क्योंकि मैं कभी ताकत से नहीं बोला

             

    आलेख  

               

डॉ. रचना सिंह 

    

इसलिए कहूँगा मैं

मगर मुझे पाने दो

पहले ऐसी बोली

जिसके दो अर्थ न हों ।   (दो अर्थ का भय)

रघुवीर सहाय की कविता पढ़ते हुए मुझे हमेशा यह लगता है कि की उनकी कविता इस दो अर्थ के भय की ज़मीन की तलाश करती हुई कविता है...या यूँ कहें कि भाषा के अर्थ-संदर्भों के अंतराल पर सोचती और विचारती हुई कविता है। रघुवीर सहाय की कविता में भाषा का संदर्भ बार-बार आता है और जब किसी कवि के काव्य-संसार में कोई विषय स्थायी भाव की तरह मौजूद हो तो यह समझने की आवश्यकता है कि इस विषय की जड़ें बहुत गहरी और व्यापक हैं। रघुवीर सहाय की कविता में आए सभी विचार एक दूसरे में गुंथे हुए दिखाई पड़ते हैं। इसलिए जब वे भाषा पर बात कर रहे होते हैं तो दरअसल वे राजनीति पर बात कर रहे होते हैं...सामाजिक असमानता पर बात कर रहे होते हैं...लोकतन्त्र पर बात कर रहे होते हैं। वे खुद भी अपनी कविता को खांचों में बाँट कर देखने के हिमायती नहीं थे। तभी तो समाधिलेख कविता में उन्होंने लिखा है-

‘’मेरी कविता में ऊषा के

भीतर मेरी मृत्यु भी लिखी

चिड़िया के भीतर है मेरी

राष्ट्र भावना, बच्चों में दुख

माना सब कुछ गबड़सबड़ है

पर मैंने यों ही देखा था,

नारी चिड़िया देश जागरण

बच्चा प्रकृति दुख वासना

अलग अलग डिब्बों में मेरी

पीड़ाएँमत बंद कीजिए

जिन्हें मिला-जुलाकर

मैंने की थी ये रचनाएँ।“       (प्रतिनिधि कविताएं, स. सुरेश शर्मा,पृ. 143-144)

इस क्रम में यह उचित ही होगा कि यहाँ उनकी कविता पर हम एक समग्र दृष्टि डालें। रघुवीर सहाय की कविता-यात्रा मोटे तौर पर स्वतंत्रता के साल से शुरू होती है, जब पहली बार उनकी कविता आदिम संगीत शीर्षक से आजकल पत्रिका में प्रकाशित हुई। इसके बाद 1951 में अज्ञेय द्वारा संपादित दूसरा सप्तक में उनकी कुछ कविताएं प्रकाशित हुई, जिनकी बहुत चर्चा हुई। आरंभिक दौर में वे बच्चन की संवेदना और काव्य-भाषा से काफी प्रभावित रहे। यह बात दूसरा सप्तक में उन्होंने खुद स्वीकार की है। धीरे-धीरे उनकी कविताओं का जुड़ाव जनजीवन  और समसामयिक यथार्थ से होता चला गया। उनकी कविता को उनकी पत्रकारिता से अलग करके नहीं देखा जा सकता। दरअसल रघुवीर सहाय की चेतना एक पत्रकार की और संवेदना एक कवि की-सी है।

रघुवीर सहाय की कविता जनता की पक्षधर कविता है, इसलिए वे राजनीति को अपने सृजनकर्म से एक रचनात्मक अनुभव में परिणत कर देना चाहते हैं। वे राजनीति को बहुत व्यापक अर्थों में ग्रहण करते हैं।  वे सामान्य अर्थों में राजनीतिक कवि नहीं हैं। प्रगतिशील विचारधारा उनकी चेतना की नियामक रही है। वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि शमशेर बहादुर सिंह का यह कहना मुझे बराबर याद रहेगा कि ज़िंदगी में तीन चीजों की बड़ी ज़रूरत है- ऑक्सीज़न,मार्क्सवाद और वह शक्ल जो हम जनता में देखते हैं।“ (दूसरा सप्तक, स. अज्ञेय,पृ. 138)। मार्क्सवाद के प्रति इस आस्था के बावजूद वे यह भी कहते हैं कि मगर मार्क्सवाद को कविता पर गिलाफ़ की तरह नहीं चढ़ाया जा सकता।

कहने का तात्पर्य यह है कि रघुवीर सहाय राजनीति को व्यापक अर्थों में स्वीकार कर उसे मानवीय सरोकारों से जोड़ते हैं। तभी तो कहते हैं कि-

“गया वाजपेयी जी से पूछ आया देश का हाल

पर उढ़ा नहीं सका नंगी औरत को

कंबल रेलगाड़ी में बीस अजनबियों के सामने”   (आत्महत्या के विरुद्ध, रघुवीर सहाय,पृ. 48)

यही कारण है कि जीवन और मनुष्य से जुड़ा हर सवाल उनके लिए राजनीति का सवाल बन जाता है। दरअसल किसी कविकी राजनीतिक चेतना को समझने के क्रम में उन कविताओं को देखना महत्त्वपूर्ण होता है, जिनमें प्रकट तौर पर राजनीतिक शब्दावली का प्रयोग नहीं होता। यूँ भी रघुवीर सहाय कविता को अलग-अलग खांचों में बाँट कर देखने के पक्षधर नहीं थे। यह किसी कवि या विषय के अध्ययन की दृष्टि से सुविधाजनक अवश्य हो सकता है लेकिन यह भी तय है कि इससे रचना की अधूरी समझ ही बन पाएगी।    

स्पष्ट है कि एक रचनाकार के रूप में रघुवीर सहाय यथार्थ को उसकी संपूर्णता में पकड़ना चाहते हैं। रघुवीर सहाय की रचनात्मकता यथार्थ के धरातल पर टिकी हुई है। यथार्थ की दुनिया ही उनके सृजन की दुनिया है। यथार्थ पर बल देने की प्रक्रिया में अतिशय भावुकता से बचने का सजग प्रयास भी उनकी कविताओं में देखा जा सकता है। संभवतः यही कारण है कि उनके लेखन में यथार्थ शब्द बार-बार आता है।  वे नहीं चाहते थे कि उनकी कविता को पढ़कर कोई वाह-वाह कर उठे या उस कविता के साथ बह जाए। वे चाहते थे कि आप उनकी कविता को गटक न जाएँ, सटक न जाएँ बल्कि अटक-अटक कर पढ़ें। वे कविता को उसकी संपूर्णता में ही स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता को पढ़ने के क्रम में पाठक की चेतना लगातार सक्रिय रहती है, किन्तु उसे पूरा पढ़ने के बाद जब वह सचमुच कविता बनती है, तभी उसकी समझ पूरी होती है। यह प्रक्रिया बहा ले जाने वाली नहीं है बल्कि चेतना को झकझोरने वाली है।

रघुवीर सहाय की यथार्थ की अपनी समझ थी। वे मानते थे कि कविता तभी होती है, जब वह विषय से दूर और वस्तु के निकट होती है। यह वस्तु के निकट होना संभवतः यथार्थ के निकट होना ही है। आत्म-साक्षात्कार से अधिक वे यथार्थ के साक्षात्कार पर बल देते हैं। उनकी दुनिया लोकतंत्र की विसंगतियों को झेल रहे एक आम आदमी की दुनिया है। उनकी स्पष्ट राय थी कि मैं जानता हूँ कि मुझे अपनी कविताओं और नाटकों में क्या कहना है। गुलामी और गरीबी, युद्ध और बेकारी लेखक के दुश्मन हैं। उनसे ऐसा व्यवहार कीजिए जैसा दुश्मन, दुश्मन के साथ करता है। ( सीढ़ियों पर धूप में रघुवीर सहाय,पृ. 220) । रघुवीर सहाय की कविता और उसका वैचारिक परिवेश भी यथार्थ की उधेड़बुन से निर्मित हुए है।

उन्होंने अपनी कविता को अटक-अटक कर पढ़े जाने की जो इच्छा जताई है,वह उनकी कविता तक पहुँचने में मददगार है। इस अटक-अटक कर पढ़ने के बीच जो स्पेस पैदा होता है, वहीं उनकी कविता का मानचित्र निर्मित होता है। ज़ाहिर है कि कविता का यह मानचित्र अनुभवों की ऐसी ज़मीन पर टिका होता है, जो सबके लिए एक समान नहीं होता। अनुभवों का यह अंतराल रघुवीर सहाय की कविता में भाषा और अभिव्यक्ति के सवाल से जुड़ जाता है। अपनी एक कविता में वे कहते हैं कि

‘’मैं अभी आया हूँ सारा देश घूम कर

पर उसका वर्णन दरबार में करूँगा नहीं

राजा ने जनता को बरसों से देखा नहीं।‘’

जिस राजा ने जनता को बरसों से देखा नहीं,वो उनकी पीड़ा को कैसे समझ पाएगा। भूख का अनुभव न रखने वाले राजा तक भूखी जनता की बात क्योंकर पहुंचेगी भला? असल में अनुभव की यह खाई भाषा को उसकी तार्किक ज़मीन के साथ संप्रेषित नहीं कर पाएगी। इसलिए केवल  भाषा कवि की मुश्किल नहीं है, बल्कि भाषा की ज़मीन और उसके संदर्भ अधिक जटिल सवाल हैं कवि के लिए। भाषा में अर्थ संदर्भ, परंपरा और अनुभव से पैदा होते हैं। लेकिन जब राजा और प्रजा के अनुभवों में इतना बड़ा अंतराल हो तो भाषा संप्रेषणीय कैसे होगी?‘दो अर्थों का भय कविता में भी कवि कहीं न कहीं अनुभव के धरातल की इसी खाई को महसूस करता है।

रघुवीर सहाय की भाषा वस्तुतः एक रचनात्मक संवाद की प्रक्रिया में निर्मित होती है। लेकिन पूंजीवादी नेतृत्व ने संचार माध्यमों की मार्फत भाषा की रचनात्मकता को नष्ट करके उसके अर्थ को सरलीकृत ही नहीं किया है बल्कि उसका व्यवसायीकरण भी कर दिया है। इसीलिए कवि जब जनता से यह कहता है कि वह उन्हें प्यार करता है तो वे शब्द जनता पर अपेक्षित प्रभाव नहीं डाल पाते-

‘’मैंने कोशिश की थी कि कुछ कहूँ उनसे,

लेकिन जब कहा तुमको प्यार करता हूँ

मेरे शब्द एक लहरियातादोगाना बन

उकड़ू बैठे लोगों पर भिनभिनाने लगे।‘’  (प्रतिनिधि कविताएं : स.- सुरेश शर्मा,पृ. 45)

भाषा का सबसे संवेदनापूर्ण वाक्य जब अपनी अर्थवत्ता खो दे तो निश्चित रूप से भाषा के संदर्भों और उसकी टटोलने की सख्त दरकार महसूस होती है।

रघुवीर सहाय अत्यंत आत्म-सजग कवि हैं। काव्यशास्त्र के परंपरागत बोध के बरक्सउन्होंने अपना एक काव्य-शास्त्र गढ़ा। इस काव्य-शास्त्र को वे अपने ढंग से छंद कहा करते थे। वे छंद का प्रयोग बहुत व्यापक अर्थ में करते हैं। नामवर सिंह ने इस संदर्भ में लिखा है- “वे मानते हैं कि हर कविता छंद में बंधी होती है और छंद के बिना कोई कविता नहीं होती। इसलिए दुनिया को, सच्चाई को देखने की जो दृष्टि होती है, समझ होती है, उसे भी वे एक प्रकार के छंद के अंतर्गत मानते थे।“ (पूर्वग्रह : अंक 102: पृ. 23) 

रघुवीर सहाय की कविता पर कभी-कभी गद्यात्मकता का आरोप भी लगाया जाता है। इस संदर्भ में नामवर जी लिखते हैं कि उनकी कविता में “अनुभव की प्रक्रिया और विचार-प्रक्रिया जैसे एक दूसरे से जुड़ी होती है,गुंथी हुई होती है। वे गुंथे हुए विचारों को खोलते चले जाते हैं और बिखरे हुए विचारों को गूँथतेचले जाते हैं। ये दोनों प्रक्रियाएँ एक साथ चलती हैं। इसलिए ये कविताएं गद्यात्मक हैं। वे तन्मय नहीं करती हैं, भावुक नहीं बनाती हैं, मन में विक्षोभ नहीं पैदा करती हैं, बल्कि गहरे दूर तक सोच में डुबा देती हैं।“ (पूर्वग्रह: अंक 102;पृ. 25) 

देखा जाए तो उनकी कविता में एक अंतर्निहित लय है जो गद्य की शुष्कता को तोड़ते हुए कविता की आत्मीयता और सहजता को जीवित रखती है। यूँ तो छंद का प्रयोग भी रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं में बहुत-से स्थानों पर किया है। कहीं पर यह छंद व्यंग्य के उपक्रम के तौर पर आया है तो कहीं किसी बात पर अतिरिक्त बल देने की प्रक्रिया में कविता की ताकत बन गया है। पढिए गीता बनिए सीता या रामदास जैसी कविताओं में छंद का ऐसा ही रचनात्मक और सार्थक प्रयोग देखा जा सकता है, जहाँ छंद कविता के अर्थ को एक नया आयाम और साथ ही प्रामाणिकता भी देता है।

रघुवीर सहाय की भाषा बोलचाल के शब्दों से आकार लेती है। लेकिन उनकी कविता को समझने के लिए केवल इतना जानना काफ़ी नहीं है। वस्तुतः उनकी कविता का अर्थ शब्दों में नहीं बल्कि शब्दों की व्यवस्था में होता है, जिसे वे शिल्प कहते हैं। वे लिखते हैं कि “मेरे पास एक तरह की और अतिरिक्त चेतना है, एक अतिरिक्त व्यवस्था है, जिससे कि मैं हर चीज़ को फिर से उलट-पुलट कर, नए ढंग से सजा कर, नए ढंग से दुरुस्त करके और नया बना देने की इच्छा रखता हूँ। तो वही तो शिल्प है।“ (लिखने का कारण: रघुवीर सहाय,पृ. 99)

असल में रघुवीर सहाय ने अपनी कविता के लिए जो शिल्प बनाया, उसमें शिल्प परंपरा का कोई योगदान नहीं था। उनकी वाक्य-व्यवस्था, शब्द-विन्यास सभी इस प्रकार के हैं कि उनका कोई स्थानापन्न नहीं मिल सकता। तभी तो नामवर जी ने लिखा है कि “उन बोलचाल के शब्दों का जो विन्यास और वाक्य-रचना है, यह पूरी की पूरी वाक्य-रचना चुनौती देती है और उसी भाषा में निहित वैकल्पिक आवाज़ों को ध्वनित करती है, जो भाषा के अंदर ही भाषा के द्वारा ही एक दूसरा विकल्प प्रस्तुत करते हुए और एक नई समझ, एक नई सोच की शुरुआत करती है। मुझे लगता है कि वह तार्किक कविता है, बहस करती कविता है।“ (पूर्वग्रह, अंक 102, पृ.25)। यही कारण है कि रघुवीर सहाय की भाषा किसी भी तरह की सायास कलात्मकता से मुक्त है। वे यथार्थ को, दुख को बिना कोई रंग दिए ज्यों का त्यों कविता में उतारना चाहते हैं। बिम्ब, प्रतीक आदि यथार्थ को एक रूमानी रंग दे देते हैं, जो कवि को स्वीकार्य नहीं था। उनकी लगभग सभी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात महसूस की जा सकती है।रंगों का हमला कविता में जब वे लिखते हैं कि शब्द के अर्थ, निकाल सकते हैं दो तो भी वे दरअसल भाषा कीउस व्यवस्था की तलाश कर रहे होते हैं, जहाँ भाषा शब्दों में क़ैद न होकर एक बड़ी और व्यापक ज़मीन पर आकार लेती है।

भाषा के सवाल के अतिरिक्त कवि जहाँ बार-बार लौटता है, वह मौसम बसंत है। नामवर जी ने लिखा है कि निराला के बाद हिन्दी में सबसे ज़्यादा रघुवीर सहाय ने बसंत पर कविताएं लिखी हैं-

‘’वही आदर्श मौसम

मन में कुछ टूटता-सा

अनुभव से जानता हूँ कि यह बसंत है।‘’

यह अनुभव रघुवीर सहाय की कविताओं की ज़मीन है, जिसका कोई विकल्प संभव ही नहीं है।  और मुझे लगता है कि इसी अनुभव की पृष्ठभूमि में पनपा हुआ बसंत उम्मीद की शक्ल में   उनकी कविताओं का मौसम बन जाता है। यही वह ज़मीन है, जहाँ समाज और राजनीति की सभी विडंबनाएँ मिल कर भी एक निराश और पस्त समाज समाज की सृष्टि नहीं करतीं बल्कि नए की उम्मीद का बीज बन कर वहाँ मौजूद रहती हैं। और अनायास गालिब याद आने लगते हैं :

घर में था क्या कि तेरा ग़म उसे ग़ारत करता

वो जो रखते थे इक हसरतेतामीर, सो है।‘’

यही हसरते-तामीर रघुवीर सहाय की कविता में ताकत के बरक्स उम्मीद बन कर आई है-

‘’क्योंकि मैं कभी ताकत से नहीं बोला

उम्मीद से बोला कि शायद मैं सही हूँ।

यह उम्मीद,ताकत की ज़मीन पर नहीं बल्कि आत्म-संशय की ज़मीन पर ही आकार ले सकती है। इसीलिए कवि की भाषा उम्मीद की भाषा है और हर ताकत के विरोध में डटी हुई भाषा है। 

 [युवा आलोचक एवं स्तंभकार डॉ. रचना सिंह हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं l ]

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