कवि का जीवित रहना जरूरी है - डॉ. पी. एन. सिंह

               

गाँवनामा और पिता का शोकगीत के लोकार्पण की रिपोर्ट






अभिनव आत्रेय
“चन्द्रदेव यादव की कविताएँ इतनी अच्छी लगीं कि मैं नि:संकोच कह सकता हूँ कि यादव जी ने जो काम किया है वह अद्वितीय है l कम लोग हैं जो गाँव पर इतना सोच-विचार कर लिखते हैं l उन्होंने अपनी भावनाओं और अपने समय और समाज से लोगों को जोड़ दिया है l” ये विचार मशहूर चिन्तक और आलोचक डॉ. पी. एन. सिंह के हैं l उन्होंने चन्द्रदेव यादव की दो काव्य-पुस्तकों के लोकार्पण समारोह में ये विचार व्यक्त किए l

चन्द्रदेव यादव हिन्दी के पाठकों के लिए जाना-पहचाना नाम है l वे कवि-आलोचक और लोकसाहित्य के मर्मज्ञ हैं l ‘देस-राग’ नाम से उनका पहला कविता संग्रह एक दशक पहले प्रकाशित हुआ था l अपने समय और समाज के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ इस काव्य-संग्रह ने खड़ी बोली की कविताओं के समकक्ष भोजपुरी काव्य-जगत में एक प्रतिमान स्थापित किया था l उसके एक दशक बाद उनकी दो काव्य पुस्तकें अभी हाल में ही प्रकाशित हुई हैं—गाँवनामा और पिता का शोकगीत l प्रेमचंद जयंती के अवसर पर 31 जुलाई, 2021 को ‘संवाद’ संस्था की ओर से इनका ऑनलाइन लोकार्पण किया गया और उन पर एक लम्बी परिचर्चा हुई l इस अवसर पर हिन्दी के मूर्धन्य चिन्तक आलोचक डॉ. पी. एन. सिंह, मशहूर कवि-कथाकार प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, वरिष्ठ आलोचक डॉ. रामप्रकाश कुशवाहा, हिन्दी कविता के मर्मज्ञ प्रो. दयाशंकर त्रिपाठी, आलोचक प्रो. बजरंग बिहारी, युवा समीक्षक डॉ. प्रियदर्शिनी प्रिया और युवा आलोचक डॉ. आशीष मिश्र ने अपने विचार व्यक्त किए l    

एक दशक से भी अधिक समय से अस्वस्थ चल रहे डॉ. पी. एन. सिंह ने अपने संक्षिप्त संबोधन में इन दोनों काव्य कृतियों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि कवि का जीवित रहना ज़रूरी है l कवि नहीं रहेगा तो संसार तो रहेगा वह संसार जीने लायक नहीं रहेगा l कवि कुछ नहीं करता है तो भावनाओं को उकेर देता है; उससे लोगों को जोड़ देता है l यादव जी ने गाँव पर जो काम किया है वह बहुत महत्वपूर्ण है l इससे पहले कवि चन्द्रदेव यादव ने प्रेमचंद को याद करते हुए कहा कि प्रेमचंद के समय के ग्रामीण समाज की विसंगतियां आज भी मौजूद हैं, किन्तु उनमें कुछ नया जुड़ा भी है l यह ‘नया’ सकारात्मक कम, नकारात्मक ज़्यादा है l गाँवों का भौतिक विकास तो हुआ है, किन्तु उनकी आत्मा मर गई है l गाँव बिना डाल-पात के तने भर रह गए हैं l गाँव के लोग मजबूरी में गाँव छोड़ने पर विवश हुए, लेकिन जिस पगडंडी ने उन्हें राजपथ से जोड़ा उससे वे जुड़ नहीं पाए l

परिचर्चा की के आरंभ में डॉ. प्रेम तिवारी ने कहा कि ‘गाँवनामा’ में आज के गाँवों का यथार्थ है l भाव और संवेदना के स्तर पर यह एक लाजवाब काव्यकृति है l इसे पढ़कर त्रिलोचन और नागार्जुन की याद आई l आज की कविता की भाषा में यह कविता नहीं कही जा सकती l इस कविता की फुलवा, बनवारी, सुगम सिंह और सूरे, जिसमें कवि खुद भी है, को पढ़कर लगा कि मैं कविता नहीं, कहानी पढ़ रहा हूँ l चन्द्रदेव जी में ‘नंगातलाई का गाँव’ जैसी पुस्तक लिखने की क्षमता है l केदारनाथ सिंह ने भी गाँव पर कविताएँ लिखी हैं, लेकिन केदार जी की वे कविताएँ ऐसी हैं जैसे शहर में रहने वाला एक आदमी देख रहा है l वे दूरी से गाँव को देखते हैं l उनमें गाँव में जाने की ललक है, लेकिन जा नहीं पाते l चन्द्रदेव जी की कविताएँ पढ़ते हुए लगता है जैसे कवि गाँवों में जाने के लिए पगहा तुड़ा रहा है l चन्द्रदेव जी गाँव में जाकर कविता लिखते हैं l ‘गाँवनामा’ में कवि ने एक अद्भुत बात कही है कि कविता लिखना हलवाही जैसा काम है l ऐसा वही कह सकता है जिसने हल चलाया है l इसमें लोकतंत्र, साम्प्रदायिकता, दलित शोषण और स्त्रियों यानी विमर्शों की बात है l यह गाँव में दिखता नहीं है l प्रेम तिवारी के वक्तव्य पर टिप्पणी करते हुए संचालिका डॉ. सरोज ने कहा कि इन कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे मैं प्रो. यादव की आत्मकथा पढ़ रही हूँ l

प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने आज के किसान आन्दोलन की बात करते हुए कहा कि किसान थोपे जा रहे उजाड़ को निरस्त करने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं l गाँवनामा और पिता का शोकगीत में शोक का बड़ा स्रोत है जिसके कारण पिता का शोकगीत लिखा गया l वह क्या है? वह शोक है सादगी और भाईचारा l तात्कालिक राजनीति को छोड़कर देखें तो यह बड़ा युग-प्रश्न है l जो सादगी और भाईचारा गया है, वह कवि के दुःख का बड़ा कारण है l बिना राग के यह क्षोभ नहीं हो सकता था l यह दोनों संग्रहों में विन्यस्त है l यह राग बहुत गहरा है l सच्चा राग दोनों संग्रहों में है जो हमारे हृदय में संस्तरित हो जाता है l

1990 के बाद भूमंडलीकरण के कारण गाँव को लेकर बहुत सी कविताएँ लिखी गईं; जिनमें गाँव के बदलने और टूटने का दर्द है l पिता का शोकगीत की ‘सपना’ शीर्षक कविता के आधार पर कह सकता हूँ कि आज का हल्कू बहुत हैरान-परेशान है l पूर्वी उत्तर प्रदेश में छुट्टा पशुओं की बाढ़ आई है l ईति-भीति जैसी छ: आपदाओं में से यह भी एक आपदा है l देश में यह जो नई शोकगाथा बन रही है, यह कविता हमें वहाँ ले जाती है l चन्द्रदेव जी इस शोक और विषाद को उभारते हुए उस उम्मीद के उभरने का जतन कर रहे हैं l इन संग्रहों से गुज़रते हुए मैं शोक में नहीं डूबा हूँ, मुझे एक उम्मीद दिखाई दे रही है l बहुत पहले मैथिलीशरण गुप्त और गया प्रसाद शुक्ल सनेही ने भी किसानों को लेकर कविताएँ लिखी थीं l चन्द्रदेव जी जैसे कवि को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने सच्चे मन से इस राग की अभिव्यक्ति की है l

पुस्तक का लोकार्पण करते हुए 

                         

  मशहूर कवि-कथाकार प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह ने दोनों संग्रहों के लिए चन्द्रदेव यादव को बधाई देते हुए कहा कि इन दोनों कविता संग्रहों की कविताओं से मैं भलीभांति परिचित हूँ l पिता को लेकर जो लिखा गया है वह कविता में ही संभव था l कहानियों में वह शायद उतना भावप्रवण नहीं होता l गाँवनामा के ‘नामा’ की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि इसके कई अर्थ हैं, लेकिन यहाँ उसका अर्थ कुछ ख़ास है l एक बात को हम इतना अनुभव करते हैं कि वह हमारे भीतर गहरे धँस जाती है l फिर उसका आरंभ और अन्त ढूँढ़ पाना मुश्किल होता है l यह नामा है l वास्तव में कविता प्यास जगाती है; वह प्यास बुझाती नहीं है l इस अर्थ में गाँवनामा सार्थक है l एक दूसरी बात l इस कविता का चाहे जितनी बार पाठ करें, हर पाठ के बाद प्रश्न उठता है कि क्या हम सब कुछ समझ गए कि कवि ने क्या कहना चाहा है? शायद नहीं l बजरंग बिहारी जी ने राग के बारे में कहा था कि कुछ कवियों में राग दिखता है, होता नहीं l मैं कहता हूँ राग होता तो है, वह पकड़ में आता है या नहीं l चन्द्रदेव जी का पहले संग्रह आ चुका है—देस-राग l राग को पकड़ना जानते हैं चन्द्रदेव जी l वह देस-राग में दिखाई पड़ गया था l वहाँ जो देस का राग है उसी की ध्वनियाँ इन संग्रहों में हैं l

इन कविताओं में जो गाँव है वह प्रेमचंद, त्रिलोचन या केदारनाथ सिंह के गाँव से भिन्न है l इन कविताओं से पता चलता है कि वह भिन्नता क्या है l सवाल यह नहीं है कि विषय के बारे में कवि कितना जानता है ! जानकारी होना अलग बात है l सवाल यह है कि वह कवि के भीतर  कितना है और कवि उसके भीतर कितना है? निश्चित रूप से चन्द्रदेव जी 30वर्षों से दिल्ली में हैं l उनको देखकर नहीं लगता कि वे दिल्ली में हैं l लगता है कवि गाँव में है और गाँव उसके भीतर बसा हुआ है l वह इन पंक्तियों से पता चलेगा, वह प्रतीकों और बिम्बों से पता चलेगा—

प्रथम सत्र के वक्तागण

                     

मैंने भी तुमको देखा है

शिद्दत से महसूस किया है,

अधनंगे रह पूस जिया है lसत्र 

‘पूस जिया है’—यह गाँव से तदाकार हुए बिना नहीं लिखा जा सकता l अधनंगा रहकर पूस को जीना—इस तरह की भावाभिव्यंजना अद्भुत है l यह कविता में आना सहज नहीं है l

गाँव पर बहुतों ने लिखा है l गाँव में शहर घुस गया है—शहरी बाना गाँव में देखा; यह भी सही है l मगर मेरी दृष्टि यहाँ आकर अटक गई—

गिद्ध गए, गौरैया रूठी

यह विकास कि रीति अनूठी l

गदराई बाली, पर सीठी l

यह बदला हुआ गाँव है—यह दिखना कि ‘गदराई बाली, पर सीठी’ अद्भुत है l ‘सीठी’ का कोई जवाब नहीं है l चन्द्रदेव जी की कविताओं में ऐसे बहुत से शब्द हैं जिन्हें बदलना संभव ही नहीं है l ऐसा कमाल बाबा तुलसीदास कर चुके हैं l इसी तरह ‘कुंचहरा’ महुआ भी विलक्षण शब्द है l ये शब्द नहीं हैं, व्यंजनायें हैं l ‘सूखी आँखों में सपने थे/ डोंगी थी सिकता में अंटकी/ डाल-पात बिन गाँव तने थे l’  अद्भुत पंक्ति है l इसका मतलब है, इसमें संभावना है—इसलिए कि वहाँ सपने हैं l यह केवल तुकबंदी नहीं है l इसमें गहरी व्यंजना है l

‘पिता का शोकगीत’ केवल पिता का शोकगीत नहीं है l पिता मूल्यों का प्रतीक है l हमारे मूल्य क्षरित हो रहे हैं—‘एक बार चर जाने के बाद तुमने/ फिर क्यों नहीं बोईं / करुणा, क्षमा और प्यार-मोहब्बत की फसलें?’ मुझे मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शे’र याद आ गया, हालांकि उसकी व्याख्या दूसरी है l गाँव की तरक्क़ी मुझे इस तरह लगती है—   

द्वितीय सत्र के वक्तागण

                    

                     उग रहा है दरो-दीवार से सपना ग़ालिब

हम बयाबान में हैं और बहार आई है l

यह जो व्यंजना है, इसे जानने के लिए चन्द्रदेव जी को पढ़ें l

तकनीकी कारणों से इस परिचर्चा को दो सत्रों में विभाजित करना पड़ा था l बिस्मिलाह साहब के अध्यक्षीय वक्तव्य के बाद डॉ. आशीष मिश्र ने कहा कि ‘देस-राग’ के बाद जब ‘गाँवनामा पढ़ता हूँ    तो लगता है दो-तीन दशकों में उदारीकरण के बाद जैसे पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था को उधेड़ दिया गया हो l उसमें कोई यह सोच नहीं सकता था कि किसान आन्दोलन इतनी मज़बूती से खड़े होकर सत्ता को हिला देंगे l इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर केवल कवि ही नहीं खड़े हो रहे हैं; उसी ज़मीन से प्रतिरोध की आवाज़ भी खड़ी हो रही है l यह एक ऐतिहासिक ज़रूरत है l चन्द्रदेव जी का यह एक सैलानी भाव नहीं है l गाँव पर लिखना यानी गाँव को महसूस करना है l यह एक ऐतिहासिक परिघटना है l उसी ऐतिहासिक परिघटना के सन्दर्भ में चन्द्रदेव जी के इस संग्रह और पूरे काव्य-कर्म को देखा जाना चाहिए l मैंने महसूस किया कि ये जो कविताएँ हैं ये किसी नैरेटिव, विमर्श या सबसे लोकप्रिय मुहावरों से पैदा नहीं हो रही हैं, बल्कि अनुभव से पैदा हो रही हैं l अनुभव, आख्यान,  विमर्श में बड़ा अन्तर है l ज़रूरी नहीं कि हम जो अनुभव करते हैं वही नैरेटिव्स-विमर्श भी कहते हों l दोनों में बड़ा अन्तराल होता है l यह अन्तराल मोहग्रस्तता पैदा करता है l इसमें दो तरह के लोग हैं—एक सवर्ण जो अतीत को लेकर मोहग्रस्त हैं l किसी दलित को, स्त्री को गाँव क्यों नहीं याद आता है? सवर्ण कवियों को गाँव अपील करता है l चन्द्रदेव यादव में दोनों नैरेटिव्स हैं l मोहग्रस्तता और नकार दोनों में उनका भिन्न नजरिया है l उनमें गाँव के प्रति एक आलोचनात्मक नजरिया है l यह गाँवनामा में जगह जगह है—ख़ास तौर से कुछ चरित्रों को लेकर लिखी गई कविताओं में है l ग्रामीण सौन्दर्य को प्राकृत सौन्दर्य बनाया जाता है—ऐसा करते समय अधिकांश कवि वहाँ के दमन, उत्पीड़न और लैंगिक संरचना को छिपा लेते हैं l चन्द्रदेव यादव नहीं छिपाते हैं, इसीलिए यह संग्रह ख़ास है l गाँव की सामाजिक और आर्थिक संरचना नकारात्मक है, उस दीवार को टूट ही जाना चाहिए l और गेरू की छापों वाली इन भूरी मिट्टी की दीवारों का क्या! यह ग्रामीण सौन्दर्य है जिसे बना रहना चाहिए l कविता हर बात को सौन्दर्यात्मक ढंग से कहती है l गेरू की छाप क्या है? यह ग्रामीण सौन्दर्य है l इस ग्रामीण परिवेश के भीतर सामुदायिकता, समाहार, लगाव, भ्रातृत्व, सामाजिकता—ये मूल्य हैं l ये वरेण्य हैं l गेरू की छाप को बचाए रखना कवि का दायित्व है l और ख़ासियत यही है कि कवि चन्द्रदेव यादव जी उस सामाजिक-आर्थिक संरचना की जो नकारात्मकता है, सामुदायिकता, सामाजिकता, भ्रातृत्व और प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच के तनाव को किसी सरलीकरण के बजाय उसी तनाव में पकड़ पाते हैं l यह तीसरी ख़ासियत है जो गाँवनामा को महत्वपूर्ण बनाती है l

कवि लोग जब खड़ी बोली में ग्राम कथा को लिखते हैं तो खड़ी बोली की एकतानता को तोड़ते हैं l उसमें सायास देशज शब्दों, लोक-बिम्बों और प्राकृतिक बिम्बों को भरा जाता है l वह कविता नहीं होती l कविता तो बहुत गहरी संवेदना में पैदा होती है l यह संवेदना मध्यमवर्गीय कवियों में नहीं होती है l गाँवनामा के सन्दर्भ में चौथी बात यह है कि इसको पढ़ते हुए काव्य-भाषा पर सोचना पड़ेगा l

इस परिचर्चा में शामिल डॉ. प्रियदर्शिनी प्रिया ने कहा कि इन काव्य कृतियों पर अलग-अलग दृष्टियों से हो रही चर्चा को सुनकर मुझे ‘असाध्य वीणा’ की पंक्ति ‘सहसा वीणा झनझना उठी’ की याद आ गई कि गाँवनामा और पिता का शोकगीत में जो भाव है, संवेदनाएं हैं वे कई कई स्रोतों से झनझना उठी हैं l गाँव के परिवर्तनों की धीमी गति और गाँवों में गाँववालों की बेपरवाही से कवि असंतुष्ट है l गाँव में हुए परिवर्तनों और लोक के समकालीन खुरदुरेपन की यात्रा इस नामे में शामिल है l गाँव से संबंधित अपनी धारणा को कवि ने भूमिका में स्पष्ट रूप से लिख दिया है l चन्द्रदेव यादव अतीत में डूबकर मोहग्रस्त नहीं होना चाहते l गाँवों की बिगड़ती स्थिति से वे बहुत चिंतित हैं l इन संग्रहों में गाँव के नग्न यथार्थ और उसकी विडम्बना को उकेरा गया है l वास्तव में सामाजिक सरोकारों से युक्त होकर ही कोई रचना बड़ी बनती है l कवि ने गाँवों में आ गई अधकचरी शहरी संस्कृति के प्रति चिंता व्यक्त की है l प्रो. यादव किसी भी अतार्किक आधुनिकता को स्वीकार नहीं करते l उनकी ईमानदारी की मैं क़ायल हूँ l

 हिन्दी कविता के मर्मज्ञ प्रो. दयाशंकर त्रिपाठी की राय में चन्द्रदेव यादव ने कविता के माध्यम से प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाया है l प्रेमचंद के कथा साहित्य का गाँव पूँजीवाद के दौर का गाँव है जहाँ किसान मजदूर बनते बनते मर जाता है; वह आत्महत्या नहीं करता है l चन्द्रदेव भाई की कविताओं में उत्तर-आधुनिक गाँव है l इनके दौर का किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाता है l प्रेमचंद के समय के दलित को लगता है कि न तो धरती अपनी है और न तो धन अपना है l आज गाँव में जिनके पास अपनी धरती और अपना धन है उनका विस्थापन हो रहा है l यह विकृत सच्चाई आज के गाँव की है l लेकिन चन्द्रदेव यादव की कविताओं की सच्चाई उत्तर-आधुनिक गाँवों की है l कई उपन्यासकारों ने भी यह बात की है l इनमें विस्थापित होने का दर्द है l इस दर्द को चन्द्रदेव भाई ने ‘पिता का शोकगीत’ में महसूस किया है l विस्थापन संबंधों में भी हुआ है l इस संग्रह में प्रकृति संबंधी बहुत अच्छी कविताएँ हैं l वे त्रिलोचन और नागार्जुन की याद दिलाती हैं l यह बात सोलहो आने सच है कि विकास शहरोन्मुखी है और गाँव शहर के उपनिवेश हैं l चन्द्रदेव यादव की कविताओं में खड़ी बोली के बीच भोजपुरी की आवाजाही अच्छी लगती है l यह कृत्रिम नहीं है l लेकिन कविता में जब किसी अंचल विशेष का टिपिकल शब्द आता है तो वहाँ उसका फुटनोट देना चाहिए l इससे कविता सम्प्रेषणीय होती है और दूर तक जाती है l 

द्वितीय सत्र के वक्तागण -2 

                         

दूसरे सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ आलोचक डॉ. रामप्रकाश कुशवाहा ने कहा कि इन दोनों पुस्तकों की भूमिका अच्छी लगी l पिता का शोकगीत दरअसल गाँव का शोकगीत है l विलक्षण बात यह है कि चन्द्रदेव यादव एक ही विषय पर 50 वर्षों से सोच रहे हैं l यह थीम पोएट्री है l पिता का शोकगीत और गाँवनामा के कथ्य में कोई अन्तर नहीं है l लेकिन कहीं कोई दोहराव नहीं है l इनकी त्रिपदी में जो रचना समय है, जो निवेश है वह विशिष्ट है l यह सूक्ति संरचना है l इनमें बहुत सी कविताएँ पोस्टर बनाने के लिए बहुत उपयुक्त हैं l त्रिपदियों में सूक्तियों की श्रृंखला है l तीन पंक्तियाँ कहने के लिए कवि ने कितना श्रम किया होगा, हालांकि यह आसान भाषा में है l इनका कथ्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है l चन्द्रदेव यादव जी की कविताएँ एक शोधक की कविताएँ है l ये आसान कविताएँ नहीं हैं, हालांकि चन्द्रदेव जी ने इसे भाषा की सरलता से छिपा दिया है l एक-एक छन्द के कई आयाम हैं l

पिता का शोकगीत में कवि की प्रतिभा और बिम्ब की उड़ान को देखा जा सकता है—‘पिता, ये गाल बजाने वाले डेढ़ हाथ के हाकिम/ वामन से भी बड़े हैं’ l इसका बहुत अच्छा इस्तेमल किया है चन्द्रदेव जी ने l पौराणिक बिम्ब का नये अर्थ-सन्दर्भों में प्रयोग कवि की प्रतिभा का परिणाम है l संवेदना के स्तर पर चन्द्रदेव जी गाँव नहीं छोड़ पाए हैं, लेकिन लौटे हैं बोध के स्तर पर l यह स्वाभाविक है l इनमें कविता के कुछ स्थल—पिता का गीत—पिता की कविता, लगा व्यक्तिगत है l पिता के गीत का कंठावरोध यह कृति तोड़ती है l यह धूमिल के अधूरे कार्य को पूरा करती है l चन्द्रदेव जी ने प्रेमचंद को परंपरा के रूप में जीवित किया है l जब आपने समय का निवेश किया है तो ये कविताएँ लम्बे समय तक रहेंगी l सबसे बड़ी बात यह कि ये कृतियाँ विमर्शात्मक हैं l तुलसीदास की तरह इनमें बौद्धिक सामग्री भी बहुत है l

महामारी के बाद ‘संवाद’ मंच का यह पहला कार्यक्रम था, वह भी पुस्तक लोकार्पण का l लेकिन ऑनलाइन हुए इस सवा तीन घंटे के कार्यक्रम में बड़ी संख्या में दर्शकों की उपस्थिति अत्यंत प्रीतिकर लगी l उन दर्शकों में वरिष्ठ नवगीतकार प्रो. राजेन्द्र गौतम, कवि जयराम जय, जी. पी. शर्मा गंगेश, कवि मोहनलाल यादव, कवयित्री अनुराधा ओस, कवि नीरज मिश्रा, लोकनाटक के मर्मज्ञ प्रो. ओमप्रकाश भारती, सुश्री चन्द्रकला सिंह, डॉ. विन्ध्याचल मिश्रा, प्रो. नीरज कुमार, डॉ. मुकेश कुमार मिरोठा, डॉ. हैदर अली, अजय यतीश, सर्वजीत यादव जैसे कई विशिष्ट व्यक्ति हैं l इस समारोह के अन्त में संचालिका डॉ. सरोज ने सभी वक्ताओं और दर्शकों को धन्यवाद दिया l      

                

[लेखक युवापत्रकार व स्वतंत्र स्तंभकार हैंl ] 
                


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