शाहीन बाग की बागी औरतें

[ युवा कवयित्री 'गुड़िया तबस्सुम' की कविता ]
 
 रोए!
चिल्लाए!
[गुड़िया तबस्सुम] 
और चुप हो गये
लाठियों के डर से...?

चुपचाप!
अपने घरों के किसी कोने में
रजाई के भीतर दुबक कर बैठ गये
और वो....
 सड़कों पर उतर आयीं हैं
उन्होनें सुना -
संविधान खतरे में है!
उन्होंने फ़ौरन खिड़कियाँ खोल दी
सारे दरवाजे खोल दिए
वे चौखटें लाँघ आयीं हैं
(शाहीन बाग की आन्दोलनरत औरतें)
दूधमुँहे बच्चों को भी साथ ले लिया है
और अपनी छातियों से चिपकाए फिरती हैं
हाड़ कँपाने वाली ठंड भी उनके इरादों को कमजोर नहीं कर पायी है
आधी रात को भी वो सड़कों से नहीं उठ रही हैं
वो शाहीन बाग की बाग़ी औरतें हैं
जो चौखटे लाँघ आयी हैं
जिन्होनें बाबरी खोने के बाद उफ्फ़ भी नहीं की थी
वो सविंधान की मर्यादा टूटते न देख सकीं
नहीं बनने देंगी वो संविधान के पन्नों को चाइना बल्ब की झालरें
वो नारें लगाएंगी !
वो कागज नहीं दिखाएंगी !
वो आजादी लेकर रहेेंगी !
वो इंकलाब चिल्लाएंगी !
वो शाहीन बाग की बागी औरतें हैं !
वो बगावत पर उतर आयी हैं !
वो संविधान को बचाएंगी !
© गुड़िया तबस्सुम

टिप्पणियाँ

Unknown ने कहा…
समयानुकूल एक दमदार कविता जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा. वक्त के संकट को कलमबद्ध करना कभी आसान नहीं रहा है, लेकिन आपने कर दिखाया. शुक्रिया.

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