'आंसू' : वेदना की स्याही में लिखा गीत - डॉ.कादम्बिनी मिश्रा

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डॉ. कादम्बिनी मिश्रा 

यदि गीत का सामान्य अर्थ गेय-काव्य समझा जाए तो इस रूप में यह विधा उतनी ही प्राचीन ठहरेगी जितनी की कविता का इतिहास।फिर भी उपलब्ध साहित्य में हम इसे गीत-गोविंद की परंपरा से तो जोड़ ही सकते हैं।

गीत लघु आकार की उस प्रगीत रचना को कहते हैं जिसमें कविसंगीत के प्रति सजग रहते हुए उसका रूप निर्माण करता है।भावनाओं का अंतः - प्रेरित आवेग या सहज उच्छलन गीति-काव्य का सामान्य गुण होता है।प्रवाहमयभावनाओं के रूप में आंतरिक याभाव संगीत तो प्रगीतमें विद्यमान रहता ही है।इसी अंतः संगीत से युक्त कविता की रचना जब इस रूप में की जाए उसमें बाह्य संगीत का विधान सहज संभव हो अथवा कवि जब स्वयं बाह्यसंगीत का विधान कर प्रगीत रचना करता है तो वह गेय-काव्य गीत कहलाता है। लय का संगीत तो छंद के रूप मेंविता में विद्यमान रहता ही है लेकिन संगीत से यहां अभिप्राय लय और गति के संगीत से भिन्न ऐसी रचना से है जिसे गाने में किसी प्रकार की असुविधा ना हो, तथा वह संगीत कला की विधि से गाने योग्य हो सके।

वैसे तो राग रागिनियोंमें ढली और शास्त्रीय तालों में बंधी  रचनाएं तो बहुत पहले से होती आ रही थी किंतु काव्यशास्त्र में गीति - काव्य-विधा को  अलग से विवेचन का विषय नहीं बनाया गया था।आधुनिक काल में गीति  शैली का स्वरूप अंग्रेजी साहित्य के प्रभाव से कुछ और विशिष्ट हो गया ।प्राचीन पद शैली की भांति यह गीत कथात्मक लोक भावना के अभिव्यंजक नहीं आभ्यन्तरिक  और व्यक्ति के कोमल उद्गारों के व्यंजक होते हैं।इसमें केवल गेयता  की रक्षा नहीं की जाती भावनाओं के संगीत को यथावत शब्दों द्वारा रूपांतरित करने का प्रयत्न किया जाता है, अत इनकी भाषा और शब्द चयन अधिकाधिक नाद  सौंदर्य से युक्त होता है गाये  जाने योग्य कविताओं में रुककर अर्थ ग्रहण करने का अवकाश नहीं होता जितना संभव हो सके प्रसाद गुण की रक्षा का प्रयास किया जाता है ।कवि अत्यंत मार्मिक किन्तु सरल भावनाओं की अभिव्यक्ति गीतों में करता है।इसके लिए मूल भावनाओं के अनुरूप प्रसाद गुणों से युक्त कर्णप्रिय शब्दावली और साथ में छोटे और लयात्मक छंदों का चयन अनिवार्य हो जाता है।थिरकते छंद और संगीतमय अन्त्यानुप्रास की योजना आधुनिक काल के गीतों की विशेषता रही है।इस प्रकार गीत की परिभाषा को हम इस रूप में देख सकते हैं–"कविता  जो संगीतमय सरल एवं अति भावात्मक हो और जिसमें लय, स्वर, तुक एवं नाद का ध्यान इस ध्येय  से रखा जाए कि उसका संगीत पर्याप्त समय तक कानों में गूंजता रहे भले ही उस का संगीत आंतरिक हो अथवा वाह्य ।"1

आधुनिक काल के हिंदी गीतों पर रोमांटिक काल का प्रभाव होते हुए भी इनका संगीत, छंद विधान,अप्रस्तुत-योजना, और संस्कार भारतीय ही थे इन कवियों ने अपने वैयक्तिक अनुभूतियों को कला और विषय का पाश्चात्य प्रभाव ग्रहण करने पर भी अपने ही सांचे में ढाला।छंद इनके अपने रहे संगीतात्मकता का समावेश भी इन्होंने भारतीय शास्त्रीय अथवा लोक संगीत की दृष्टि से ही किया भाषा की अभिव्यंजना शक्ति, मूर्तविधान, अर्थ-व्यंजक  नाद - सौंदर्य आदि पर विदेशी प्रभाव देखा जा सकता है।समग्रता में इस युग की गीति रचना भारतीय लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत से ही समन्वित थी।

अब कुछ बातें वेदनानुभूति के विषय में भी।गीतों में एक उल्लास और जीवनोत्सव के भीतर बहुत महीन तरीके से करुणा और पीड़ा की हल्की मिठास लिपटी रहती है इसीलिए मादकता  के साथ एक वितरागहरदम बना रहता है जो हमारे मन को बरबस खींचता है।भावात्मक संबंधों में वेदना और त्रास  की जगह हरदम होती है ।आनंद के भीतर वेदना  नाभि केंद्र है जिसे प्रसाद के गीत सूक्ष्मता से प्रकट करते हैं।

एक कोंपल जब डाली में नरम कली के रूप में प्रस्फुटित होता है उसकी नियति उसी समय इस शाश्वत सत्य की ओर अभिमुख होती है कि उसे अंततोगत्वा डाली से टूट कर मिट्टी में मिल जाना है ।यही विषाद योग उसकी परिणति है।अंकुर उसका आरंभ बीच में यौवन और उल्लास का अविरल प्रवाह जो जीवन नद  कहलाता हैलेकिन नियति विषाद ही है।इसलिए उच्च कोटि के गीतों में बड़ी सहजता  से इस जीवन दर्शन को  में समाहित होने योग्य बनाकर, एक रचनाकार प्रस्तुत करता है।प्रसाद ने यह कार्य बड़ी कुशलता से किया है।

 इस युग में प्रसाद के साथ महादेवीपंत, निरालाबच्चन, रामकुमार वर्मा आदि भी प्रमुख गीतकार रहे हैं।प्रसाद की अधिकांश से गीति रचना उनके नाटकों में ही प्रसंग वश  की गई है इनमें कुछ गीत राष्ट्र को समर्पित थेशेष  की अभिव्यक्ति रचना विशिष्ट पात्रों की आत्माभिव्यक्ति के रूप   में हुई है।इन गीतों में भाववेग, सुंदर कल्पना और कलात्मक उत्कृष्टता प्रचुर है ।संगीत की शास्त्रीय परिपाटी के अनुसार विभिन्न राग - रागिनियों में इन्हें बांधा गया है।

यूँ तो छायावादी कवियों ने अभूतपूर्व गीत लिखे हैं, किंतु आज हम प्रसाद के गीतों की मार्मिक वेदना को फिर से अनुभूत  करने का प्रयत्न करेंगे।प्रसाद ने मधुर भावों की सृष्टि कर प्राकृतिक वर्णनों  को गीतों के कलेवर में डालकर प्रस्तुत किया जिसमें हृदय की भावनायें  घनीभूत और केंद्रीभूतहो कर गेय  हो उठीं।चित्राधार की सूक्ष्म जिज्ञासायें दिव्य सौंदर्य रूप लेकर प्रकट हुई हैं।विरह वेदना मार्मिकता और अनुभूतिकी प्रगाढ़ता से युक्त कुछ पंक्तियां देखे जाने योग्य हैं।आज तो नीकेनेह निहारो।

पावस की घन तिमिर भार में

बीती बात बिसारो चमकिगयो जो चपला सम

यह प्रियतम विरहतिहारोताकि बहाओ रस बरसा में,

हे घन आनंद वारो ।।2


प्रसाद के आंसू में व्यक्त वेदना, सहसा  होने वाले आघात  और शोक का परिणाम नहीं बल्कि इसमें तिल -तिल कर एकत्र घनीभूत पीड़ा का सहज प्रवाह हैआवेग मय मैं झकोरे  नहीं बल्कि देर तक होने वाली रिमझिम बरसात है ।धीरे-धीरे पूंजीभूत पीड़ा मस्तिष्क में स्मृति बन जाने के कारण संयत और व्यवस्थित हो गई है कवि ने स्वयं इस प्रेरणा की व्याख्या आरंभ की है

"इस करुणा कलित हृदय में अब विकल रागिनी बजती

क्यों हाहाकार स्वरों में वेदना असीम गरजती?

मानस सागर के तट पर क्यों लो लहर की घातें 

कल- कल ध्वनि से हैं कहती कुछ विस्मृत सी बातें? "3

भूली हुई पीड़ा  के बार-बार मानस पटल पर टकराने से उपस्थित आंदोलन कवि  के मन को मथ  दे रहा है और वह पुनः पुनः व्यथित होता है ।उसकी व्यक्तिगत निराशा दार्शनिक चिंतन की छाया में अभिव्यक्त हुई है फिर भी भावनाओं का झंझावात पर्याप्त है।विगत स्मृतियां दुख और आंधी ले आती हैं।हृदय और मुझे मन के भीतर संताप  और वेदना की नीली लौ धीमे -धीमे जलती रहती है ।यह कभी नहीं बुझती ज्यों -ज्यों अभाव की अनुभूति तीव्र  होती जाती है l  वेदना के इस प्रवाह में कुछ मधुरतम  स्मृतियां प्रतिबिंबित होती हैं और चित्र अंकित होते हैं ।इसलिए इस वेदनामय  अंकन  के दौरान भी कवि  इस रुदन में ही विश्व कल्याण का साक्षात्कार करता है आशा का भी संदेश देता है


"सब का निचोड़ लेकर तुम सुख के सूखे जीवन में

बरसो प्रभात हिमखंड- सा आंसू इस विश्व सदन में"।4


वेदना की स्याही से लिखी इस गीत का स्वरूप चिंतन  प्रधान हो गया है ।दार्शनिकता का हल्का स्पर्श  शुरू से अंत तक देखा जा सकता है।शोक -गीत की सभी विशेषताएं करुण स्वरव्यक्तिगत अनुभूतिगंभीर्य और चिंतन इस में व्याप्त है ।प्रेरणा आकस्मिक और विशिष्ट नहीं, शनैः -शनैः  संचित वेदना संयत  है ।वैसे तो कई कवियों ने कविता लिखी है, पर  प्रसाद की कृति   वेदना का प्रतीक बन जाती है, जो कवि के हृदय  में आंदोलित कई स्मृतियों के परिणाम स्वरूप उद्भुत हुई हैं ।

आंसू पूर्ण तह मानवीय विरह का काव्य है।उसमें वियोग श्रृंगार की प्रधानता है । सौंदर्य और आकर्षण की मादकता के साथ दीर्घकालीन स्मृति में करुणा की रागिनी और अशेष पीड़ा है और अंत में समष्टि  चेतना है।

"आंसू कवि के जीवन की वास्तविक प्रयोगशाला का अविष्कार है।आंसू में कवि  निःसंकोच भाव से विलास जीवन का वैभव दिखाता फिर उसके अभाव  में आंसू बहाता और अंत में जीवन से समझौता करता है विलास में जो मद  है जो व विराट आकर्षण है उसे कभी उतने ही विराट रूपकों और उपमानों से उसे प्रकट करता है।उसके अभाव में जो वेदना है वही 'आंसू' बनकर निकली है।"5

इस कृति में कवि का आत्म स्वीकार है, प्रत्यक्ष जीवन में वियोग है।कवि ने स्मृति जन्य वेदना का पाथेय  बना लिया है और आंसुओं केअर्घ्य भेंट किए हैं।आंसू का आरंभ अतीत की स्मृतिसे होता है।प्रेम का  रूपहला लोक  तिरोहित हो चुका है।आज भी वह सुंदर हस्ताक्षर की तरह अन्तः- स्थल में अंकित है।निस्सीम  आकाश में वह सौंदर्य चिर-स्थायी हो गया है

माना कि रूप सीमा है

सुंदर तव चिर यौवन में

पर समा गए थे मेरे

मन के नसीम गगन में।"6

कवि वेदना के सागर में डूबता उतराता रहता है और इसी क्रम में वह नए सूत्र भी ढूंढ निकालता है।पीड़ा की चरम सीमा पर पहुंच कर उसे इस दर्शन की अनुभूति होती है कि अखिल संस्कृति ही व्यथाओं से भरी है ।दुख तो इस संसार के कण-कण में व्याप्त है


"मानव जीवन वेदी पर

परिणय हो विरह मिलन का

सुख दुख दोनों नाचेंगे

है खेल आँच के मन का।"7

 

कवि की व्याकुल वेदना चौदहो  भुवन में घूम कर लौट आई पर कहीं भी विश्राम या सुख ना मिला ।वेदना के साथ ही वह विराट वाह्य  साथ अपना रागात्मक संबंध स्थापित कर अपनी चेतना को उद्दात  बनाकर परिष्कृत  करता है।विश्व वेदना ही उसे संपूर्ण सृष्टि के साथ आत्मीयता और बंधुत्व की भावना प्रदान करती है यह वसुधा भी चिर -दग्ध -दुखी कवि वेदना को मानवता के सिर  की रोली और सदा सुहागिन मानता है

"इस व्यथित विश्व पतझड़ की

तुम जलती हो मृदु  होली

है अरुणे  सदा सुहागिन

मानवता सिर की रोली।"8

कवि  वेदना की ज्वाला से सारा कलुष  जला देने के लिए निवेदन करता है।समस्त निर्मम संसार को मंगलमय कर  देना चाहता है।यह वेदना ज्वाला  अत्यंत कल्याणकारी है जो लगातार जलती हुई अपने आलोक में दूसरे की पीड़ा को भी सहानुभूति से देखती है

"निर्मम जगती को तेरा

मंगलमय मिले उजाला

इस जलते हुए हृदय की

कल्याणी शीतल ज्वाला।"9


अपनी पीड़ा में रम कर भी कवि  वंचित, भूखे और निराश नैनो को नहीं भूला है

"फिर उन निराश नयनों  की

जिनके आंसू सूखे हैं

उस प्रलय  दशा को देखा

जो चिर वंचित भूखे हैं ।"10

कवि व्यक्तिगत वेदना और निराशा से निकलकर जगत कल्याण की और आशा- प्रद नवीन जीवन दर्शन की कामना करता है।इस विश्व-सदन में वह आंसुओं के प्रभात हिम -कण  के समान जीवन में  बरसाकर कल्याण की कामना करता है


"सबका निचोड़ लेकर तुम

सूखे से जीवन में

बरसों प्रभात हिम कण सा

आंसू इस विश्व सदन में।"11

वेदना की महिमा अपरंपार है।कवियत्री महादेवी वर्मा को भी वेदना मधुर लगती है इसीलिए उन्होंने लिखा है – "दुख मेरे निकट जीवन का ऐसा काव्य  है जो सारे संसार को एक सूत्र में बांधे रखता है।हमारे असंख्य सुख चाहे हमें मनुष्यता की पहली सीढ़ी तक भी नहीं पहुंचा सके किंतु हमारा एक बूंद आंसू भी जीवन को अधिक मधुर अधिक उर्वर बनाए बिना नहीं  गिर सकता ।"इसलिए कवि  कि यह मानवीय करुणा उसकी वेदना का ही प्रतिफल है।वेदना की अधिकता के कारण निराश होकर न हीउसमें जड़ता आती है और न हीवह वैराग्य की बात सोचता है बल्कि मानवतावादी भूमि पर उतर कर जीवन का स्वस्थ सामंजस्य प्रस्तुत करता है।

आज संसार जिस दौर से गुजर रहा है एक गहरी निराशा, हताशा और अवसाद का वातावरण परिव्याप्त है ।सामान्यतः निराशा व्यक्ति को जड़ता की ओर ले जाती है फिर उसे उदासीनताऔर निष्क्रियता घेर लेती है ।वह सघन अवसाद में घिरने लगता है ।ऐसे में इन कवियों को बार-बार पढ़ने, समझने और आत्मसात करने की आवश्यकता जानपड़ती है वस्तुतः ऐसी रचनाएं  हमें निराशा से आशा और जागृति से जनकल्याण की ओर उन्मुख करती हैं ।



1. डॉ शकुंतलादुबे, ' काव्य रूपों के मूल स्रोत और उनका विकास' पृष्ठ संख्या. 344 -45

2.प्रसाद, चित्राधार, kavitakosh.Org

3 जयशंकर प्रसाद, 'आंसू', भारती भंडारलीडर प्रेस इलाहाबाद,  17वां संस्करणपृष्ठ           संख्या 7-8

4. वहीपृष्ठ संख्या 78

5. नंददुलारेवाजपेई,' हिंदी साहित्य: बीसवीं शताब्दी,' लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद,         2010,  पृष्ठ  संख्या- 115

6. जयशंकर प्रसाद,  'आंसू,'  भारती भंडार लीडर प्रेस इलाहाबाद 17 वा संस्करण पृष्ठ संख्या  -20

7. वही, पृष्ठ संख्या -46

8. वही, पृष्ठ संख्या- 61

9. वहीपृष्ठ -संख्या 63

10. वही, पृष्ठ -संख्या 78

11. वहीपृष्ठ -संख्या 79

                                                                                                                                     डॉ.कादम्बिनी  मिश्रा

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