोटर में रहती थी गिलहरी मरी हुई
उसकी सूखी आँखों से झाँकती थी तड़पती मछली.
उसकी कल्पनाएँ ब्रह्मांड से विराट थीं कभी
पराक्रम शताधिक आकाशों से ऊँचा
सृजनशीलता सहस्र महासागरों से गहरी
और ऊर्जा कोटि सूर्यों से बढ़कर थी
उसकी श्वासों से गतिमान थे तारकपुंज
धमनियों में तिरती थीं आकाशगंगाएँ
उन्माद के चरम पर पहुँच
विखंडित हो गया वह अनंत तत्त्वों में
बनाया एक मंजुल चित्रफलक
कुछ रंग चुनकर रची चराचर सृष्टि
ऊर्जा और चेतना की कूँचियों से
भर दिया उन्हें विभिन्न आकृतियों में
स्वयं को सौंप दिया कला को सम्पूर्ण
अंत:स्थ को सकुशल पुनर्रचित कर
श्रम सिंचित सौंदर्य बिखेर दिया
रूप-शब्द-रस-गंध और स्पर्श में,
पुनः देखा पूर्वप्रयासों की ओर
और नवनिर्मित को भर लिया अंक में
एक सद्य:प्रसूता के औत्सुक्य से निहारा उसे
डूब गया सृजन के असीम सुख और अपूर्व थकान में.
तदनन्तर देखा उसने
उसकी अपनी वह कृति
छिटक चली जा रही दूर
बना रही नई आकृतियाँ स्वयं
भर रही नए रंग
उसमें अब नई कलाएँ और सभ्यताएँ हैं
भूख है, शोषण है, दमन है
नए-नए ईश्वर हैं : शक्तिशाली किंतु नश्वर
परिश्रमी ग़ुलाम उनके : कलावंत कृशकाय
अपनी रचना से पीड़ित
वह अधिक निष्ठुरता से करती
निर्माण और ध्वंस
ध्वंस और निर्माण
अंशपूर्ण सौंदर्य को करती अस्वीकार
दैवीय नियंत्रण से मुक्त
वह अग्रसर होती पूर्णता की ओर
अपने समूचे बिखराव के साथ.
सृष्टि उसकी युगों की साधना थी
एक अभूतपूर्व विराट स्वप्न
यथार्थ में स्वातंत्र्य-पक्षधर
प्रथम विद्रोही
जो कामना से उपजी थी
और प्रेम बन गई
मात्र कला न रह जीवन बन गई
कर्ता को कर गई
एकाकीपन के लिए चिर अभिशप्त
सशंकित उसने चीख़ते हुए कहा —
ईश्वर से नहीं हो सकतीं ग़लतियाँ !
कौन है मेरी प्रेरणा के पीछे ?
कहाँ है मेरा निर्माता ?
उसने हरसंभव शोध किये किंतु गया हार
निर्वात की नीरवता को मथ डाला
प्रचंड विक्षोभ से
किंतु नष्ट न कर सका अपनी कृति को
मोहवश
प्रायश्चित के तरीक़े अपनाए अनंत
किंतु असंतुष्ट रहा —
कृतियाँ नष्ट कर देती हैं कर्ता को
स्वयं रह जाती हैं सुरक्षित
कलाएँ दीर्घायु होती हैं
कलाकार का रक्तपान कर ,
वह हताश हो उठा
विचारों के ज्यामितिक संतुलन पर टिकी
भावों की अमूर्त ऊष्मा से अनुप्राणित
सृष्टि को आरम्भ में ही
छोड़ चला गया अधूरी
उस पर अंकित कर
अस्पष्ट अज्ञात हस्ताक्षर.
अब वह प्रकाश को भी देदीप्यमान करता
प्रकट नहीं होता
अभेद्य अंधेरों में विलीन हो गया है
अपनी कलाओं से उपेक्षित
कृतियों से तिरस्कृत
रचनात्मक व्याधियों से पीड़ाग्रस्त संक्रमित
वह न्याय की गुहार नहीं लगा सकता
किसी चिकित्सक के पास नहीं जा सकता
सिर्फ़ हँसता है या रो देता
ख़ुद पर तरस नहीं खाता
ज्ञान-भक्ति-योग की कोई राह नहीं पहुँचती उस तक
कलात्मक महत्त्वाकांक्षाओं के तड़ित में
झलक जाता है कभी-कभार.
वह शोक से ऊबकर रहस्य बन गया
अपनी ही परछाईं से भयभीत
छुप गया ग़लतियों के गह्वर में
किसी मासूम कीड़े की तरह —
ओह !
ईश्वर !
वह एक पागल कलाकार था.
8.सूखी बावली
__________
एक शहर है दिल्ली
जिसके एकांत में हर जगह
प्रेमरत युगल या सम्भोगरत कबूतर आश्रय पाते हैं
दिन ढलने के बाद यहाँ प्रेत उड़ते होंगे शायद
या प्रेमियों के स्वप्न जागते होंगे
नशे के धंधे होते होंगे या वेश्यावृत्ति
मालूम नहीं —
ये बूढ़ा चौकीदार बता सकता है या कुछ पुलिस वाले.
मुझे यहाँ एक परछाईं भर की तलाश है
जो मेरे एकांत में तनिक झाँक ही जाय तो चैन मिले
इतना ख़ाली हूँ भीतर से कि भरा-भरा रहने लगा हूँ
कहाँ-कहाँ नहीं भटकता-फिरता हूँ,
इस वासंती साँझ जहाँ बैठा हूँ
धूप किसी पीले अजगर-सी थकी
सरकती जा रही है बादलों पर
जो ख़ुद उतर जाएगी पश्चिम की घाटी में
विशालकाय लाल कीड़े को खाने
और यहाँ छोड़ जाएगी लम्बी परछाईं का केंचुल —
अजीब है ये दिल्ली की साँझ !
दिल की फ़ितरत भी अजीब है
पत्थर हो जाने पर भी धड़कनों का सोता फूटता रहता है
आत्मा गीली रहती है आख़िरी साँस तक
अनुपस्थितियाँ काई-सी जमी रहती हैं स्मृतियों में
रिक्तियाँ चमगादड़ों-सी चीख़ती हैं खण्डहरों में
सुख-दुःख ताक-झाँक जाते जब-तब खिड़कियों से
सीढ़ियों से उतरता प्रेम लहू के निशान छोड़ जाता है
आत्मीयताएँ व्यतीत होकर नष्ट नहीं होतीं किंतु
चमक खोकर भी वैभवशाली बनी रहती हैं,
बीतता समय दर्ज होता रहता है मिट्टी की डायरी में —
इतिहास समय का रथ है कलाएँ उसमें जुते घोड़े
कलाकर है सारथी : मनस्वी अनुशासित शक्तिमान.
यह अग्रसेन की बावली है
दिल्ली के सीने में धँसी हुई
किसी हत्यारे के तीर की तरह नहीं
माधवी के प्रेम-सी गहरी और शीतल
रानी जब उतरती थी बावली की सीढ़ियाँ
लाल-बलुए-पत्थर पलाश-फूल-से दहकते थे
भीगने से मुख पर आसंजनित केश
नाग-चन्द्र-सम्बंध का औचित्य सिद्ध करते थे
राजा के दुकूल बावली के दोनों सिरे छूते थे,
अहंकारी अट्टालिकाएँ आहों तले दब जाती हैं
प्रेम के प्रतीक बचे रहते हैं युगों तक
बावली बची है अब पानी सूख चुका है ...
गुम गया यहाँ रात्रिविश्राम करते शहंशाहों, फ़क़ीरों, व्यापारियों, बंजारों का इतिहास
उनके कहकहे, थकान और गीत बचे हैं
तृप्ति बची है उदासियाँ बची हैं,
किंवदंती है कि सूखने से पहले
इसमें जमा हो गया था काला पानी
जिसमें डूब गए अनगिनत सम्मोहित जन —
ये दिल्ली की प्रेतबाधित जगहों में शामिल है इन दिनों
यहाँ से सिर्फ़ ढाई किलोमीटर दूरी पर है संसद भवन.
वैसे मैं अधिक उम्मीद नहीं कर सकता इस जगह से
इसकी गहराई मेरे विषाद को और गहराती है —
कितनी देर से मेरी आँखें लगी हैं इसकी सतह पर
कितनी बार मेरी दृष्टि लुढ़कती रही इन सीढ़ियों पर
कितनी बार मैं ख़ुद को गिराता रहा हूँ कितनी ही नीचाईयों में
ओह! यह बावली
मुझे धरती के गर्भ तक नहीं पहुँचा देगी
मूल तक पहुँचने की सारी संभावनाएँ चुक गई हैं,
व्यर्थ है यहाँ बैठना जीवन जितना
मुझे तत्काल जलानी होगी सिगरेट
उठ जाना होगा पागलपन का बोझ उठाए
पहाड़गंज में पीनी होगी शराब
रात भर मुझे सड़कों पर लगेंगी ठोकरें
रात भर मैं तारों से करूँगा बात
रात भर मेरी आँखों से झरती रहेगी रेत
रात भर मैं चाँदनी से धुलूँगा अपनी आँख.
9.यात्रा
_____
असफलता मात्र एक स्थिति है
अभाव है अस्थाई समस्या
असामाजिकता कायरतापूर्ण बचाव.
एकांत है दैनंदिन युद्धभूमि में हत्यारों से लड़ने का पूर्वाभ्यास
अँधकार एक मलहम है अंत:स्थ घावों के लिए
प्रकाश आत्महत्या के विरुद्ध एक जिजीविषा.
आँखें साक्षी हैं सब कुछ पीछे छूटते जाने की
दृष्टि है अतीत की धूल झाड़ती हुई
वर्तमान में धँसकर देखने की तमीज़.
अनगिनत अग्निपथों का ताप सहते हुए पाँव हैं
कई नरकों से बाहर निकल आने की उम्मीद.
जीवन जो एक बहुमूल्य हार है
शृंखलाबद्ध दुर्घटनाओं से जड़ित
मृत्यु है इसके परित्याग का स्थाई सुख.
यात्रा इन सबके बीच एक सम्भावना है
खिड़की एक खुला आसमान
अतीत के चलचित्र देखती डूबती यादें हैं.
प्राची की सेज पर अलसाई है मुग्धा भोर
दिवस को सुकृत से कांतिमय बनाती दिव्या दोपहर है
अंशुमाली की बाट जोहती बैठी है आगतपतिका शाम
प्रेयस् को नीलकमल से लुभाती अभिसारिका रात है.
साथ हैं
स्त्रियाँ, पुरुष और बच्चे
हिजड़े, भिखमंगे, चने और चाय वाले
ड्राइवर, गॉर्ड, टीटी, पुलिस
मज़दूर, किसान, नेता और चोर
कवि, क्रांतिकारी, भूखे हुए लोग
हत्यारे, दलाल, खाकर अघाए लोग
पागल और मरीज़
शराबी और प्रेमी,
बीड़ी-सिगरेट पीते लोग
समोसे-पकौड़े खाते लोग
उलटियाँ करते और नाक-भौंह सिकोड़ते लोग
झूठ के धंधे करने वाले
सच की बेगारी करने वाले
न जाने कितने सारे लोग
देसी-परदेसी और विदेशी लोग.
बेजान पटरियों पर
चिंगारियों के फूल खिलाती
मिलन-बिछोह के दो स्टेशनों बीच
उम्र भर भागती,
हवाओं का हृदय बींधती हुई
रेलगाड़ी
एक कविता है
जो यात्रियों को उपमाओं की तरह नहीं ढो रही.
- सुघोष मिश्र

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